शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

नंदनकानन के बाघ

नंदनकानन के बाघ

नंदनकानन के बाघ मर रहे हैं
बाघ सभा में इस पर गहरा रोष उभर कर सामने आया
बाघ में असुरक्षा की बात भी  उठी और बढ़ती बेचैनी की भी
बाघ सभ्यता के खतरों पर चिंता की लकीर धीरे-धीरे
गाढ़ी  होती गयी
बाघ बच्चा को अपने पैदा होने पर ही असंतोष था, अफसोस भी

बाघ बौद्धिकने लगभग चीखते हुए कहा :
सभी मारे जाएँगे एक दिन
मध्यकाल के एक  बाघ कवि का हवाला दिया
सवाल यह नहीं है कि बाघ मर कैसे रहे हैं
सवाल यह है कि बाघ जिया कैसे करते हैं और यह भी कि
बाघ की मौत का मतलब क्या होता है
एक लंबी साँस का अंतराल :
बाघ सभा में एक मोटी खामोशी
आसन बदलकर बाघ कवि ने कहा
बाघ की मौत का सिलसिला तब शुरू हुआ
जब बाघ ने वन के बदले कानन में रहना स्वीकार कर लिया
फिर आगे चलकर बिना किसी सार्थक और सफल प्रतिवाद के
चिड़ियाखाना और सर्कस की 
आराम तलब चाकरी को अपना लिया
इतना ही नहीं सिंह जी कविता में उतरकर
बाघंबरी त्रिलोचन की तीसरी आँख की चमक बनने पर भी
उसे कोई खास एतराज नहीं हुआ
यहाँ तक भी शायद गनीमत थी लेकिन

अब हद यह कि
सांसारिक जरूरतों से मुक्त होने की मरीचिका में फँसकर बाघ ने
दुनिया भर के कंप्यूटरों में
उसके इशारे पर जीना स्वीकार कर लिया है !
बाघ की मौत का सिलसिला कोई एक दिन में शुरू नहीं हुआ

सच है , व्यथित बाघ वैज्ञानिक ने चेतावनी दी --
बाघ घास नहीं खाते लेकिन उन्हें घास की चिंता करनी होगी

बाघ सभा इस अपमाजनक प्रस्ताव पर परेशान - सी हो गयी
तिलमिलाकर एक ने दूसरे से कहा, बाघ और घास की चिंता !
यह प्रस्ताव जंगल में आग की तरह पसरती रही
असली मौत तो यही है, बाघ इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

परेशान तो बाघ वैज्ञानिक भी कम नहीं था और अपमानित भी
लेकिन कोई चारा नहीं था
बचना है बाघ को  तो घास की चिंता करनी ही होगी

अब वह महामहिम को संबोधित था --
महाराज मैं बाघ-भावना को समझ सकता हूँ मगर
बाघ जिनके बल पर जिंदा रहते हैं
वे क्षुद्र घास के बिना जिंदा नहीं रह सकते हैं, महाराज!

स्थिति की नजाकत को भाँपते हुए बाघ महाराज ने कहा
असल मुसीबत की जड़ यह लोकतंत्र है
बाघ इसी लोकतंत्र से मरते हैं।

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