बुधवार, 20 जनवरी 2016

चाँद को ऐतराज है बहुत

विकास पुरुष चाँदनी को
जेब में डाल लेने पर आमादा है

चाँद को इस बात पर ऐतराज है
ऐतराज चाँदनी को भी है

मुश्किल यह कि
चाँदनी को समेटकर रखना
चाँद के बूते में नहीं है और
सच तो यह है कि
चाँदनी को समेटकर रखना
चाँदनी के बूते में भी नहीं है

मजबूरी यह कि
विकास पुरुष की जेब के
फैलाव को
रोकना संभव नहीं
सच तो यह है कि
चाँद जेब में है, चाँदनी भी
और जुबान पर है देशभक्ति

यह सब है मेरी जान और
इस वक्त मैं बहुत परेशान
परेशान कि मैं घिर गया हूँ
उनके बीच जो माहिर हैं
आँख से आँसू
रगों से खून
जिस्म से पसीना
प्रतिभा से प्राण
दिल से अरमान
जीवन से पानी
चेहरे से मुस्कान
हौसले से हुलास
निचोड़ लेने में माहिर हैं
सितारों के बुझ जाने पर
जश्न में शामिल लोगों से
घिर गया है वक्त

वह फूल कहाँ से लाऊँ जो
जान और जिस्म को
खुशबू की चमक से भर दे
चाँद को ऐतराज़ है बहुत

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