शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

द्रौपदी की क्षेपक हँसी

द्रौपदी की क्षेपक हँसी

महाभारत को समाप्त हुए काफी समय बीत गया था
योद्धा युद्ध के मैदान में जो काम नहीं आ सके थे
अपने- अपने घरों में काम आ रहे थे
पत्नियाँ उनकी नाराज रहा करती थीं
बच्चे उन से बेगाने रहा करते थे
समाज उनसे बे-असर 
धनुषटंकार की अनुगूंजों को अपने अंदर कराहते हुए पाकर
वे अपने दुख की बुनियाद में अकेले पत्थर की तरह गड़े थे

कोई आशा, कोई नैतिकता, कोई नियम,
गीता का कोई छंद, जो सुनाया तो अर्जुन को गया था
लेकिन सुना था सभी ने उतने ही मनोयोग और विश्वास से
अब उनके किसी काम का नहीं रहा था

सारे योद्धा विशृंखल हो गये थे, पस्त पराक्रम
बिखरे हुए सूत्रों की तरह अवसन्न, फटे हुए अहं की तरह
जब भी बादल छाते थे लोगों के मन पर
द्रौपदी के खुले केश का आतंक बरसने लगता  था

ऐसी ही घड़ी में हिमालय की याद आयी थी घर्मराज को
वे बहुत तेजी से हिमालय की ओर मुड़ गये थे
रास्ते में कुछ कबंधों को दोनो हाथों में खड़ग लिए
एक दूसरे से काफी दूर  नृत्य की मुद्रा में
अंगसंचालन करते देख चकित रह गयी थी द्रौपदी

पूछा था विस्मित होकर --
हे धर्मराज, ये कौन हैं  और क्या कर रहे हैं ?
बहुत विचलित हो गया धर्मराज का मन इस प्रश्न से
क्योंकि अंतत: विचलन ही बचता है  ऐसे प्रश्नों के बाद

व्यथित होकर कहा था धर्मराज ने
क्योंकि कहना उनकी जिम्मेवारी थी –
-- ये वे योद्धा हैं सु-भगे
जिनके सिर उनके धड़ से बीच महाभारत में अलग हो गये थे
इन्हें महाभारत के नतीजे का पता ही नहीं है
ये अब भी लड़े जा रहे हैं इन्हें प्रणाम करो सु-भगे

उनके लड़ने पर या प्रणाम के प्रस्ताव पर पता नहीं
बेहद हँसी थी द्रौपदी, हँसती ही जा रही थी, एक क्षेपक हँसी

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