विरासत का बल: अयोध्या प्रसाद खत्री

विरासत का बल: अयोध्या प्रसाद खत्री
संदर्भः खड़ी बोली
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मुन्शी -शैली 
मौलवी-शैली 

पण्डित-शैली 

यूरेशियन-शैली 
यूरोपियन-शैली 
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दो पैरों पर एक धड़, 
फिर सिर पाँच अनूप। 
मुझ पँचरंगे पद्य का, 
देखो सुघर स्वरूप।
▬महावीर प्रसाद द्विवेदी
(सरस्वती: सितंबर, 1902)


1902 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ में हिंदी का स्वरूप निर्धारण इस प्रकार की चिंता का विषय था। इसके भी लगभग सौ साल पहले 1803 में हिंदी गद्य का नमूना तैयार करने की कोशिश शुरू हुई थी। खड़ी बोली हिंदी में कविता को भारतेंदु हरिश्चंद्र तक ने लगभग असंभव ही माना था। दुनिया की भाषा के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा उदाहरण हो जब किसी भाषा ने मात्र सौ-दो-सौ साल में इतनी तरक्की की हो। वर्त्तमान स्तर तक पहुँचने में हिंदी को बौद्धिक ही नहीं, सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष भी करना पड़ा है। ऊपर जिन पाँच शैलियों का उल्लेख है उनके ऐतिहासिक रूप पर विचार करते हुए, यह भी ध्यान में रखने की बात है कि आज हिंदी की अड़तालीस बोलियाँ हैं। अड़तालीस बोलियों के होने का मतलब है, हिंदी के अड़तालीस ग्रामीण रूपों का होना। इसके अलावे भारत के लगभग सभी शहरों में हिंदी बोली जाती है। सभी शहरों की हिंदी की अपनी अलग पहचान है। कोलकाता, मुंबई, चेन्नै, बंगलूर, हैदराबाद आदि जैसे अ-हिंदीभाषी समझे जानेवाले शहरों की हिंदी की अपनी अलग पहचान है तो हिंदी भाषी समझे जानेवाले शहरों की ओर देखें तो, पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, लखनऊ, बनारस, जालंधर, चंडीगढ़, दिल्ली, राँची आदि में बोली जानेवाली हिंदी की भी अपनी अलग-अलग पहचान है। यह अलग पहचान बोली जानेवाली हिंदी की है, कभी-कभी सजर्नात्मक साहित्य में स्थानिकता के अपने उचित दबाव के चलते, इस बोली जानेवाली शैली का उपयोग लिखित साहित्य में भी देखने को मिलता है। बावजूद इसके यह माना जा सकता है कि विचार साहित्य की भाषा का लिखित रूप लगभग समान है। यह समान रूप विभिन्न शहरों से निकलनेवाले समाचार पत्रों की भाषा में सहज ही देखने को मिल सकता है। लिखित भाषा में एकरूपता और बोलचाल की भाषा में बहुरूपता का गढ़न और चलन भारत के संघात्मक ढाँचे के अनुकूल है। लेकिन इधर जीवन में लिखित से ज्यादा बोलने का महत्त्व बन रहा है। लिखनेवाले से अधिक बोलनेवाले के बौद्धिक हस्तक्षेप, प्रभाव और प्रसार की ताकत में वृद्धि हुई है। भाषा का कारगर इस्तेमाल विज्ञापन में भी होता है। पहले विज्ञापनों का लिखित रूप ही इस्तेमाल में था। रेडियो ने उस लिखित को बोलनेवाले रूप में ढाला। दूरदर्शन के व्यापक प्रसार के साथ विज्ञापनों में बोलने का महत्त्व बढ़ा है।

तात्पर्य यह कि समाचार, विचार और प्रचार में बोलने का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है।यद्यपि इस बोली गई भाषा की पृष्ठभूमि में लिखित भाषा की अदृश्य उपस्थिति बनी रहती है, तथापि महत्त्व तो दृश्यता से बनता है। बोलने के महत्त्व के बढ़ने से संकेत मिल रहे हैं कि हिंदी फिर अपने नये रूप को पाने की ओर बढ़ रही है।

खड़ी बोली के गठन का समय भारतीय राष्ट्रीयता के गठन का भी समय था। कहना न होगा कि राष्ट्रीयता के गठन का प्रिंट से गहरा रिश्ता रहा है। प्रिंट के घटते महत्त्व का संबंध राष्ट्रबोध में आये घटाव से कितना और कैसा है, यह भी विचारणीय है। इस संदर्भ में देखें तो खड़ी बोली के हिंदी में विकसित होने की पृष्ठभूमि थेाड़ी स्पष्ट जरूर होती है। एक बात और जिस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, हालाँकि यहाँ इस प्रसंग में हम अपने विचार को सिर्फ हिंदी और उर्दू तक सीमित रखेंगे। हिंदी और उर्दू के बीच के विवाद के प्रारंभ का संबंध मूलत: प्रिंट अर्थात भाषा के छापा रूप से है। इस प्रिंट का संबंध राष्ट्रीयता से है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो प्रिंट का संबंध अपनी तार्किकता में द्विराष्ट्रीयता से तो संबंधित है ही अब बहुराष्ट्रीयतातक भी फैलती नजर आती है।

अपने वर्तमान स्तर तक पहुँचने में हिंदी को काफी बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष भी करना पड़ है। इस संघर्ष में जिन लोगों की महती भूमिका रही है, उनमें अयोध्या प्रसाद खत्री का नाम बहुत ही आदर से लिये जाने योग्य है। हिंदी की उत्पत्ति के संदर्भ में कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है। जैसे,`आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता लल्लू लाल कवि ने अपनी पुस्तक प्रेमसागर की भूमिका में हिन्दी की उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार किया है, यावनी शब्द छोड़ दिल्ली आगरे की खड़ी बोली में यह नाम प्रेमसागर धरा। दिल्ली, आगरे की भाषा उर्दू कहलाती है। उर्दू में फारसी शब्द का स्थान संस्कृत शब्द रखकर आधुनिक हिन्दी बनी। तब हिन्दी और उर्दू दो भाषा कैसे कही जावेगी?’1

प्रेमसागर के प्रकाशित होने से आधुनिक हिन्दी का जन्म समझा जाता है। सन् 1803 ई. में प्रेमसागर बनना प्रारंभ हुआ और सन् 1809 में पूरा होकर छपा। यह बात प्रेमसागर की भूमिका से प्रगट है।
अंगरेजी की भांति हिंदी हमारी समझ में कालानुक्रम से तीन भागों में विभक्त हो सकती है।
प्रथम ▬ प्राचीन या चंद के समय से मलिक मुहम्मद जाइसी तक अथवा कहिये पृथ्वीराज से हुमायूँ तक।
द्वितीय▬ मध्यकालीन या व्रजभाषा। इसका सूरदास अर्थात् अकबर के समय से आरंभ है और कविता में यह अभी तक जीवित है यद्यपि हरिश्चंद्र के साथ इसकी समाप्ति कही जा सकती है।
तृतीय▬ नवीन वा खड़ी हिंदी। यह हिंदी यद्यपि बोलचाल में न्यूनाधिक तब से व्यवहृत समझनी चाहिए जबसे दिल्ली आगरे में उर्दू बोली जाने लगी परंतु लेख के रूप में यह लल्लूजी के प्रेमसागर ही में पहले देखने में आती है ज्ञ् इसलिये तभी से इसका जन्म समझना चाहिये। परंतु तब से अब इसका कुछ रूप रंग बदल गया है और बंगाली का अनुकरण करके वह उस दशा को पहुँचती है जो आजकल के गद्य ग्रंथ और समाचार पत्रों में दर्शित है।2
खड़ी हिंदी कविता में उर्दू नहीं घुसने पावेगी। जब हम हिंदी की प्रतिष्ठा के परिरक्षण में सदा सचेत रहेंगे तो उर्दू की ताव क्या जो चौखट के पांव रख सके। सर्कार अपने स्कूलों को हिंदी में अप्रचलित उर्दू शब्दों का बर्ताव करती है, पर हिंदी के पक्षपाती तो उसके अनुयायी नहीं, हिंदी के गद्य वा पद्य की उन्नति हमलोगों पर निर्भर पर है सर्कार पर नहीं।3

इस प्रकार यह बात स्पष्ट होती है कि हिंदी के पहले उर्दू का चलन प्रारंभ हो गया था। लेकिन उर्दू के भाषिक ढाँचा में संस्कृत मूल से आये शब्दों के अनुप्रवेश से एक नई भाषा आकार पा रही थी। इस भाषा के बनने में बहुत सारी बाधाएँ थी। इसकी वैयाकरणिक कोटियाँ मूल रूप से खड़ी बोली से बन रही थी। लेकिन जिन्हें आज हिंदी प्रदेश कहा और समझा जाता है उन क्षेत्रों में प्रचलित भाषा से इसका पार्थक्य भी स्पष्ट था। याद करना जरूरी है कि कुछ मामलों में बंगाली का अनुकरण करके वह उस दशा को पहुँचती है जो आजकल के गद्य ग्रंथ और समाचार पत्रों में दर्शित है।4 बंगला ही नहीं भारत की अन्य भाषाओं समेत अंग्रेजी से भी बहुत कुछ अपनाने के लिए हिंदी अपने को तैयार कर रही थी। भारतीय संविधान ने राज-काज की भाषा के रूप में हिंदी के जिस सवरूप को स्वीकारा है उस पर ध्यान देने से भी यह बात साफ होती है। नई चीज अपनाई जाती है तो कुछ पुरानी चीजों की तिलांजलि भी स्वाभाविक ही होती है। जिन क्षेत्रों को आज हिंदी क्षेत्र माना और समझा जाता है वहाँ के कई भाषिक रूपों की तिलांजलि के लिए भी हिंदी अपने को तैयार कर रही थी। इसी तैयारी के बल पर हिंदी का अखिल भारतीय स्वरूप बन रहा था।

तात्पर्य यह कि अखिल भारतीय स्वरूप को पाने के लिए हिंदी को अन्य भाषिक तत्त्वों को अपनाने और अपने भाषिक तत्त्वों को छोड़ने की अंतरपीड़ाओं से गुजरना पड़ा। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई अरबी-फारसी मूल से आये शब्दों के साथ बरताव को लेकर थी। भाषा के साथ धर्म के जुड़ाव और सांप्रदायिक मनोभाव के सक्रिय बनने से इस कठिनाई में निविष्ट सामाजिक कातरता से हिंदी के गढ़न को जटिल राजनीतिक चुनौती से भी जूझना पड़ रहा था। लगभग सभी भारतीय भाषाओं में अरबी-फारसी मूल के तत्सम और तद्भव शब्दों के साथ ही संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों का भरपूर प्रचलन आज भी है। `प्रिंट' में हिंदी और उर्दू के अलग होने के कारण एक विचित्र संकट सामने आया। उर्दू के भाषिक तत्त्वों को अपनाने और छोड़ने में सबसे अधिक कठिनाई सामने आई। प्रिंट के आधार पर तैयार होनेवाले राष्ट्रबोध के कारण हिंदी-उर्दू दो राष्ट्रीयताओं से जुड़ गई। कहना न होगा कि राष्ट्रबोध सांस्कृतिक नहीं एक प्रकार का राजनीतिकबोध है। इस राजनीतिकबोध ने सदियों में पनपी साझी संस्कृति को तहस-नहस कर दिया। इस राजनीतिकबोध के कारण चूँकि उर्दू में अरबी-फारसी मूल के शब्दों के प्रति जिद की हद तक आग्रह सक्रिय होकर स्थानापन्न राष्ट्रवाद का आधार तैयार कर रहा था इसलिए हिंदी के हितैषीभी सावधान थे कि खड़ी हिंदी कविता में उर्दू नहीं घुसने पावेगी। जब हम हिंदी की प्रतिष्ठा के परिरक्षण में सदा सचेत रहेंगे तो उर्दू की ताव क्या जो चौखट के पांव रख सके।5

अयोध्या प्रसाद खत्री ने हिंदी में कविता की संभावनाओं की तलाश करते हुए उस हिंदी को हासिल करना चाहते थे जो अपने समय के झंझावातों को झेलकर भारतीय राष्ट्रबोध के नैसर्गिक आधार को तैयार कर सके। कहना न होगा कि साहित्यिक, सामाजिक और रजनीतिक अवरोधों को पार करते हुए हिंदी धीरे-धीरे उस नैसर्गिक आधार को हासिल करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ी। पलटकर देखें तो, हिंदी में कविता लिखने को अधिकतर विद्वान असंभव मानकर चल रहे थे और अयोध्या प्रसाद खत्री इसकी गहन संभावनाओं के प्रति संघर्षशील थे। बहुत ही अचरज होता है कि अयोध्या प्रसाद खत्री के निधन के डेढ़ दशक के अंदर ही भाषिक दृष्टि से समृद्ध छायावाद जैसे हिंदी कविता युग का सूत्रापत होता है। भाषिक भंगिमाओं के स्तर पर ही नहीं अपनी अंतर्वस्तु के आधार पर भी छायावद ने अपने समय से जिस तरह का साहित्यिक संवाद स्थापित किया वह दुनिया के साहित्यिक इतिहास में विरल है। यह अलग बात है कि गद्य में जिस भाषिक भंगिमा और अंतर्वस्तु के साथ उसी समय प्रेमचंद साहित्य हिंदी में संभव हुआ वह अधिक प्रकृत था। लेकिन हिंदी के सामने उपस्थित काव्य चुनौती का मुकाबला जिस ताकत के साथ छायावाद ने किया वह तो अपने-आप में अप्रतिम है ही। छायावाद और प्रेमचंद साहित्य के भाषिक और अंतर्वस्तुगत सरोकारों की अंतर्निहित वैधताओं के ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य पर अलग से बात की जा सकती है। यहाँ तो इतना ही प्रासंगिक है कि छायावाद और प्रेमचंद साहित्य ने मिलकर हिंदी को वह नैसर्गिक आधार प्रदान किया जिसपर चलते हुए हिंदी को पीछे पलटकर देखने की जरूरत नहीं रह गई। बदली हुई परिस्थिति में जिस ढंग से हिंदी ने अपने को गढ़ा वह भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित सामासिक एकता का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

आज फिर हिंदी के सामने नई चुनौतियाँ हैं। इस बार नई चुनौती प्रिंट के मार्फत नहीं आई है। इस बार की चुनौती को हिंदी की e-च्छा (electronic) के मार्फत ही समझा जा सकता है। मुन्शी-शैली, मौलवी-शैली, पण्डित-शैली, से आगे बढ़कर हिंदी के समाने यूरेशियन-शैली और यूरोपियन-शैली से अपने बरताव को ठीक से समझना होगा। भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया एक प्रकार के भाषिक परिवर्त्तन के दौर से गुजर रही है। नव-औपनिवेशिकता की वाहक वैश्विक भाषा भी अंग्रेजी ही है। अंग्रेजी का वर्चस्व न सिर्फ भाषा के स्तर पर बल्कि बौद्धिकता की अंतर्वस्तुओं के आधार पर भी बढ़ रहा है। वैयाकरणिक कोटियों में तो नहीं लेकिन शब्दावली के संदर्भ में यह बात अधिक स्पष्टता से समझी जा सकती है। संक्रमण और संकरन के इस युग में भाषाओं में भी संक्रमण और संकरन की प्रक्रिया तेज हो रही है। शब्दावलियों के बाद संकरन की प्रक्रिया का अगला पड़ाव लिपि है। पिछले लगभग सौ साल में हिंदी इतनी बदली है; तो अगले सौ साल में इसका सवरूप कैसा होगा! इसका अनुमान लगाना भी कष्टकर है। कोई अयोध्या प्रसाद खत्री ही यह कष्ट साध्य अनुमान कर सकता है। कष्ट चाहे जितना हो लेकिन एक बात साफ है कि इस तरह का कोई बड़ा बदलाव होता है तो वह यूरेशियन-शैली और, यूरोपियन-शैली की तरह का हो सकता है। आज दक्षिण एशिया में भारत का विकास जिस तरह से हो रहा है उसकी जरूरतों के अनुरूप यह बदलाव स्वाभाविक भी कहा जा सकता है। अयोध्या प्रसाद खत्री ने हिंदी के लिए जिस प्रकार का बौद्धिक उद्यम किया वह प्रणम्य है। अयोध्या प्रसाद खत्री का निधन 4 जनवरी 1905 को हुआ था। उनकी मृत्यु की शतवार्षिकी पर नलिनविलोचन शर्मा की टिप्पणी  आज भी उतनी ही सत्य है जितनी 1960 में थी, उन्हीं के शब्दों में, अयोध्याप्रसाद खत्री ने खड़ी बोली, यानी आधुनिक हिंदी, के साहित्य के प्रमुख अंग, काव्य, को उसका उचित स्थान दिलाने में ▬ उनसे जो इसके विरोध के लिए कटिबद्ध थे ▬ जो कार्य किया था, वह अब, जब हम सारी चीज को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की स्थिति में हैं, इतना महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है कि हम समझ नहीं पाते कि उनके समसामयिकों ने, या उनके तुरत बाद के लोगों ने, उनकी दूरदर्शिता, निष्ठा एवं प्रचेष्टा की उपेक्षा क्यों की!6

हिंदी के विकास में अयोध्या प्रसाद खत्री के महत्त्व को नये सिरे से समझने की जरूरत है। अपनी विरासत के महत्त्व से सदा उदासीन हिंदी समाज को नये दौर में अपने को अधिक सचेत बनाना है। विरासत से बल मिलता है, यदि हम में विरासत को बचाने का बल हो। विरासत को बचाना कठिन काम होता है। क्या यह कठिन काम हो सकेगा? आनेवाला समय ही बता पायेगा।




1भुवनेश्वरनाथ मिश्रः खड़ी बोली आंदोलनः खत्री-स्मारक ग्रंथः बिहार-राष्ट्र-भाषा-परिषद्, पटना, 1960
2श्रीधर पाठकः खड़ी बोली आंदोलनः खत्री-स्मारक ग्रंथः बिहार-राष्ट्र-भाषा-परिषद्, पटना, 1960
3श्रीधर पाठकः खड़ी बोली आंदोलनः खत्री-स्मारक ग्रंथः बिहार-राष्ट्र-भाषा-परिषद्, पटना, 1960
4श्रीधर पाठकः खड़ी बोली आंदोलनः खत्री-स्मारक ग्रंथः बिहार-राष्ट्र-भाषा-परिषद्, पटना, 1960
5श्रीधर पाठकः खड़ी बोली आंदोलनः खत्री-स्मारक ग्रंथः बिहार-राष्ट्र-भाषा-परिषद्, पटना, 1960
6नलिनविलोचन शर्माः भूनिका-2: खत्री-स्मारक ग्रंथः बिहार-राष्ट्र-भाषा-परिषद्, पटना, 1960


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