सोमवार, 21 जुलाई 2014

बिहार में दुख

बिहार में दुख
चारों तरफ से आते इस शोकगीत को सुनो
जिसमें कोई स्वर नहीं कोई लय नहीं
स्मृतियाँ भी नहीं हैं
सिर्फ रात है उन अक्षरों पर गिरती हुई
जिन्हें तुम अज्ञात लिपि की तरह पढ़ते हो रात भर।
- मंगलेश डबराल

 जन के बिना सृजन कैसा! सृजन में जन स्वत: शामिल है। सृजनशीलता का सीधा संबंध सामाजिकता से होता है। चाहे वह सांस्कृतिक-साहित्यिक सृजनशीलता हो या जीवन और जगत के किसी अन्य क्षेत्रों की ही सृजनशीलता क्यों न हो। सुखी आदमी भोग कर सकता है, सृजन नहीं। सृजनशीलता मन से मन का संवाद है। सृजनशीलता का दुख से गहरा संबंध होता है। संसार में तरह-तरह के दुख हैं। दुखों के कई रंग होते हैं। कई आवाजें होती हैं। दुख की कई ध्वनियाँ और प्रतिध्वनियाँ होती हैं▬▬ गूँज और अनुगूँज होती हैं। कई सुर होते हैं। कई भाषाएँ होती हैं। दुख किसी एक से बँधा नहीं होता है। दुख पहाड़ पर है। दुख मैदान में है। दुख जमीन पर है। दुख आसमान पर है। हर किसी का दुख उसके लिए गहरा है। दुख यहाँ से ले कर वहाँ तक पसरा है। किसी का दुख किसी से कम नहीं है। दुख चाहे जितने प्रकार का क्यों न हो, उसकी उदासी का रंग चाहे जितना गहरा ही क्यों न हो वह क्या सुख के बिना जी सकता है? एक पल भी नहीं जी सकता है। जीने के लिए दुख को भी सुख चाहिए। बिडंबना ही है कि खुद दुख भी सुख से ही जीना चाहता है! स्वाभाविक ही है कि दुख के पहाड़ के सीने से सुख की पतली नदी भी निकलती है। दुख है संसार में, इसलिए सुख भी है संसार में। इसे अलट-पलटकर तो कहा जा सकता है, लेकिन दोनों में से किसी का भी जीवन में निषेध नहीं किया जा सकता है। जो हर प्रकार के दुख से मुक्ति चाहते हैं उन्हें हर प्रकार के सुख से भी हाथ धोने के लिए तैयार रहना चाहिए। अ-सार के बिना सार या भूसा के बिना दाना की तलाश में जीवन बिता देनेवाले महात्माओं को प्रकृति निराश ही करती है। मानवीय सभ्यता और संस्कृति का विकास अबांछित दुख को समझने और उसे बांछित दुख से बदलने का सुख हासिल करने के लिए किये गये संघर्षों के क्रम में हुआ है। मानना चाहिए कि आबांछित दुख को बांछित दुख से बदलने के अवसर का ही दूसरा नाम सुख है। हमारे समय की एक बड़ी समस्या और बिडंबना यह है कि कुछ लोगों को खालिस सुख के इंद्रजालिक चस्के के नुस्खे की जोरदार तलाश है। दुख को बुद्ध ने एक तरह समझा तो मार्क्स ने एक और तरह से समझा। गाँधी ने एक तरह से समझा तो आंबेदकर ने एक और तरह से समझा। बाल्मीकि ने एक तरह से समझा तो कबीर ने एक और तरह से समझा। तुलसी ने एक और तरह से समझा तो जायसी ने एक और तरह से समझा। सूर के लिए भी दुख वैसा ही नहीं था जैसा केशव के लिए था। इस दुख को एक तरह से निराला समझते हैं तो एक और तरह से नागार्जुन समझते हैं। मुक्तिबोध के लिए दुख कुछ और था तो अज्ञेय के लिए कुछ और ही था। और भी बहुत सारे नाम और संदर्भ लिए जा सकते हैं लेकिन यहाँ अभिप्रेत नाम गिनाना नहीं दुख के बहुवर्णी होने का संकेत भर करना है। चूँकि दुख बहुवर्णी होते हैं इसलिए सुख भी बहुवर्णी होते हैं। पूरे विश्व मानव समाज के समकालीन दुख पर भी बात की जा सकती है और भारतीय मन में उग रहे दुख के पहाड़ के गर्भ में सक्रिय ज्वालामुखी की अंतर्सक्रियता की आहटों को भी राष्ट्रीय धरती पर कान धरकर सुनने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन यह सब फिर कभी, अभी तो यह कि वर्णविभक्त हिंदी समाज के दुख के वर्णपट्ट में बिहार के दुख का भी एक अपना रंग है। कहना न होगा कि वर्णपट को समझने के लिए इस रंग को धैर्य के साथ और अलग से लक्षित करना होगा। वर्तमान शासक दल या वर्तमान राजनीतिक दलों के ही मत्थे सारा दोष मढ़ देना सरलीकरण होगा। इस सरलीकरण से बहुत सावधानी पूर्वक बचने की जरूरत है। इस सरलीकरण से बचे बिना हम बिहार के दुख को समझ ही नहीं सकते हैं। इस रंग को समझा जा सके तो यह दुख मनुष्य को बाँटनेवाला नहीं जोड़नेवाला दुख साबित हो सकता है। न समझा जा सके तो यह दुख जोड़नेवाला नहीं तोड़नेवाला भी हो सकता है। इस विषम दुनिया में दुख से बड़ा विस्फोटक दूसरा नहीं है। दुख की दहाड़ बहुत विध्वंसक होती है। दुख दहाड़े इसके पहले ही उसे उसकी मौनावस्था में समझना और सहलाना अधिक जरूरी होता है।दुख को जानने के लिए दुख से दोस्ती करना होता है।
‘हिंदी समाज’ के दुख का एक कारण अपने स्वरूप में इसका परिभाषित नहीं हो पाना भी है। भारत के वर्तमान राजनीतिक-सांस्कृतिक नक्शे को देखें तो इसके दस राज्यों को हिंदी भाषी राज्य माना जाता है। हिंदी भाषी राज्य अर्थात जहाँ दैनंदिन के कामकाज की व्यवहार-भाषा हिंदी है। इन दस राज्यों में हिंदी के साथ-साथ इसकी अड़तालीस जीवंत बोलियाँ भी व्यवहार में है। इन बोलियों में से कुछ ऐतिहासिक रूप से साहित्य समृद्ध बोलियाँ  भी हैं। इन में से कुछ का दावा भाषा होने का है। वे अपने को बोली कहा जाना अपने लिए अपमानजनक मानती हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो उनका ऐसा मानना अनुचित भी नहीं प्रतीत होता है। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि कोई समाज, समुदाय या व्यक्ति सिर्फ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रह कर नहीं जी सकता है। वर्तमान ही उसके जीवित और जीवनोन्मुखी होने की शर्त तय करता है। इस अर्थ में इतिहास की पुनर्रचना करने का काम भी इतिहास करता है। मनुष्य के जीवन में समृति का बड़ा महत्व होता है तो विस्मृति का भी महत्व कोई कम नहीं होता है। इतिहास इसलिए महत्चपूर्ण होता है कि वह हमें याद रखने और भूल जाने का विवेक देता है।याद रखने और भूल जाने का यही विवेक इतिहास विवेक कहलाता है। इतिहास विवेक की आँख से इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखें तो यह सहज ही स्वीकार करना होगा कि आज की तारीख में हिंदी के भाषिक समूह में ये बोलियाँ ही हैं। बोलियाँ मान लेने से इनका महत्व कम नहीं हो जाता है। बोलियाँ मान लेने से इनके जीने का या बरते जाने का हक खत्म नहीं हो जाता है। सचाई यह है कि बोलियाँ अपनी-अपनी भाषाओं की प्राणधाराएँ हुआ करती हैं। हिंदी की भी ये सारी बोलियाँ हिंदी की प्राणधाराएँ हैं। इन प्राणधाराओं के सूख जाने या विच्छिन्न हो जाने से हिंदी के जीवंत बने रहने के प्रति संशय उत्पन्न हो जायेगा। भाषा और बोलियों के प्राण-संबंध को नहीं समझ पाने या किसी गफलत में पड़कर उसके प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं बनाये रखने के कारण कई बार विघटनकारी तत्व और विचार वैधता हासिल कर लेते हैं। हिंदी की जो बोलियाँ बिहार में पड़ती हैं उन बोलियों से मातृभाषा के रूप में जुड़े लेखकों की सृजनशीलता में उन बोली समाजों का अपना रंग और असर होना लाजिमी ही है। तब यह भी बहुत हद तक सही है कि इन रंगों और असरों को अनन्यत: पहचान पाना और तय करना न तो संभव है और न हितकर ही है। यह पहचान निर्णयात्मक न होकर संकेतात्मक ही हो सकती है। इतनी-सी सावधानी बरतने के बाद ही इस दिशा में कुछ भी सोचना सार्थक हो सकता है।
संभवत: जॉर्ज ग्रियसर्न ने ही सबसे पहले भारत के भाषा सर्वेक्षण में ‘बिहारी बोली’ की चर्चा की। वस्तुत: तब ‘बिहारी बोली’ जैसी कोई एक बोली बिहार में थी ही नहीं, आज भी नहीं हैं। बल्कि कई बोलियाँ बिहार में बोली जाती थीं। ये बोलियाँ आज भी बोली जाती हैं। इन सारी बोलियों के समूह को ‘बिहारी बोली’ जैसे किसी एक नाम के अंतर्गत शामिल करने में अकादिमक सुविधा का अपना महत्व हो सकता है, रहा हो। आज अगर ध्यान से देखा जाये तो कुछ महत्त्वपूर्ण अपवादों को छोड़कर मोटे तौर पर इन सारी बोलियों और हिंदी में एक ही तरह की वैयाकरणिक कोटियों का ही इस्तेमाल होता रहा है, हालाँकि स्वाभाविक रूप से शब्द और अर्थभंगिमा में थोड़ा-बहुत अंतर है। कहने की जरूरत नहीं है कि वैयाकरणिक कोटियाँ ही भाषा का ढाँचा बनाती है। प्रसंगवश, ‘ट्रेन थर्टी मिनट लेट है।’ या ‘ओवरटाइम एलाउ है।’ जैसे वाक्य अपने शब्दों या लिपि के कारण नहीं वैयाकरणिक कोटियों के कारण हिंदी के प्रतीत होते हैं या हैं। बिहारी रंग उभरता है ऐसे वाक्यों को इस तरह कहने में, ‘ट्रेनवा थर्टी मिनट लेट है।’ या ‘ओवरटाइम एलाउए है।’ केंद्रीय गृहमंत्री के पद पर रहते हुए एक बार बुटा सिंह बिहार दौरे पर आये थे। किसी पत्रकार के मुँह से बुटा बाबू का संबोधन सुनकर वे काफी भड़क गये थे। इस प्रसंग पर चुटकी लेते हुए एक सज्जन ने कहा था▬▬ ‘इस में इतने भड़कने की क्या बात है? अरे भाई वह बिहार है, वहाँ किसी ने बुटबा नहीं कहा यह क्या कम है!’ ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार में संज्ञा के साथ धड़ल्ले से प्रयुक्त होनेवाला ‘बा’ सम्मानसूचक शब्द बाबू का ही घिसा हुआ या टूटा हुआ रूप है, जैसे बांग्ला में दादाअब घिसकर दाहो गया है। जो हो, ध्यान में सिर्फ यह लाना अपेक्षित है कि वैयाकरणिक कोटियों के अंतर्गत किये जानेवाले शब्द प्रयोग और अभिव्यक्ति के तेवर और टोन से उसमें स्थानिकता का पुट आता है। स्थानिकता को विनिर्मित करने में विभिन्न ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि कारक सक्रिय रहा करते हैं। हिंदी साहित्य की रचनाशीलता के बिहारी रंग को संकेतात्मक रूप से भी समझने के लिए जरूरी है कि हिंदी भाषी राज्यों के विभिन्न ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जैसे सक्रिय कारकों के संदर्भ में बिहार के विभिन्न ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जैसे सक्रिय कारकों के वैशिष्ट्य एवं उनके विभिन्न अंतर्विरोधों को समझने की बारीक कोशिश की जाये। पुनरुक्ति का जोखिम मोल लेते हुए भी आगे बढ़ने से पहले एक बार यह याद दिलाना आवश्यक प्रतीत होता है कि यह पहचान अपने मूल रूप में सिर्फ निदर्शात्मक ही हो सकती है, किसी भी कीमत पर निर्देशात्मक नहीं।
पूरे भारत के पिछड़ेपन का कारण हिंदी भाषी राज्यों को बताया जाता है। इस पिछड़ेपन में आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन का अंतर्भाव समाहित है। प्रोफेसर आशीष बोस ने प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों के प्रथमाक्षरों को जोड़कर एक शब्द बनाया है ▬▬ ‘बीमारू’। यह ‘बीमारू’ शब्द बड़ा प्रचलन में है। ‘बीमारू’ का प्रथम द्विवर्ण (BI) बिहार को भासित करता है। क्या है यह बिहार? क्या बिहार भारतीय संदर्भ में कोई ‘सिंड्रोम’ है? जिस ‘सिंड्रोम’ का उल्लेख करते हुए अदालत में वकील देश और देश की राजधानी दिल्ली को इस ‘बिहार सिंड्रोम’ से बचाने की गुहार लगाता है। क्या कोई जाति जन्मजात अपराधी होती है? क्या बिहारी कोई जाति है? जन्मजात अपराधी जाति? इस अपराधी जाति के लोगों को घरेलू काम के लिए रखना जोखिम भरा होता है? इतना जोखिम भरा कि अपने लोगों को इस जन्मजात अपराधी जाति के अपराध का शिकार होने से बचाने के लिए देश की राजनीतिक राजधानी के वकील के ही तर्ज पर देश की आर्थिक राजधानी की पुलिस को परिपत्र निकालना पड़ता है। और देश की सांस्कृतिक राजधानी में इनके प्रति कैसा भाव है? मान्यताओं और मत के आधार पर इस्लाम के अंदर भी नाना पंथ हैं और इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है। लेकिन बिहारी मुसलमान? इस्लाम का यह कौन-सा भेद है? झाड़खंड बिहार से अलग हो गया। बिहार और झाड़खंड से मेरा संबंध पिता के घर और माँ के घर से संबंध के जैसा है। मेरे लिए दानों में से कोई कमतर नहीं है। यह जानकर बहुत पीड़ा हुई कि अलग होने के बाद झाड़खंड को अपना माननेवालों की सर्वोच्च आकांक्षा झाड़खंड को बिहारी छवि से बाहर निकालने की है। पीड़ा चाहे जितनी हो लेकिन यह आकांक्षा निराधार बिल्कुल नहीं है। सच तो यह है कि बिहार को भी ‘बिहारी छवि’ से बाहर निकालने की आकांक्षा हर किसी की होनी चाहिए! ये प्रसंग फालतू लग सकते हैं। फालतू होने पर भी इतना तो बता ही जाते हैं कि बिहार और बिहारी की प्रथम छवि कैसी है। ये छवि हम जैसे लोगों को निश्चित ही सालता है, बहुत सालता है। मगर उपाय? अपनी छवि से लड़ना अपनी छाया से लड़ने के ही समान है। अपनी छाया से लड़ना मुश्किल और निरर्थक दोनों ही होता है। अपनी छाया से लड़ने को सार्थक बनाने का एक ही उपाय है, अपने-आप से लड़ना। अपने को तोड़कर ही अपनी छाया को तोड़ा जा सकता है। अपने को तोड़कर और मोड़कर ही छाया को आकार देनेवाले प्रकाशपुंज को विवश किया जा सकता है। बहरहाल यह समय बिहार के आत्म-संघर्ष का समय है। आत्म-संघर्ष के लिए आत्म-ज्ञान का होना परम अनिवार्य है। आत्म-ज्ञान के लिए निर्मम आत्म-दर्शन की जरूरत है। बिना आत्माभिमुखता के आत्म-दर्शन क्या खाक होगा! किसी समाज के लिए आत्म-केंद्रित या आत्म-रत होना बहुत अच्छा लक्षण नहीं है तो आत्म-विमुख या आत्म-विरत होना भी बहुत अच्छा लक्षण नहीं है। वस्तुत: आत्म-रति और आत्म-विरति के साथ ही आत्म-दृष्टि और विश्व-दृष्टि का अद्भुत जादुई सामंजस्य ही किसी समाज के आत्म-संघटन और आत्मोत्थान की सामाजिक संभावना रचता है। यह जादुई सामंजस्य हर समाज को खुद अपनी आंतरिक लोच के बल पर हासिल करना पड़ता है। स्वीकार करना होगा कि बिहार में इस आंतरिक लोच की कमी है। कहना न होगा कि लोच में सिर्फ आत्म-विस्तार या आत्म-प्रसार की ही संभावना नहीं रहती है बल्कि आत्म-संकोच की भी संभावना रहती है। एक जीवंत और लचीले समाज में आत्म-प्रसार और आत्म-संकोच की प्रक्रिया अधिक क्षिप्र होती है।
देकार्त आदि के विचार से आधुनिक दर्शन की शुरूआत मानी जाती है। जीवन-दृष्टि के रूप में आधुनिकता की सामाजिक शुरुआत को ध्यान में रखें तो आधुनिक भाव-बोध के निर्माण के मूल में डॉर्विन, फ्रॉयड और मार्क्स के चिंतन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैविक विकास के क्रम में बननेवाले जैविक-मन, व्यक्ति इच्छाओं की स्पर्द्धा और प्रतिसंघर्ष में बननेवाले व्यक्ति-मन और सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक अंतरालों के बीच जारी सामाजिक संघर्ष की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की ऐतिहासिक चेतना के विकासमान संदर्भों में बननेवाले गत्यात्मक सामाजिक-मन की प्रतिपूरकता की दृष्टि से आधुनिक भाव-बोध के निर्माण में इनके चिंतन के महत्व को समझा जा सकता है। आधुनिक दृष्टि से मध्यकालीन और मध्यकालीन दृष्टि से आधुनिक दार्शनिक माने जानेवाले फ्रान्सिस बेकन ने लक्षित किया था कि मनुष्य का मन तीन प्रकार का होता है। एक प्रकार का मन चींटी की तरह बाहर से वस्तु और विचार का संग्रह करता रहता है तथा उसमें अपनी ओर से कुछ भी जोड़ता नहीं है। अर्थात संग्रहवादी होता है। दूसरे प्रकार का मन मकड़ी की तरह होता है जो बाहर से प्राप्त वस्तु और विचार को उपयोग में नहीं लाता, जिसका सारा ज्ञान उसके भीतर से ही उपजता है। तीसरे तरह का मन वह होता है जो मधुमक्खी की तरह वस्तु और विचार बाहर से प्राप्त तो करता है लेकिन उसे अपनी योग्यता से बदलता भी है। पहला मन शुद्ध-अनुभववादी, दूसरा मन शुद्ध-विवेकवादी और तीसरा मन आलोचनात्मक-विवेकवादी होता है। कांट शुद्ध-अनुभववाद और शुद्ध-विवेकवाद को अकेले-अकेले अपर्याप्त मानते थे। इसलिए कांट शुद्ध-अनुभववाद और शुद्ध-विवेकवाद मिलाकर आलोचनात्मक- विवेकवाद की तलाश में थे। ध्यान देने की बात यह है कि यह आलोचनात्मक-विवेकवाद जो बाहर से प्राप्त विचार को आत्मसात कर बदलने की गुंजाइश का ही एक नाम सृजनशीलता है। इमानुएल कांट के अनुसार ज्ञानोदय के होने का अर्थ है, परिपक्व होना, दूसरे की प्रेरणाओं पर आश्रित होने के बजाये अपनी प्रेरणा से परिचालित होने की योग्यता अर्जित करना, मुक्त होना और अपने कार्य के लिए जवाबदेही स्वीकार करने के योग्य बनना। इस संदर्भ में कांट के ‘प्राइवेट’ और ‘पब्लिक’ की संकल्पना भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ उ­द्देश्य सिर्फ इतना भर संकेत कर देना है कि ज्ञानोदय, आधुनिकता और स्वतंत्रता में सहोदर का ही नहीं जुड़वाँ होने का भी संबंध है। इस प्रकार आधुनिकता, ज्ञानोदय और स्वतंत्रता का आपस में अविच्छेद्य संबंध है। यही कारण है कि आधुनिकता साधारण लोगों के मन में भी स्वतंत्रता और आत्मानुशासन की स्थिति प्राप्त करने के स्वप्न के लिए जगह बनानेवाला पहला सुचिंतित सामाजिक विचार है। यह ध्यान में रखना बहुत ही जरूरी है कि भारत में आधुनिकता, ज्ञानोदय और स्वतंत्रता या आत्मानुशासन तीनों अवधारणाओं की सामाजिक चर्या का प्रारंभ एक ऐसे वातावरण में हुआ जब भारत आर्थिक और राजनीतिक रूप से बाह्य उपनिवेश के तथा सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आंतरिक उपनिवेश के अधीन था। जाहिर है कि ऐसे में उस सामाजिक चर्या की ऊर्जा का सिंहभाग इस बाह्य उपनिवेश की अधीनता से मुक्ति में ही व्यय हुआ। इस व्यतीत ऊर्जा के अवशिष्ट अंश के बूते आंतरिक आत्म-उपनिवेश से लड़कर मुक्त होने और आधुनिक, ज्ञानोदित और स्वतंत्र या आत्मानुशासित सापेक्षिक समतामूलक लोकतांत्रिक-समाज के अखंड आत्म या संविधान को आत्मार्पित करनेवाले ‘हम’ के अर्जन और परिगठन का काम अधूरा ही रह गया। सहज ही लक्षित किया जा सकता है कि यह अधूरापन बिहार में कुछ अधिक तीखे तेवर में बना रहा है। कहना न होगा कि औपनिवेशिकता, चाहे वह बाह्य हो या आंतरिक, की अपनी ऐसी बहुत सारी बारीक समस्याएँ होती हैं जिन्हें शब्दश: अभिव्यक्त करना न सिर्फ मुश्किल होता है बल्कि कई बार ब्यर्थ का द्रविड़ प्राणयाम भी साबित होता है। औपनिवेशिकता एक दर्द है जिसे बेवाई की तरह सिर्फ महसूस किया जा सकता है। उसकी बारीकियों में के चक्कर में पड़े बिना भी उससे लड़ा जा सकता है। सही है कि आधुनिकता, ज्ञानोदय और स्वतंत्रता का बोध भी हमें इस बाह्य औपनिवेशिक वातावरण में ही मिला मगर एक पल के लिए भी यह भुलाया नहीं जा सकता है कि यह बोध हमें घेलुए की तरह मिला। इतिहास ने बड़ी क्रूरता से साबित कर दिया है कि घेलुए में मिले स्व-तंत्रता बोध के स्व-त्राता बन सकने की गुंजाइश न के बराबर होती है।
व्यक्ति-मन के संदर्भ में बेकन के विचार को सामाजिक-मन के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। सामाजिक मन को थाहने के लिए सामाजिक संरचना की आभ्यंतरिक अभियांत्रिकी पर विचार आवश्यक है। डॉ.श्यामचरण दुबे के अध्ययनों के निष्कर्षों पर ध्यान दिया जा सकता है। वे अमेरिकी समाजशास्त्री डेविड रिजमेन के हवाले से उल्लिखित करते हैं कि प्रवृतियों के आधार पर समाज के तीन प्रकार होते हैं; परंपरा-प्रेरित समाज, बाह्य-प्रेरित समाज और अपने अंतर्विवेक से परिचालित होनेवाला स्वतंत्र-समाज। परंपरा-प्रेरित समाज पूर्वजों की बनाई राह पर चलनेवाला समाज होता है। इस प्रकार के समाजों में नवाचार कम होते हैं, नई माँगों का दायरा भी कम होता है। बाह्य-प्रेरित समाज बाह्य प्रभाव को बिना किसी प्रकार की पड़ताल-परख के बड़ी सरलता से ग्रहण कर लेनेवाला होता है। ऐसे समाज में परंपरा की शक्ति क्षीण हो जाती है और विवेक को विकसित तथा प्रभावी होने का मौका नहीं मिलता है। अंतर्विवेक से परिचालित होनेवाला स्वतंत्र-समाज आंतरिक विवेक को  निर्णय का आधार माननेवाला होता है। ऐसे समाज के सदस्य संपूर्ण परंपरा को न तो पूजनीय मानते हैं और न सारे नवाचारों को ही स्वीकार्य मानते हैं। ये परंपरा और नवाचार दोनों को अपने विवेक से परखते हैं। यहाँ जरा ठहर कर एक बार फिर कांट के ज्ञानोदय की अवधारणा का स्मरण कर लिया जाये तो कहा जा सकता है कि अंतर्विवेक से परिचालित होनेवाले स्वतंत्र-समाज में ही ज्ञानोदय हो पाता है। समस्या यह है कि अंतर्विवेक से परिचालित होने की सामाजिक स्थिति हवा में पैदा नहीं होती है। समाज के अंदर इसके लिए जगह बनानी पड़ती है। औपनिवेशिक जकड़न में फँसे समाज के अंदर अंतर्विवेक और उसकी निष्पत्तियों के आधार पर सामाजिक व्यवहार्यता के लिए जगह बनाना आसान काम नहीं होता है। यह काम तब और मुश्किल हो जाता है जब समाज को औपनिवेशिक जकड़न में फाँसे रखनेवाले जाल के धागों के निर्माण में जातीय अंतर्चेतना के गुणसूत्रों का भी योगदान हो।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने “हिंदी साहित्य का इतिहास”  में साहित्य की प्रवृत्ति को जनता की चित्तवृत्ति से जोड़कर देखने की जरूरत के महत्व को समझा था। उनके अनुसार, जनता की चित्तवृत्ति’ बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है। इसी के साथ औद्योगिक, बाजार-व्यवस्था एवं आर्थिक परिस्थिति को भी जोड़कर विचार किया जा सके तो जनता की चित्तवृत्ति की बनावट और बुनावट एवं उसकी जातीय चेतना का परिप्रेक्ष्य अधिक पूर्णता से स्पष्ट हो सकेगा। हिंदी रचनाशीलता में बिहारी वैशिष्ट्य को जानना हो तो पहले बिहार के बारे में कुछ तथ्यों का स्मरण कर लेना प्रासंगिक ही नहीं अनिवार्य भी है। उत्तर में नेपाल, पूरब में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखंड के बीच 94,163 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफलवाले इस राज्य की जनसंख्या 8,28,78,796 है जो भारत की कुल जनसंख्या का 8.07   है। 56.03 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में से सिर्फ 33.51 लाख हेक्टेयर जमीन को ही सिंचाई की सुविधा हासिल है और भूमि-सुधार हुआ ही नहीं है। गंगा के इस पूर्वी मैदानी क्षेत्र में ऊपजाऊ जलोढ़ मिट्टी होने के बावजूद कृषि की उत्पादकता न्यून स्तर पर है। भूमिगत जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। सामान्यत: 100 से 200 सेमी. के बीच औसत वर्षा होती है। विषुवत रेखा बिहार से होकर गुजरती है। औसत तापक्रम 21 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है।गंगा, सोन, पुनपुन, फल्गु, कर्मनाशा, दुर्गावती, कोशी, गंडक, घाघरा, कमला, बलान जैसी नदियों के कारण जल की प्रचूरता के बावजूद इसके सार्थक प्रयोग के लिए जल-प्रबंधन की बुनियादी ढाँचागत सुविधा का अभाव है।परिणमत: जहाँ इस राज्य को एक ओर सेंच के अभाव में सूखा की आँच सहनी पड़ती है वहीं दूसरी ओर बाढ़ की चपेट में आकर जन-धन की भारी क्षति का भी सामना करना पड़ता है। धान, गेहूँ, मकई, दाल के अलावे ईख, तंबाकू, तिलहन, प्याज, मिर्च और पटसन यहाँ की मुख्य फसल है। सार्वजनिक क्षेत्र के बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की हालत बयान के काबिल नहीं है।पूरी परिवहन व्यवस्था निजी मालिकों के हाथ में है। जहाँ तक बिहार की औद्योगिक स्थिति का सवाल है मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर और मोकामा में भारत वैगन लि. का रेल वैगन प्लांट, बरौनी में इंडियन ऑयल कारपोरेशन का तेलशोधक और एच.पी.सी.एल का उर्वरक उत्पादन केंद्र, सिवान, पंडौल, भागलपुर, मोकामा और गया के सूताकल, गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, भागलपुर और सीतामढ़ी की डिस्टलरी, पश्चिम चंपारण, मुजफ्फरपुर, बरौनी के चमड़ा उद्योग, कटिहर एवं समस्तीपुर के चटकल, हाजीपुर का दवा उद्योग, कल्याणपुर बंजारी के सिमेंट उद्योग के साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की तेरह और निजी क्षेत्र की पंद्रह चीनी मीलों को मिलाकर बिहार का औद्योगिक नक्शा बनता है।बिजली आज के जीवन में प्राणवायु की तरह का महत्व रखती है। बिहार इलेक्ट्रिसीटी बोर्ड की बरौनी थर्मल पावर, मुजफ्फरपुर थर्मल पावर, कोशी हाइडेल पावर के साथ ही एन.टी.पी.सी. के कहलगाँव सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट बिजली के उत्पादन के केंद्र हैं। इनके अतिरिक्त एन.टी.पी.सी. के फरक्का सुपर थर्मल पावर स्टेशन और तालचर सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट, दामोदर घाटी निगम के दुर्गापुर थर्मल पावर पावर स्टेशन और नेशनल हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन चुक्का हाइडेल पावर स्टेशन के बिजली उत्पादन में भी हिस्सा मिलता है। स्वास्थ्य और शिक्षा के कार्यशील आधारभूत ढाँचे का अभाव है। नालंदा और विक्रमशीला के खंडहर सिर्फ ईमारतों के ही खंडहर नहीं हैं आज के गतवैभव और अप्रतिभ बिहार के भी प्रतीक हैं। भारत के अन्य राज्यों से तुलना करें तो बिहार में साक्षरता की दर और महिला-पुरुष साक्षरता का आनुपातिक औसत बहुत कम है। कहने की जरूरत है कि आर्थिक विकास, सामाजिक निवेश तथा औद्यागिक निवेश, प्रतिव्यक्ति आय, पक्का मकान, औषधि, पोषक एवं संतुलित आहार और बिजली खपत आदि के मामले में यह राज्य अपने न्यून स्तर पर है साथ ही आबादी के घनत्व, शिशु मृत्यु दर, शिक्षा से बाहर हो जानेवाले छात्रों की दर के मामले में अपने अधिकतम स्तर पर है? सापेक्षिक गरीबी तो है ही लेकिन परम गरीबी की समस्या बहुत ही विकराल है। दहेज और घरेलू उत्पीड़न की समस्या विकट है। खैनी, भाँग, गाँजा और ताड़ी स्थानीय स्तर पर सहजता से उपलब्ध होनेवाला नशा है। प्रमुख रूप से सत्तू, लिट्टी, चूड़ा-दही, भात और रोटी खानेवाले बिहारी औसत कद-काठी और स्थूल काया के होते हैं। बिहारी सामान्य रूप से अपने व्यवहार में भावुक, अनौपचारिक और आत्मीय तथा चरित्र में ग्रामीण होते हैं। संशय एवं बद्धमूल हताशा उनके अंतर्मन में , ऐंठ उनकी भाषा में और गुस्सा उनकी नाक पर होता है। उनके उत्साह का ग्राफ बड़ी तेजी से उठता-गिरता है। इसके कारण राजनीतिक होहकार में आगे-आगे रहने पर भी जाति-संप्रदाय-क्षेत्र-अपराध के जंजाल में फँसे राजनीतिक नेतृत्व की ही नहीं जीवन के अन्य क्षेत्रों के नेतृत्व की गुणवत्ता का भी औसत न्यून्यांक पर है। जाति को राजनीतिक समूह में बदल कर जाति पर आधारित राजनीति करनेवालों की महिमा यह है कि जाति का बंधन बेटी और रोटी के संबंध तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि फैलकर वोट तक पहुँच गया है। लगभग सामाजिक मान्यता ही मिल गई है कि किसी भी परिस्थिति में बेटी और वोट को जाति के बाहर नहीं जाना चाहिए। वहाँ लोग नाम पूछते हैं तो व्यक्ति की पहचान के लिए नहीं जाति की पहचान के लिए। जिस नाम से जाति का पता न चले उस नाम को संशय की नजर से देखा जाता है और अधूरा तथा छद्म माना जाता है! बिहार की यह स्थिति आरोप का नहीं, बिहारी छवि से बिहार को बाहर निकालने की कठिन मानसिक चर्या के लिए बिहार को तैयार करने के लिए गहरे, आत्मीय और संवेदनशील विश्लेषण का विषय है।
महात्मा बुद्ध ने पूरी दुनिया को जीवन के लिए ‘मझम निकाय’ का महत्व समझाया लेकिन बिहार के चरित में किसी मध्यम मार्ग के लिए कोई जगह नहीं बन पाई। एक अति से दूसरी अति पर पहुँच जाना इनकी नियति है और मानसिक अधीरता इनका स्वभाव। व्यक्तिगत प्रतिभा की कोई कमी नहीं है लेकिन सामाजिक समूहन और सामाजिक सूत्रबद्धता के महत्व को ठीक से समझ और साध नहीं पाने के कारण अपने व्यवहार में अकेले-अकेले मुक्ति पा लेने की आकांक्षा पालनेवाले लगते हैं। उपस्थित-बुद्धि और-साहस में औसत से अधिक होने के बावजूद दुष्चक्र में फँसी इनकी सरस्वती मंद रहती है। आत्म की पहचान और अभिज्ञान के अभाव में भी इनके आत्म-सम्मान के बोध का ग्राफ उच्च स्तर पर रहता है। इनकी आत्म-दृष्टि और विश्व-दृष्टि एक दूसरे की प्रतिपूरकता में सक्रिय न होकर एक दूसरे के टकराव में आगे बढ़ती है और एक दूसरे को खंडित, ब्यर्थ और धूमिल बनाती है। यहाँ रोजगार के अवसर कम होने के कारण यहाँ की बहुत बड़ी आबादी रोजी-रोटी की तलाश में देश के कोने-कोने में जाती है जबकि देश के अन्य क्षेत्र से रोजगार की तलाश में आनेवाली आबादी बहुत छोटी है, खासकर झारखंड के अलग हो जाने के बाद। बाहर जानेवाली ऐसी बड़ी आबादी में पूँजी-विहीन अ-कुशल और अर्द्ध-कुशल लोगों की संख्या बहुत अधिक होती है, स्वभावत: दैनिक मजदूरी इनकी विवशता होती है। क्या आश्चर्य यदि बिहारी और मजदूर एक दूसरे के राष्ट्रीय पर्याय बन गये हैं। राष्ट्र में मजदूरों की जो दशा है उसी से राष्ट्र में बिहारियों की दशा का भी अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ये बिहार में टिक पाते नहीं हैं और बिहार के बाहर इनका कोई सम्मानजनक आत्मीय ठौर होता नहीं है। ऐसी स्थिति में ये न इधर के रहते हैं न उधर के रहते हैं। ये दोनों ही जगह अपने बाहरी होने के एहसास के साथ समाज-विहीनता या कठ-सामाजिकता के साथ जीने लिए विवश हो जाते हैं। जीवन के किसी क्षेत्र में जनतांत्रिक जीवन पद्धति की कोई कारगर भूमिका नहीं है। मानव विकास रिपोर्ट-200, जिसका मुख्य विमर्श आत्मविभक्त दुनिया में लोकतंत्र की दुरवस्था से संबंधित है, के इस निष्कर्ष को ध्यान में लाना यहाँ प्रासंगिक है कि किसी भी समाज में लोक को शक्तियुक्त करनेवाले लोकतंत्र के ढाँचों और अंतर्वस्तु दोनों को खुद अर्जित पड़ता है, इसे आयातित नहीं किया जा सकता है। सत्ता के विभिन्न रूप होते हैं, यथा लोकसत्ता, ज्ञानसत्ता, धनसत्ता आदि। लोकतंत्र में इन विभिन्न सत्ताओं के विकेंद्रीकरण के लिए विभिन्न स्तर के ढाँचों की जरूरत होती है। ये विभिन्न ढाँचे पंचायतों, स्थानीय स्वशासी निकायों, समितियों, संस्थानों, स्वयं सहायता समूहों,सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों आदि के रूप में प्रकट होते हैं। इस तरह से विकेंद्रित विभिन्न सत्ताओं को सूत्रबद्ध कर उन्हें राज्य-सत्ता से जोड़कर लोकतांत्रिक शक्ति को अर्जित किया जाता है। यह लोकतांत्रिक शक्ति ही समतामूलक सामाजिक संरचना का निर्माण और और उसके प्रतिफल के सापेक्षिक रूप से समान संवितरण को सुनिश्चित कर लोकतंत्र की बुनियादी प्रतिश्रुति को पूरा कर पाती है। लोकतंत्र के ढाँचों और अंतर्वस्तु की बिहार में क्या स्थिति है, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। गैर सरकारी संगठन, संक्षेप में एन.जी.ओ. के नाम से जाने जाते हैं। आजकल पूरी दुनिया में एन.जी.ओ. का बड़ा शोर है। एन.जी.ओ. नया ओझा है। बताया जाता है कि एन.जी.ओ. के पास हर प्रकार की सामाजिक समस्याओं का निदान है। अन्यत्र बात सही भी हो सकती है। बिहार के संदर्भ में लगता है सारे तो नहीं लेकिन अधिकतर एन.जी.ओ. खुद ही समस्या हैं। इनकी कार्यप्रणाली और इनके होने के परिणाम गहन अध्ययन के विषय हैं। बात कड़वी है मगर इसे आत्म-स्वीकृति के रूप में कहा जा सकता है कि बिहार में लोकतंत्र के ढाँचे भीतर से ध्वस्त हैं और अंतर्वस्तु धुहाँसे (धुआँ+कुहासा) के ही रूप में उपलब्ध है। यह राज्य अपने सामंतवादी स्वभाव में आगे है और सामाजिक-आर्थिक शोषण में भी अपने चरम पर है। तरह-तरह की सेनाएँ और तरह-तरह के आक्रमण हैं। आक्रमण हैं तो प्रत्याक्रमण भी हैं। बिहार विभिन्न प्रकार से सामाजिक अभियांत्रिकी को आजमाने की प्रयोगशाला का उदाहरण बन कर रह गया है। इसकी दशा वैज्ञानिकों के शोध कार्य के लिए जी रहे पशु की तरह की है। निर्विशिष्ट मनुष्य के लिए मनुष्य का सम्मान-बोध यहाँ सपने में भी मुश्किल से ही सक्रिय हो पाता है। सामूहिक हत्या, अपहरण, बरजोरी उद्योग का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं।
सल्हेस, बिरहा, चैता, फाग इनके दर्द की लोकगाथाएँ हैं। होली, दीवाली, छठ इनके दर्द के लौकिक उल्लास, उत्साह, मनोरथ पूरने के अवसर हैं। मैथिली (अब भाषा की संवैधानिक मान्यता प्राप्त), मगही और भोजपुरी इस क्षेत्र की मुख्य बोलियाँ हैं। ध्यान रहे ये सिर्फ बोलियाँ नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक समाज भी हैं। इन सांस्कृतिक समाजों की अपनी विशिष्टताएँ भी रही हैं। इन विशिष्टताओं के कारण कहीं-न-कहीं में इनमें पार्थक्य का भाव भी सक्रिय रहता है। बिहारी होना इनकी अपेक्षाकृत नई और आधुनिक पहचान है। इस नई पहचान को यहाँ के लोग पूरी तरह आत्मगत नहीं कर पाये हैं। ये बिहार के अंदर अपेक्षाकृत नये और आधुनिक अर्थ में बिहारी न होकर पुराने और पारंपरिक अर्थ में मैथिल, भोजपुरी, मागध आदि होते हैं और बिहार के बाहर ये बिहारी होते हैं। बाहर और भीतर में पहचान की इस भिन्नता के कारण यहाँ के लोगों के मानस में आधुनिकता और पारंपरिकता के अंतर्द्वंद्व से इनके अंदर व्यक्तित्व के जिस अंतर्पथ (Orbit) का निर्माण होता है वह इनके अंदर एक तरह से पहचान की अस्मिता का संकट भी खड़ा करता है। कई बार बिहार के बाहर भी वे अपनी मैथिल, भोजपुरी या मागध पहचान को स्वीकृति दिलाने की निष्फल चेष्टा करते हैं। सही अर्थ में देखा जाये तो बिहारी समाज में आधुनिकता से अधिक पारंपरिकता को ही वरीयता प्राप्त होती है। इसके कारण हैं। अवधाराणा के रूप में हो या जीवन-दृष्टि के रूप में हो आधुनिकता पारंपरिकता से बिल्कुल विच्छिन्न नहीं हो सकती है। सच्ची बात तो यह है कि आधुनिकता परंपरा में ही नया विकास या संयोग होती है। जाहिर है प्रत्येक पारंपरिक समाज को अपने अंदर यह नया विकास या संयोग उद्योगपूर्वक घटित करना पड़ता है। यही कारण है कि युरोपीय समाजों की आधुनिकता और भारतीय समाजों की आधुनिकता में भी अंतर होता है। जब तक यह अंतर मनुष्य और प्रगति विरोधी न हो तब तक इस अंतर के प्रति आदर ही किसी संस्कृति की समाजिक बहुलात्मकता के प्रति सहिष्णुता का आधार और सहअस्तित्व की संभावना रचता है। ध्यान देने की बात यह है कि परंपरा के अंतर्गत यह नया विकास और नया संयोग ही सामाजिक गत्यात्मकता को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक-प्रसार और प्रगति के पथ का संधान करता है। सांस्कृतिक विकास चक्र में कौन-सी प्रक्रिया पहले शुरू होती और कौन-सी बाद में यह कहना संभव नहीं है। अधिक सही बात तो यह है कि दृश्य या अदृश्य रूप में ये प्रक्रिया सहसंचलन की अवस्था में एक दूसरे को अपनी द्वंद्वात्मक संगति में प्रगति प्रदान करती है। बिहार के खास संदर्भ में देखें तो इसके विभन्न समाजों की पारंपरिकताओं और आधुनिकताओं के अंतर के प्रति पारस्परिक सम्मान, सहबद्धता और संवाद का नहीं आत्मकोष्ठता और आत्मश्रेष्ठता के कारण उदासीनता, अन्यता और शत्रुता का भाव ही अधिक सक्रिय रहा है। यही कारण है कि आधुनिकता की परियोजना का पहला चरण भी यहाँ सचेत रूप से प्रारंभ नहीं हो सका। बंगाल के नवजागरण को देखें तो सवर्ण हिंदुओं के नेतृत्व में और औपनिवेशिक वातावरण में प्रारंभ नवजागरण की सीमाएँ आज बहुत साफ देखी जा सकती है लेकिन बावजूद इसके उस नवजागरण में आधुनिकता की परियोजना के सचेत प्रारंभ का पाठ भी पढ़ा जा सकता है। बिहार के खास संदर्भ में बौद्धिक नेतृत्व, जिसका समग्र नहीं भी तो बहुत बड़ा अंश सवर्ण हिंदुओं के हाथ में था, ने कभी अपनी इस जिम्मेवारी को गंभीरता से समझा ही नहीं। सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो बिहार हमेशा से प्रतिसंस्कृति का केंद्र रहा है। आर्य वर्चस्व के अंतर्गत विकसित संस्कृति के अंदर बिहार का सांस्कृतिक विकास अधिक द्वंद्वात्मक रहा है। चूँकि आज बाहरी और भीतरी का झगड़ा एक भिन्न प्रकार के संदर्भ से उठाने की कोशिश की जा रही है इसलिए एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि संस्कृति और प्रतिसंस्कृति के द्वंद्व में कोई बाहरी और कोई भीतरी नहीं होता है, यह आत्म-द्वंद्व ही होता है। बुद्ध और महावीर ने ही नहीं बिंबसार, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक आदि के शासन ने भी इस प्रतिसंस्कृति को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। बल्कि एक बार याद कर लेने की जरूरत है कि खुद बिहार नाम में बौद्ध प्रभाव है। अकारण और नगण्य नहीं है यह याद करना कि बुद्ध और महावीर ने ही सबसे पहले संस्कृत सत्ता, संस्कृत भाषा और संस्कृत शास्त्र को चुनौती दी और पालि और प्राकृत को अपनी आधार भाषा के रूप में अपनाया। अपेक्षाकृत बाद के संदर्भ में देसिल बयना के सब जन मिट्ठा होने की सचेत घोषणा भी सबसे पहले इसी बिहार से विद्यापति ने की।
बिहार में अब तक कोई बड़ा बाजार, औद्योगिक या व्यापारिक केंद्र बन नहीं पाया। समुद्री तट के अभाव और औपनिवेशिक अवशेष पर अर्थ-व्यवस्था ख़़डी की जाने की स्थिति में जो यत्किंचित विकास हुआ, उसका भी पूरा लाभ इस क्षेत्र के सामाज-आर्थिक आधार को नहीं मिला। मुख्यत: कृषि पर आधारित होने और लगातार बाढ़-सूखा एवं बढ़ती आबादी की मार, निरक्षरता, निरक्षराचार एवं भ्रष्टाचार से संत्रस्त होने के कारण इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधि को गहरा आघात लगता रहा है। विकास की राह पर चलने और आर्थिक विकास की नई मंजिलों को प्राप्त करने में यह बुरी तरह विफल रहा है। बिहार के रहनेवालों को भारत में ही उनके प्रवास के स्थानों पर न जाने किस-किस तरह के अपमान और जिल्लत  का सामना करना पड़ता है। बिहार का समाज बाह्य-प्रेरित परतंत्र-समाज का ही उदाहरण बनकर रह गया है। एक ऐसा समाज जो अपनी परंपरा को भी अपने विवेक प्रदत्त निष्कर्षों एवं अंत:करण की पे्ररणा से नहीं, बल्कि किसी बाह्य-शिक्त की अभिप्रेरणा से ही समझता, पकड़ता और ग्रहण करता है।

आज बिहार की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति कोई बहुत अच्छी  नहीं है। बिहार ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। लेकिन उस संग्राम की राजनीतिक और सामाजिक पुननिर्माण की नव सांस्कृतिक चेतना को कार्यशील ऊर्जा में बदलने में, सामाजिक-पुनर्निर्माण के स्वप्न के साथ उसे जोड़ने में, नई सामाजिक गतिशीलता के वेगबर्द्धन की कार्यलिपि को पढ़ने में और अपेक्षित नई पहल करने में बिहार सफल नहीं हो पाया। बिहार के संदर्भ में, न तो सांस्कृतिक-राजनैतिक-सामाजिक चेतना के नवप्रवाह का सातत्य बना रह सका न स्मृतिकोश में ही उसके लिए कोई जगह बन सकी। स्वतंत्र भारत में भी, आपात काल की तानाशाही का जोरदार ढंग से राजनीतिक मुकाबला करने के बावजूद संपूर्णक्रांति के सामाजिक स्वप्न का जो बुरा हाल हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। बिहार और उसके समाज का छंद जनतांत्रिक चेतना से अधिक वर्णतांत्रिक चेतना द्वारा ही पोषित हो रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में जनता की चित्तवृत्ति के अंदर जो द्वंद्व बने थे, उसे नवपरिप्रेक्ष्य प्रदान करने, संवेदनात्मक स्तर पर उस से जुड़ने के बजाय, किसी-न-किसी गफलत में पड़कर हमने अपेक्षा और उससे भी अधिक जिद यह रखी कि जनता की चित्तवृत्ति ही साहित्य की संवेदना से जुड़े! फणीश्वर नाथ रेणु का मैला आँचल आज भी मैला ही है, बल्कि पहले से अधिक मैला ही नहीं अधिक तार-तार भी हो गया है। बलदेव और महंत वैसे के वैसे  हैं। इन परिस्थतियों को बदलने के लिए कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं है। राजनीतिक-सांस्कृतिक सक्रियता, प्रगतिशील सामाजिक दबाव और समर्थन के अभाव में बदलाव की प्रक्रिया या तो अपने ठहराव में है या फिर अपने अंतर्विराधों के कारण भयावह विकृतियों का शिकार बन कर रह गई है। सामाजिक संस्तरण और संलयन की सकारात्मक प्रकिया ठप है। आर्थिक सुधार के इस हंगामे भरे समय में भूमि सुधार तो दूर, अब सामाजिक सुधार की बात भी नहीं होती। पंचायती व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन के राजनीतिक निकाय या तो हैं ही नहीं या फिर जहाँ हैं, वहाँ अपने आकांक्षित प्रभाव और रूप में नहीं हैं। गतिशीलता, चाहे वह प्रगतिशीलता हो या दुर्गतिशीलता और बदलाव, चाहे वह अच्छा हो या बुरा की इस तेज आँधी के समय में जब सबकुछ नये सिरे बनने और बिगड़ने के दौर के सम्मुख खड़ा है बिहार अपनी यथास्थिति में निस्तेज बना हुआ है। दुनिया रोज बनती है, लेकिन बिहार नहीं बनता है। यहाँ मिट्टी पानी ही बिगड़ गया है। कैसा नृशंस हो गया है सब कुछ कि यहाँ अभिसारिकाओं के मधुर गीत में पके धान की मदिर गंध नहीं चॉदनी रात का जहर पसरता है। यह किस नये इलाके में आकर हम ठहर गये मीत कि नीम रोशनी में भी दिन गुजारने के लिए न हीरामन का मन बचा है न हीराबाई अंर्तद्वंद्व। इतना बड़ा भारत, इतने पूत भारत माता के लेकिन बचा हुआ है सिर्फ अंडा, वह भी सड़ा हुआ ! जिस धुआँ को ढ़ूढ़ रहे थे बाबा उस धुआँ की आग यहाँ की ठिठुरती पूस की रात में यहाँ के किसी हल्कू के लिए प्राण रक्षक आग बनने के बदले आत्मदहन का सामान बन गयी है।झबरू भी तो नहीं है आज हल्कू के पास! हाँ बाबा यह भी लाल, वह भी लाल लेकिन ऐसा नहीं कोई माई का लाल कि बिहार को भी कर दे लाले लाल। बिहार के दुख की गाथा परती परिकथा है। बिहार कुंभीपाक है। यहाँ कोई हुँकार नहीं है। यहाँ कोई मुक्ति प्रसंग नहीं है। न आम्रपाली है न सुजाता है। यहाँ से ले कर वहाँ तक कहीं कोई नहीं है जो जरा ठहर कर बिहार और बिहारियों के बारे में दो मिनट का मौन चिंतन करे। आरोप और उपहास तो बहुत हैं परायों के भी और अपनों के भी लेकिन अपनापन, प्रेम पगा अपनापन? वह तो नदारद है! अपनों के भी, परायों के भी! कैसी ट्रेजडी है नीच। बहुत फटा हुआ है बिहार का मन। पोर-पोर दुख से सराबोर। खून और पसीने लतपथ। बिहार की सृजनशीलता की सीवन में बहुत दर्द है, बहुत दुख है। इस समय बिहार में नींद बहुत ज्यादा है सपने बहुत कम हैं। जवान दिमाग को तोड़कर उसमें नाजायज सपनों की खेती करनेवालों ने बिहार को कहीं का नहीं छोड़ा है। कहीं का नहीं! आत्म-युद्ध के चक्रवयूह में अंगुलिमालों से घिरे बिहार में दुख सिंगा की तरह बजता है। बिहार के दुख को कोई बुद्ध ही समझ सकता है। दिक्कत यह है कि प्रबुद्ध तो कई हैं पर बुद्ध कोई नहीं। गुलमुहर के तले किसकी प्रतीक्षा में खड़ा है, बुद्धू बना, दुख के भार से दबा हुआ नतग्रीव बिहार? बुद्ध की या अपनी भावी पीढ़ी की आँखों में समतामूलक, समृद्ध, पुलकित, परदुखकातर शक्तिशाली लोकतांत्रिक समाज को हासिल करने की आकांक्षा के सामाजिक स्वप्न बनकर धीरे-धीरे उतरने की! कौन जाने !
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