शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

जरूरी है देश

जरूरी है देश

मूसलधार वर्षा के बाद उगी धूप में
खिलखिला उठती है बरसाती पनाली
जब किसी बूढ़े वृक्ष के बिछे हुए तने पर
फुदकते हुए पार हो जाती है नन्ही गिलहरी

सहम उठता है वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
आदमी और आदमी के बीच, आदमी और प्रकृति के बीच
अविश्वास का धुआँ, होता चला गया है इतना घना
कि वह अब, जोड़ने की किसी तमीज तक
उसे पहुँचाने में असमर्थ है, कि प्रकृति का समर्थ संकेत भी
आदमी के लिए व्यर्थ है

स्तब्ध है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
अब कोई मरणासन्न बूढ़ा, अपने बेटों को एकता का
पाठ पढ़ाने के बहाने, उसकी सूखी टहनियों को
जोड़कर एक नहीं करता

क्षुब्ध है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
दुनिया के विश्वग्राम में बदलते जाने पर वे भी
नाच में शामिल हैं,जिनका अपना गाँव
उजड़ गया है इस आँधी में

दुखी है, बहुत दुखी है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
उसने आदमी और आदमी के बीच बढ़ती दूरियाँ देखी हैं
संततियों के लगातार दूर होते जाने की
बनती मजबूरियाँ देखी है

बहुत परेशान है, वृक्ष का बिछा हुआ तना कि
कोई ईश्वर नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई ग्रंथ नहीं,
कोई ज्ञान नहीं, कोई विज्ञान नहीं, कोई विवेक नहीं
जो एहसास करा सके आदमी को कि जब नैया डूबती है
तब बचते वे भी नहीं, जिनके पैर में
खूबसूरत, चमकदार, कीमती जूते होते हैं

जब डूबता है देश, तब डूब जाते हैं, सारे महेश-गणेश-सुरेश
इसलिए जरूरी है देश -
नारे की शक्ल में, मगर पत्थर की तरह उछाल भर देने से
जरूरत की परवरिश नहीं हो जाती है

सहमा हुआ, स्तब्ध, दुखी, परेशान वृक्ष का बिछा हुआ तना
आज भी लुकाठी की तरह जलने को है तैयार
उसे बस कबीरायी साहस का है इंतजार

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