शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

सपना और साहस

सपना और साहस

जब रात का सन्नाटा तारी हो
पेट भरा हो
तब अपने भीतर के शोर और सवाल को
होशियार लोग
पाँव से निकाले गये मौजे की तरह
अपने कीमती जूते में घुसेड़ कर
किसी बहुराष्ट्रीय सपने में घुसने की तैयारी करते हैं

सभ्यता के कायदे से जूता पहनकर
सपनों में टहलना गुनाह है

सपनों को शोर पसंद नहीं
सपनों को सवाल पसंद नहीं

निस्पंद प्रवाह सपना को प्रिय है
उड़ते हुए बादलों के टुकड़ों के संग
फूलों की घाटी में खेलती हुई चाँदनी का
सपनों में होना बेहद जरूरी है

सपनों के लिए जरूरी है
और भी बहुत कुछ -
- जैसे साहस

सपना विहीन जीवन व्यर्थ है
और साहस विहीन सपना ऐय्याशी
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