नालंदा में धुआँ

नालंदा में धुआँ
                                                 
नौ महीने तक लगातार उठता रहा था धुआँ
पूरा आसमान गहरे काले गंदुमी रंग से भर गया था
लोग-बाग यद्यपि अपने-अपने काम में व्यस्त थे
राजा राज-काज, न्याय-नियंत्रण, शासन-प्रशासन में
ब्राह्मण पूजा-पाठ , यज्ञ- होम-प्रसाद में
गोरखी गाय-बैल-बकरी  के गोठ में
प्रेमी देहयष्टि, काया-कर्म,
अक्षय अमृत के स्रोत प्रेमिका के ओठ में
गृहस्थ दाना-पानी अतिथि सत्कार में
दार्शनिक गहन विमर्श और व्यवहार में
मुर्गे बांगने में, गाय रंभाने में,
मछलियां पानी के बीच छिछलने में
बच्चे चीका, कबड्डी, खोखो, अटकन-मटकन में
भ्रूण मातृकुक्षि के अंध विवर के भीतर विकसित होने में 

सिर्फ धुआँ उठता रहा था लगातार नौ महीने तक  नालंदा में
इतिहास इतना बताकर चुप हो जाता है या चुक जाता है
इतिहास कैसे चुप हो जाता है या चुक जाता है
यह तो शायद बता पायें सुमित सरकार या कोई सरकार
वैसे यह बहस की नहीं बूझने की चीज है
खैर सच है कि बहुत सारे लोग
नालंदा को सिर्फ इसलिए ही जानते हैं कि
वह नौ महीने तक जलता रहा था लगातार
तब से लेकर अब तक में क्या कुछ होता रहा है नालंदा में
कितनी बार वह पानी में डूबा कितनी बार आँसुओं में
खून में डूबा कितनी बार कितनी बार ग्लानि में
किसी के पास कोई हिसाब नहीं
यह बताने के लिए नालंदा के पास भी कोई किताब नहीं है
पुरसुकून यह है कि फिर भी नालंदा है और रहेगा
हत्यारे चाहे जितना भेष बदलें, अंतत: पहचान ही लिये जाते हैं
इतिहास भले चुप हो जाये या चुक ही जाये
लेकिन काल  जानता है मकतूल ही नहीं
अंतत: कातिल भी कूच करते हैं
आज भी दर्द बोलता है नालंदा में `नालंदा'
‘नालंदा’ आज भी रोता है
‘नालंदा’ आज भी जल रहा है नालंदा में
चाहे जितना गाढ़ा हो धुआँ वह मेघदूत नहीं, नालंदा जानता है
नालंदा जानता है कि ‘नालंदा’ में धुआँ ही धुआँ है
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