गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

इंतजार कभी मुर्दा नहीं होता!


मुर्दा कभी फूल में नहीं बदलता, अगरचे माना कि यह हुआ होगा।
फुलदस्ता आप को मुबारक, जी हाँ ये फूल कभी जिंदा रहा होगा।
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इंतजार कभी मुर्दा नहीं होता!
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हजार बार कवियों के मन को इस सवाल ने मथा है
सत्ता के तिलस्म को न टूटता देख,
रघुवीर सहाय की हाँ में हाँ मिलाया है कि
नहीं टूटता है सत्ता का तिलस्म तो न सही
अपने अंदर का कायर तो टूटेगा
सत्ता से भी कहीं अधिक तिलस्मी मेरे अंदर का कायर है
एक बार फटकारो तो हजार वेष धर लेता है
इतना धूर्त्त है कि हर समय
स्वतःस्फूर्त्त कविता को बताता है
याद है शैलेंद्र के गीत की वह शर्त्त कि
जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर
जिंदगी की जीत में यकीन नहीं मगर खुद को
जिंदा कवि बताता है, चालाक इतना कि
खुद को भी बड़े आराम से छल जाता है
अब कोई नागार्जुन से नहीं पूछता कि
काव्य संकलनों को दीमक कब चाट जाता है
कब आम्र मंजरियों को पाला मार जाता है
निदा फाजली ही क्या बतायेंगे कि
क्यों जिंदगी के दिन रैन का मिलता नहीं हिसाब
क्यों दीमक के घर बैठकर लेखक लिखता नई किताब
न आँखिन देखी, न कागद लेखी ▬ हम कबीर के वंशज
ना जाने किस राग में गाते रहते हैं मंगलचार
हम कौन, हम किस के
कभी इधर तो कभी उधर खिसके
धिक-धिक-धिक धिक्कार
दोनों साथ खड़े हैं देखो कवि और मक्कार
समय का अदभुत चमत्कार, चमक कि
अब न कोई कवि अँधेरे में
किसी असाध्य वीणा से मुखातिब
न मगध में विचारों की कमी से घबराता है
जिस बात पर छूटनी चाहिए रुलाई
उस बात पर इतनी सारी बधाई!
किस मुँह से क्या कहूँ कि लिखने से क्या होगा!
जो होगा, सो होगा ▬ कुछ होने का इंतजार रहेगा!
सच है कि मुर्दा को इंतजार नहीं होता है
लेकिन यह भी कि इंतजार कभी मुर्दा नहीं होता है!

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