बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

लो चाँद भी अब ढल गया

लो चाँद भी ढल गया, इस रात की अब कोई सुबह नही
दिल को बहलाया बहुत, दिल का आसरा अब कोई नहीं

वायदा, भरोसा मुकम्मलअपनी जगह उम्मीद कोई नहीं 
मकान कैसे ढह गया जो रिहाइश में जलजला कोई नहीं

हर तरफ काँटों में बहार फूलों का सिलसिला कोई नहीं
सारे ख्यलात स्याह और उजाले का अब मंजर कोई नहीं

आसमान से नहीं शिकायत जमीन से भी गिला कोई नहीं
अपने वजूद में ही कोई खामख्याली हिलामिला कोई नहीं

सुकून जो नहीं भी अगर तो बेचैनियों का असर कोई नहीं
चलो कहीं और अदब में अब रूह का है हौसला कोई नहीं

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