नहीं मेरे महबूब नहीं

नहीं मेरे महबूब नहीं

नहीं मेरे महबूब नहीं,
इस तरह से तो नहीं सोचा था कभी
रातें इतनी गर्म होंगी और
दिन में उजाला इतना कम होगा
इस तरह से कभी सोचा था
हकीकतों से नजर चुराकर हम विचरते रहे हैं
अपने हिस्से के अननंत में
हकीकतों की आँख में भी झाँका है,
जमीन पर खड़े होकर बेखौफ कई बार
मुहब्बत करनेवालों के हिस्से में यातनाएँ ही आती हैं
गवाह हैं वो जिंदगियाँ जिन्होंने बेपनाह मुहब्बत की है ▬▬
अपने वतन से महबूब की तरह या
जिन्होंने महबूब को चाहा वतन की तरह
सच के साथ लिपटा हुआ झूठ जीवन में चला आता है बार-बार
रिश्ते चाहे जितने पुराने हों गलतफहमियों की गुंजाइश बनी रह जाती है

नहीं मेरे महबूब नहीं,
इस तरह से तो नहीं सोचा था कभी
रातें इतनी गर्म होंगी और
दिन में उजाला इतना कम होगा

हवाओं में बहुत तुर्शी है,
इन दिनों ख्वाबों में मातमपुर्सी है
नहीं मेरे महबूब नहीं,
इस तरह से तो नहीं सोचा था कभी
रातें इतनी गर्म होंगी और
दिन में उजाला इतना कम होगा

तुम्हारी सुरमई आँखों का छलछलानाबार-बार
उसी तूफान का साँसों में उठना,
धक-धकाना कलेजे का
बिफर जाना उस एक बात पर
इतिहास की तरह बिदकना उसका
रंगों का शरमाना और शरमाकर अपने में
इस तरह सिमट जाना
बाहर से गिरनेवाले बूँदों के खिलाफ
छाता की तरह तन जाना मुमकिन है
मुमकिन नहीं है,
अपनों के आँसुओं की चोट से दिल को बचाना ▬▬
▬▬ छाता की तरह तन जाना हर दुख के अंतरंग में

नहीं मेरे महबूब नहीं,
इस तरह से तो नहीं सोचा था कभी कि
रातें इतनी गर्म होंगी और
दिन में उजाला इतना कम होगा

आँसुओं से मुहब्बत के पौधे को पुरजोर सींचनेवाले
काँटों को भी फूल में बदल देते हैं,
उदासी को नगमों की तरह गा लेते हैं
दुख को मुसकान से पोछ लेते हैं,
फिर खड़े हो जाते हैं, गिरते हैं जितने भी बार
यों ही जीतती आई है मुहब्बत हर जंग को
अब तक सभ्यता के आर-पार

नहीं मेरे महबूब नहीं,
इस तरह से तो नहीं सोचा था कभी!
रातें इतनी गर्म होंगी
और दिन में उजाला इतना कम होगा!

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