इतिहास के आइने में हाल-फिलहाल

इतिहास के आइने में हाल-फिलहाल

1757 में इस्ट इंडिया की जीत के बाद से भारत में ब्रिटिश राज का प्रारंभ हो गया। वारेन हेस्टिंग्स और रॉबर्ट क्लाइव को ब्रिटिश राज की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। 1773 से 1785 तक वारेन हेस्टिंग्स फोर्ट विलियम प्रेसिडेंसी (बंगाल) के प्रथम गवर्नर जेनरल रहे जो वस्तुतः भारत के पहले गवर्नर जेनरल थे। हालाँकि पहले अधिकारिक गवर्नर जनरल लार्ट विलियम बेंटिक थे, जिनके शासन काल में राजा राम मोहन राय के प्रयास से सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा।  1773 से 1785 तक वारेन हेस्टिंग्स अपने पद पर बने रहे। 1787 में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उन पर महाभियोग लगाया गया। हालाँकि, 1795 में वे बरी हो गये और 1814 में प्रिवी काउंसिलर भी बन गये। महत्वपूर्ण यह है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भ्रष्टाचार और सत्ता के प्रशासनिक दुरुपयोग के मामले में शासक पर महाभियोग लगा, गहन जाँच प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि इस के पीछे कई कारण सक्रिय थे, औपनिवेशिक अंतर्विरोध और भिन्न हित-मत आदि। इस महाभियोग का नेतृत्व एडमंड बर्क ने किया। उन पर आरोप क्या थे, आज महाभियोग के कुछ बिंदुओं को याद करना आज हमारे लिए दिलचस्प हो सकता है। वे कुछ थे, ग्रेट ब्रिटेन के संसदीय विश्वास के साथ धोखा, ब्रिटेन के राष्ट्रीय चरित्र को कलंकित करना, भारतवासियों के अधिकारों और स्वतंत्रता का अतिक्रमण, भारत की संपदा का विनाश।

महत्त्वपूर्ण यह है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भी जनता को कष्ट में डालने पर महाभियोग लगता था। कानूनी कार्रवाई होती थी। एक बात साफ-साफ कहना जरूरी है। इस संदर्भ को न्यायपूर्ण व्यवस्था या जन हितैषी सोच का उदाहरण नहीं माना जा सकता है। लोकतांत्रिक शासकों को भी शामिल करते हुए भी फिलहाल सोचा जा सकता है कि क्या शासकों के अंतर्विरोध से उत्पन्न टकराव जो ऊपर से  न्यायपूर्ण और जनहितैषी दिखते तो हैं, क्या सचमुच वे न्यायपूर्ण और जनहितैषी होते भी हैं! पता नहीं, इतिहासकार और विद्वान लोग बेहतर निष्कर्ष निकाल सकते हैं। मेरे जैसे साधारण नागरिक के अधकचरा ज्ञानवाले उत्तप्त मन में नाना-नाना तरह की फालतू सवालिया तरंगें तो यूँ ही उठती रहती हैं।

लिखाता नहीं है इंक्लाब

लिखता हूँ इश्क
लिखा जाता है पेंशन 

लिखता हूँ इश्क 
लिखा जाता है दवाई

लिखता हूँ इश्क 
लिखा जाता है दुहाई सरकार

ऐसा नहीं कि यह है चमत्कार
युवाओं के साथ भी होता होगा 
कुछ इसी प्रकार। 

क्या पता नहीं भी होता होगा!
उन के माथे पर तो 
लदता गया है असह्य भार!
जरूरी नहीं कि वे लिखते होंगे रोजगार 
और हो जाता होगा वह कुछ और! 

लब्बोलुआब! 
लिखो कुछ भी। 
लिखाता नहीं है इंक्लाब! 

इंतजार

इंतजार

रहता था पहले किसी-न-किसी का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता अब किसी का कोई इंतजार


पहले रहता था बहुत सारी चीजों का इंतजार

कहीं से कोई चिट्ठी-पत्री आये 

इंतजार रहता था डाकिये का

डाकिया तब मेरे इंतजार का एक सब-से बड़ा आसरा था


जिंदगी थोड़ी व्यवस्थित हुई 

राष्ट्रीय पुस्तकालय की सीढ़ियों पर

किसी वृक्ष की छाँव में 

कभी बैठकर, कभी लेटकर इंजार रहता था

मित्रों का संभावनाओं से भरे हुए कवियों का


हमेशा रहता था इंतजार घड़ी के काँटों के घूमने का

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

रहता था पहले किसी-न-किसी का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता अब किसी का कोई इंतजार



प्रेमिकाएँ तो थी नहीं, न उनके होने की कोई गुंजाइश थी

फिर भी उनका इंतजार रहता था

सब से ज्यादा इंतजार रहता था संपादकों के रुख का

पत्रिकाओं का, कविताओं को, कहानियों का

उत्तेजनाओं से भरा इंतजार


काम पर जाता था समय से

वेतन मिल जाता था समय पर

चल रही थी गृहस्थी, पूरा परिवार माथे पर था

लेकिन तब वह सब बोझ नहीं था

न कहूँगा कि इनके मुतल्लिक कोई इंतजार नहीं रहता था

रहता था जरूर मगर उस इंतजार में कोई उत्तेजना नहीं थी


रहता था पहले किसी-न-किसी का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता अब किसी का कोई इंतजार



रहता था इंतजार खबरों का

अखबार का, अखबार जो खबर का बहुवचन है

खबरों की बहुवचनात्मकता बची नहीं रही

न बचा रहा अखबार का इंतजार


रहता था बहुत सारी बातों का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता कोई इंतजार अब किसी का इंतजार


दीवार घड़ी को देखता हूँ

काँटे वहीं घूमते रहते हैं गोल-गोल 

उन्हें मेरे देखने न देखने से कोई फर्क नहीं पड़ता

बस घूमते रहते हैं गोल


तारीख बदल जाती है

दिन नहीं बदलता है

महीनों में कहीं जाना हुआ

उठकर चल देता हूँ


मनोकामना बस इतनी थी कि कुछ बचे-न-बचे

किसी की आँख में बचा रहे थोड़ा-सा इंतजार

मेरी आँख में बचा रहे किसी के लिए थोड़ा-सा इंतजार


उत्तीर्ण! और उऋण?

उत्तीर्ण! और उऋण?
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गाँठ बाँध लीजिए। क्लास नोट के बल पर अच्छे अंक से पास हुआ जा सकता है — तैरकर पार, उत्तीर्ण हुआ जा सकता है,  उऋण नहीं हुआ जा सकता है। क्लास नोट से बाहर निकलकर और मझधार में टिके रहकर ही उऋण हुआ जा सकता है। इस समय उत्तीर्ण होना जरूरी है और शायद उऋण होना भी जरूरी है। कैसे होगा,एक साथ उत्तीर्ण भी और उऋण भी। भारतीय संस्कृति बताती है, रुपये पैसे के अलावे और भी ऋण होते हैं — पितृ देव ऋषि ऋण आदि और जोर लिजिए उपकार ऋण आदि भी।
क्लास रूम तो जीवन निर्वाही सैलरी की शर्त है। सार्थक अध्यापक कभी क्लास रूम से सीमित नहीं होता, वह अपने छात्रों के हृदय के विस्तार में टहलते हुए उनके दिमाग की अंतर्यात्रा करते हुए अपने और छात्रों के चित्त को व्यापक और अंतःकरण को उदात्त बनाता हुआ है उत्तीर्ण और उऋण होने की कोशिश में लगा रहता है — अपनी धुन में किसी भी हद तक। इस ऐसा अध्यापक नहीं मिलते हैं? मिलते हैं। ऐसे दो चार अध्यापकों को तो मैं ने देखा भी है, खोजें तो कई दिख जाएंगे — अतीत में भी और वर्तमान में भी। ऐसे अध्यापक का सान्निध्य मुझे नहीं मिला यह और बात है। जो मुझे नहीं मिला वह होता नहीं यह मानने को मैं तैयार नहीं। अपना-अपना नसीब — यही उचारकर तो लोग जिंदा रहते हैं, मैं भी हूँ तो क्या अजब……!

साहित्य के शेरपा

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक

(साभार :जयशंकर प्रसाद : कामायनी) 
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जीवन का कोई भी हो, हर जिंदा आदमी के अंदर शिखर पर पहुंचने की एक स्वाभाविक चाह होती है। कुछ पहुँच पाते हैं, कुछ का सफर बीच में ही समाप्त हो जाता है। कुछ तो उत्तुंग शिखर पर पहुंच जाते हैं। विडंबना यह कि उत्तुंग शिखर पर पहुँचनेवाले को भी किसी शिला के छाँह की चाहत होती है। समस्या यह कि उत्तुंग शिखर से भी ऊपर शिला कहाँ से आये, और शिखरवासी को छाँह कहाँ से मिले। जीवन का प्रवाह तो नीचे होता है, जिसे भींगी नजरों से शिखरवासी देख ही सकता है। शिखरवासी को गंगा स्नान का सुयोग कभी नहीं मिलता है। बहरहाल, यहाँ इतना भर कहना है कि शिखर पर पहुँचनेवाले को हर कोई याद करता है, उन शेरपाओं को कौन याद करे जिनके बिना शिखर पर पहुँचना असंभव होता है! साहित्य के शिखर पुरुषों के शेरपाओं को हम नहीं जानते! क्या सचमुच जानना भी नहीं चाहते! शायद चाहकर भी जान नहीं पायें —मैं जब भी शिखर की तरफ देखने की कोशिश करता हूँ उन अजाने शेरपाओं को मन-ही-मन प्रणाम करता हूँ। मेरा कोई शेरपा नहीं, लेकिन नाविक तो है जो मुझे अक्सर भुलावा देकर धीरे-धीरे शिखरिणी कोलाहल से दूर ले जाता है। 

भोटतंत्र की माया

एहि भोटतंत्र की माया!

माया महाठगिनी बहुत पुरानी
कबहुं मुहँ पर मूति दैत हो
कबहुं चरन पखारी!

केहि विध दरसाऊँ
हमहि तोर परम हितकारी!

करहु लाल ऐसन कछु किरदानी लोगन थू-थू कहि जा के निंदा खूब बखानी!

जमा होई जाए लोगन भोटवालन तब
 चरन पखारि चानस बनै कुछ
 जेहि विध हितकारी तिरलोकी छवि जगत में लगे उरानी!

एहि भोटतंत्र की माया बहुत पुरानी साधो
माया बहुत पुरानी
राज परशासन लीला केरि तिरगुन फांस रखबारी
माया महाठगिनी हम जानी
बस जानी नहि सवधानी।

कबहुं मुहँ पर मूति देत हो
कबहुं चरन पखारी!

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

बीज

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा इस पर अपने विश्वास को टिकाये रखना

टिकाये रखना विश्वास जैसे कोई अंधा टिकाये रखता है

हाथ की छड़ी पर विश्वास और पार करता रहता है रास्ता

चाहे हो जितना भी टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता, पार करता रहता है।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा इसे सम्हाल कर रखना अपने पास

अपने पास जैसे धरती रखती है सब कुछ अपने पास

मिला लेती है अपने में, नष्ट करने के लिए नहीं

लौटा देती है, फिर ढेर सारा फल, बीज, वृक्ष और बहुत कुछ

किसी चीज को सम्हालकर रखने के लिए नहीं है कोई सुरक्षित जगह

बस धरती है सुरक्षित जगह, समझना धरती में तुम हो

धरती में होते हुए तुम महसूस करना धरती तुम में है।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा धरती का विश्वास आकाश में है

समझना तुम आकाश में हो धरती के विश्वास के साथ

यह मत भूल जाना कि आकाश भी तुम में है उतना ही

बिल्कुल उतना ही जितना तुम हो आकाश में।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा आकाश का विश्वास सागर में है

समझना तुम सागर में हो

धरती और आकाश के विश्वास के साथ

सागर भी तुम में उतना ही है,

जितना सागर में तुम हो।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा सागर का विश्वास तुम्हारे पसीने में है

तुम अपने पसीने में रहना

याद रखना उतना ही पसीना तुम में है,

धरती आकाश और सागर के विश्वास के साथ।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा बीज को सम्हालकर रखना

अपने पसीने के साथ, पसीना में ही सब सुरक्षित हैं --

बीज धरती आकाश सागर और इन सब का विश्वास।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा सम्हालकर रखना विश्वास

विश्वास सम्हाल कर रखना पसीना में।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कह कि पसीना की कमी हो जाने पर

कुछ नहीं बचेगा तुम में और न तुम बचोगे किसी में।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा सम्हालकर रखना।

इतिहास और आश की संयुति

इतिहास और आश की संयुति
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सीमस हीने (Seamus Heaney) की इन स्फूर्तिदायी पंक्तियों में पीड़ित जनसमुदाय को अपनी वाणी की अनुगूंज अवश्य सुनाई दे सकती है: 
इतिहास का कहना है, 
कब्र के इस तरफ (रह कर) कोई आशा मत करो, 
किन्तु जीवन काल में एक बार तो 
न्याय की मनोवांछित लहर 
उठ भी सकती है। 

यही आशा और इतिहास की संयुति होगी।
(साभार : अमर्त्य सेन : न्याय का स्वरूप) 

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ
———
ना ना, किसी लव गुरु ने नहीं
यह तो कबीर ने सिखलाया है
सभ्यता को कान में बताया है
प्रेम में नाचता हुआ मत्त मन
आत्मन्वेषण और आत्मविस्तार
के कठिन रास्ते पर कदम बढ़ाता है
तब उसका ‘नाच’ चुपके से
आलोचना में बदल जाता है।

जैसे वसंत
चुपके से चुंबन में सिमट जाता है
प्रेम सिर्फ भावना न रहकर
मौसम बन जाता है और
अपनी धुरी पर नाचती हुई धरती
हल्की-सी सिहरन के साथ
चुपके से प्रेमपत्र में बदल जाती है।

पूछो तुलसी से कि कैसे
किसी राम का मन खग-मृग-मधुकर से
छल मृग के दृश्याभास से बिंधे
अपनी सीता के मन का पता पूछता है

कहेंगे रवींद्र कि कैसे पागल हवा में
मन का पाल खुल जाता है
उधियाता हुआ मन मानसरोवर पहुँच जाता है

बतायेंगे नागार्जुन जिन्होंने बादल को घिरते देखा
जिन्होंने हरी दरी पर प्रणय कलह छिड़ते देखा
कालिदास से पूछा पता व्योम प्रवाही गंगाजल का

ना ना, किसी लव गुरु ने नहीं
यह तो जीवन के ताना-बाना ने
पुरखों ने सिखलाया है
कि इस कठकरेज दुनिया में
मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ
हे मेरे जीवन से एक-एक कर विदा हो रहे
रूप-रस-गंध के यौवन

प्रेम ही गुरु है! गोबिंद भी!
मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ

बेड़ियाँ

#वंचित_प्रताड़ित_जीवन
बेड़ियों के बारे में क्या कहूँ! कहूँ। बेड़ियाँ चाहे जितनी चमकदार हों खूबसूरत कला की अन्यतम नमूना हों, हम उनकी चाहे जितनी प्रशंसा करें उन से खुद के जकड़े जाने को अच्छा तो नहीं मान सकते हैं न, नहीं मानते हैं न। तो फिर दूसरों की बेड़ियों की खूबसूरती का बखान क्यों। किसी का जख्म चाहे जितनी पवित्र छवियों से मिलता हो, इससे उसका दुख कम नहीं होता पगले! बढ़ जाता है दुख, कब समझेगा, वह भी जो दिल का सच्चा है!
हम व्याख्या में व्यस्त रहे और उसने बखिया उधेड़ दी! है न कमाल! 

एक ख्वाहिश

एक ख्वाहिश
———
सरकार में लोकतंत्र। समाज में बंधुत्व। अधिकार और सुविधा में समानता। सार्वभौम शिक्षा। बुद्धिमत्ता और ज्ञान की ओर धीरे-धीरे बढ़ रही उच्चतर समाजिक अवस्था का आभास।
(साभार :The Origin of the Family, Private Property and the State — Friedrich Engels, Ernest Untermann)

बोलना, लिखना और पढ़ना

 बोलना और लिखना———बोलना और लिखना मनुष्य की बड़ी ताकत है। समझना भी। भवानी प्रसाद मिश्र का आग्रह और एक तरह से उनकी काव्य चुनौती होती थी, जिस तरह बोलता है उस तरह लिख। आदमी जिस तरह बोलता है, उस तरह लिखना कठिन है और उस तरह दिखना तो और भी कठिन है —लगभग नामुमकिन।तुलना कठिन है, फिर भी समझने के लिए —बोलना नाटक खेलने की तरह है। लिखना फिल्म की तरह। बोले का संपादन (या सुधार) नहीं हो सकता है। लिखे का (छपे का नहीं)  संपादन नहीं हो सकता है। हिंदी के एक प्रसिद्ध और आदरणीय प्रोफेसर और उससे भी अधिक प्रभावी लेखक, जो बोलने के लिए भी प्रसिद्ध थे कहा करते थे लिखने से हाथ कट जाता है, बोलने से जुबान नहीं कटती है।अब संपादक और संपादन (खुद को सुधार) का काम बचा नहीं। रही-सही कसर सोशल मीडिया की तकनीकी सुविधा ने निकाल दी। अपवाद को छोड़ दें तो, पहले के लेखक अपने लिखे को बार-बार सुधारते थे, अगला काम संपादक करता था। अब स्थिति यह है कि न खुद से सुधार का अवसर है, न संपादन की कोई गुंजाइश! कहाँ वे दिन जब संपादकों को भी संपादक की जरूरत होती थी, कहाँ आज का समय!भाषा का नैसर्गिक रूप बोलना है। लिखना साभ्यतिक रूप है। बोलना नैसर्गिक कला है और लिखना साभ्यतिक कला — पढ़ना भी कला है। तीनों भिन्न कलाएँ हैं। बोलने की शैली में लिखने से बहुत सारी बातें गडमड हो जाती है, बेतरतीब और अस्त-व्यस्त। महत्वपूर्ण विचार की भाषिक अस्त-व्यस्तता वैचारिक अराजकता में बदल जाती है। मेरे जैसा पाठक वैसे ही व्यस्त कम और अस्त-व्यस्त अधिक रहा करता है। फिर भी, ऐसे पाठ को निरा देने के बदले, संपादन और वैचारिक अराजकताओं से खुद को मुक्त करने की जवाबदेही भी पाठक को खुद ही उठानी होगी।प्रसंगवश, तकनीकी सुविधाओं का भरपूर लाभ अन्य कला क्षेत्र, फिल्म, संगीत, चित्रांकन, विज्ञापन आदि के संपादन कार्य में उठाया जा रहा है। तकनीकी सुविधाओं की बढ़त का लाभ लेखन को भी कैसे मिले इस पर सोचना चाहिए। कौन सोचेगा! लेखक और लेखक बनने की कोशिश में लगे लोग ही सोच सकते हैं।

एकला चलो रे

झारखंड के गिरीडीह शहर में लिखा गया गीत
— एकला चलो
(साभार : रवीन्द्रनाथ टैगोर) 
———
तेरी गुहार पर कोई कान न धरे तो!
अकेले चलो, अकेले चलो, अकेले चलो रे।

अरे ओ अभागा
तुम से कोई बात न करे
सभी मुँह मोड़ लें
सभी भयभीत हों
तब तुम प्राण-पण से
मुँह खोलकर अकेले बोलो रे।  

दुर्गम पथ पर सभी लौट जायें
लौटकर कोई न आये
तब रास्ते के काँटों को
रक्तरंजित पाँव से
अकेले कुचलो रे!

यदि कहीं रौशनी न मिले
झंझावात बादल अँधेरी रात हो सामने
तो कड़कती बिजली की आग से
अपनी पसलियों को सूलगाकर
अकेले जलो, अकेले जलो रे!

कवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के इस लोक प्रसिद्ध ऐतिहासिक गीत को यथासंभव हिंदी के अनुरूप प्रस्तुत करने की कोशिश की है। प्रामाणिकता के लिए, कृपया, मूल पाठ देखें।
1905 में लिखा गया यह गीत बंग-भंग विरोधी आंदोलन के गीतों में से एक था। यह गीत झारखंड के गिरिडीह शहर में लिखा गया था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत की गूँज और अनुगूँज सुनाई पड़ती रही। अकेले पड़ जाने के जोखिम उठाने के साहस, स्वतंत्रता के संकल्प और संघर्ष की प्रेरणा से भरे इस गीत को उसी संदर्भ में देखा जाता है। संदर्भ से अनजान होने के कारण कई बार इसका महत्व और प्रभाव समझ में नहीं आता है। यह अकेलेपन या अकेले हो जाने का नहीं बल्कि संघर्षशीलता के साथ एकाकार हो जाने का गीत है। इसे आत्म संबोधन के रूप में भी देखा जा सकता है! 
(चित्र साभार)

उत्प्रेक्षा काल में तानाबाना पर कफन

उत्प्रेक्षा काल में 
तानाबाना पर कफन की चर्चा
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सत्य हिंदी के तानाबाना पर डॉ मुकेश कुमार के संयोजन प्रेमचंद की कहानी कफन पर चर्चा का संदर्भ है। मैत्रेयी पुष्पा, वीरेंद्र यादव, अजय नवारिया की भागीदारी से चर्चा महत्वपूर्ण बन गयी।
सच दोनों तरफ था, खंडित सच। यह उत्प्रेक्षा काल है, इसमें अपेक्षा रखना ठीक नहीं है कि प्रेमचंद ने बिल्कुल आज के विमर्श के अनुकूल ही सबकुछ लिखा है। यह तथ्य भी खोजना देखना चाहिए कि उस समय हिंदी की रचनाओं में समकालीन विमर्श के इन मुद्दों पर साहित्य में, खासकर हिंदी साहित्य में, क्या रुख उभरकर सामने आ रहा था। प्रेमचंद अपना काम कर गये। अब यश-अपयश से परे हैं। आलोचना तो जरूरी है। वे विचार के केंद्र में हैं, यही बड़ी बात है। अब न तो ईमान की बात के प्रहार से उनका कुछ बिगाड़ होगा और न ईमान की बात से उनके बचाव की कोशिश से बनाव होगा। 
मुझे पूरी परिचर्चा में एक बहुत महत्वपूर्ण पाठ-सूत्र मिला। कहा गया कि जिन जातियों के अपमानजनक संदर्भ कफन में वर्णित हैं, उस जाति का सदस्य (काल्पनिक ही सही) बनकर  पढ़े जाने पर ही पता चलेगा कि कितना अपमानजनक है। मैंने नोट किया कि न तो निर्विशिष्ट पाठक की कोई स्थिति होती है और न निर्विशिष्ट पाठ की। पाठ और पाठक दोनों को उनके जाति, क्षेत्र, धर्म, जेंडर आदि के विशेषण के साथ ही स्वीकार किया जा सकता है। किसी जाति के लेखक के लिए इतर जाति के पाठक की पाठ-प्रक्रिया संदिग्ध होने के लिए अभिशप्त है। राजनीतिक क्षेत्र में तो यह अब लगभग सहज स्वीकृत हो गया है कि अच्छा करे, बुरा करे, जैसा भी हो नेता अपनी जाति का हो — जाति के बाहर वोट न जाये। लगभग सारे चुनावी विश्लेषण इस सहजता को स्वीकार करते हुए ही जटिलताओं को सुलझाने में लगे रहते हैं। इसका प्रसार चिकित्सा, अध्ययन-अध्यापन, वकील जैसे जीवन-क्षेत्र में भी हो रहा है, हालांकि विभिन्न कारणों से अभी यह सार्वजनिक चर्चा में नहीं दिख रहा है। हा हंत! यह हाल हुआ हमारा।
जो भी हो पता नहीं मेरी इस पोस्ट को कोई इसे किस तरह पढ़े! कोलख्यान से कुछ पता नहीं चलता। मुझे यहाँ साफ कर देना चाहिए। मेरा उपनाम झा है, यानी मैथिल ब्राह्मण। अब धारणा है कि ब्राह्मणेतर लोग प्रसंगतः ब्राह्मणवादी हो सकते हैं, लेकिन ब्राह्मण लोग अनिवार्यतः ब्राह्मणवादी होते हैं। 
मेरी मैथिली-हिंदी भाषा जहाँ समझ में न आये वहाँ उसे भाषा की ब्राह्मणी वक्रता मानकर उसकी उपेक्षा करें। जरूरी हो, होनी चाहिए नहीं, तो अपनी स्थिति के अनुसार इसका अपने उपयुक्त पाठ बना लें। यह विचार का उत्प्रेक्षा काल है। 

सुरक्षा और सम्मान : जेहि विधि राखे राम, रहिए

जेहि विधि राखे राम
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ब्रेट वुड्स, वाशिंगटन आम सहमति और सिक्युरिटी एजेंडा को एक साथ देखने पर विश्व प्रभुओं के मिजाज, इनके विश्व दर्शन और इनकी विश्व दृष्टि का कुछ अंदाजा हो जाता है सकता है।
अब सुरक्षा एक बहुप्रयुक्त विशेष्य है —
खाद्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा आदि। सुरक्षा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है और उतना ही अबूझ भी। सुरक्षा के नाम पर हर तरह के नागरिक अधिकार या सिविल लिबर्टी, सम्मान आदि को भिन्न तरह से, अबांछित तरीके से, सीमित किया जाता है। सुरक्षा चाहिए! सुरक्षा चाहिए तो अधिकार, सम्मान आदि की संवेदनशीलता से मुक्त होना होगा। अब भला सुरक्षा किसे नहीं चाहिए। भय को मनोरम बनाने के लिए अंतर्मन में बात जमती गयी — बचानेवाला ही मारेगा —मारनेवाला ही बचाएगा। कुल जमा — जेहि विधि राखे राम, रहिए! 

निराला की साहित्य साधना से साभार

‘विशाल भारत’ में इलाहाबाद युनिवर्सिटी के तरुण ग्रेजुएट शिवदानसिंह चौहान का लेख छपा–‘भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता’। इसमें इन्होंने हिन्दी ही नहीं समस्त भारतीय भाषाओं के साहित्य पर यह राय ज़ाहिर की कि उसने कभी भी किसी तत्कालीन प्रचलित सामाजिक यथार्थवादी विचारधारा का दामन नहीं पकड़ा। उन्होंने भारत से बाहर विश्व की भाषाओं और उनके साहित्य पर विहंगम दृष्टि डालते हुए बताया कि साहित्यकारों में दो श्रेणियाँ हो गई हैं प्रगतिशीलों में ‘हेनरी बारबूज’, ‘एन्ड्री जीड’, ‘मेलराक्स’ वगैरह हैं। भारतीय लेखकों में केवल एक लेखक इनकी श्रेणी में आता है–मुल्कराज आनन्द। हिन्दी लेखक सुदर्शन और कौशिक का दृष्टिकोण प्रेमचन्द से भी ज्यादा सुधारवादी है। ‘भारत- भारती’ लिखने के बाद, मैथिलीशरण गुप्त की विचारधारा पतनोन्मुख होकर रामायण तथा महाभारत के कुछ प्राचीन युगों तक सीमित रह गई। हिन्दी-साहित्यकार हिटलर पर गर्व करते हैं, साम्यवादी रूस से घृणा करते हैं। इन्हें फटकारते हुए चौहान ने लिखा—“वे अभी इतने नादान हैं कि प्रगतिशील और प्रगतिविरोधी शक्तियों में भेद नहीं कर सकते, हालाँकि विश्व-साहित्य के कर्णधार बनने का ताव वे मूँछों पर रोज दिया करते हैं। एक छोटा-सा ज़रा रोचक उपन्यास लिख लिया, तो उसे वे टाल्सटाय की कब्र पर और रोमाँरोलाँ के सर पर पटक देते हैं, और कहते हैं, लो, देख लो, तुमसे अच्छा है।” जवाहरलाल नेहरू जिस ऊँचाई से हिन्दी साहित्य को देखते थे, शिवदानसिंह चौहान उससे कुछ और ऊँचे उठकर हिन्दी के पिद्दी लेखकों पर दृष्टिपात कर रहे थे। रहस्मवाद के बारे में विशेष रूप से उन्होंने लिखा कि साहित्य में इसका जन्म पूँजीवादी समाज की गिरती पतितावस्था का द्योतक है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद यह धारा प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, तथा अनेक छोटे-मोटे कवियों के मुख से नि:वृत हो उठी। और आज इसका कोई ठिकाना नहीं। इसके बाद चौहान ने रहस्यवादियों पर एक अनमोल वाक्य लिखा: “इनमें से कुछ स्वभावत: प्रगतिशील भी हैं; लेकिन उनकी कविताएँ प्रगतिशील न होकर प्रतिक्रियावादी होती हैं।” निष्कर्ष यह: “इस छायावाद की धारा ने हिन्दी के साहित्य को जितना धक्का पहुँचाया, उतना शायद ही हिन्दू-महासभा या मुस्लिम लीग ने भारत को पहुँचाया हो।” ब्रिटिश उपनिवेश भारत के साहित्यकारों से साम्यवादी यथार्थवाद की राह पर चलने का आग्रह करते हुए चौहान ने लिखा कि यह एक युद्धात्मक, असहनशील क्रान्तिकारी धारा है। आरंभ में उन्होंने लेनिन के कुछ वाक्य उद्दत किये थे जिनका सारांश यह है कि मनुष्य ने अपने सम्पूर्ण विकास में जो संस्कृति अर्जित की है, उसका पूर्ण ज्ञान प्राप्त किये बिना सर्वहारा संस्कृति की समस्या हल नहीं की जा सकती; पूँजीवादी समाज में मनुष्य ने जो ज्ञान संचित किया है, उसका तर्कसंगत विकास ही सर्वहारा संस्कृति है। चौहान भारतीय साहित्य के समस्त विकास को अस्वीकार करके नये साम्यवादी यथार्थवाद की स्थापना का स्वप्न देख रहे थे और समझ रहे थे कि साहित्य में लेनिनवादी विचारधारा को लागू करने का यही तरीका है। एक दिन सबेरे आकर किसी भूमिका के बिना निराला ने कहा–इसे ठीक करना है। मैंने पूछा–किसे? उन्होंने कहा–वही, तुम्हारा मित्र मुखव्यादानसिंह। इस पर भी मैं कुछ न समझकर उनका मुँह देखता रहा तो वह बोले–वही जिसने ‘विशाल भारत’ में प्रगतिशील साहित्य पर लेख लिखा है। निराला ने हिसाब लगाया कि भुवनेश्वर, शिवदानसिंह चौहान वगैरह का प्रगतिशील दल उनके पुराने हितैषी बनारसीदास चतुर्वेदी के साथ मिलकर उन पर हमला कर रहा है। इसी वर्ष ‘विश्वभारती क्वार्टरली’ में ‘माँडर्न (पोस्टवार) हिन्दी पोएट्री’ पर लेख छपा। लेखक ऐस ० ऐच ० वात्स्यायन। इस लेख में वात्स्यायन ने सौंन्दर्यवादियों के आत्मकेन्द्रित व्यक्तित्व पर तीव्र आक्रमण किया। इस तरह के लोग नार्किसिस्ट होते है, अपनी ही छवि पर मुग्ध रहते हैं। पंत की ‘वीणा’ में इसके अनेक प्रमाण हैं। सौन्दर्यवादियों की मनोदशा के बारे में जो बातें कही गई हैं, वे सब सूर्यकान्त त्रिणठी निराला पर भी लागू होती हैं। सौन्दर्यवादी में जो खामियाँ होती हैं, वे निराला में और भी उभरकर दिखाई देती हैं। अहंकार की अतिशयता से उनकी कलात्मक क्षमता पथ-भ्रष्ट हो गई है। जानबूझ कर मौलिक बनने के प्रयत्न में उन्होंने कविता की बलि दे दी है। उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ अक्सर अच्छी होती थीं लेकिन बाद को उन्हें ज़िद हो गई कि मुख्य काव्य-परम्परा जड़ हो गई है। उन्होंने रूढ़ियाँ तोड़ीं, यह श्रेय देने के बाद और कुछ कहना आवश्यक नहीं। “निल निसी बोनम–ऐंड ऐज़ ए लिटररी फोर्स, ऐट ऐनी रेट, निराला इज़ आलरेडी डेड।”
(साभार : रामविलास शर्मा : निराला की साहित्य साधना) 

कवित्त विवेक

रचनात्मक प्रतिबद्धता के साथ सलूक के सवाल
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वचन प्रवीण होने और कवि होने के फर्क को तुलसीदास जानते थे। तभी तो कह सके —
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। 
सकल कला सब बिद्या हीनू।।
(रामचरितमानस) 
अपनी रचना अच्छी हो, न हो लेकिन अच्छी लगती हर किसी को। तभी तो कह सके —
निज कवित केहि लाग न नीका। 
सरस होउ अथवा अति फीका।। 
(रामचरितमानस) 
बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें दूसरे की भनिति यानी कविता (पढ़ें रचना) सुहाती हैं। तभी तो कहा —
जे पर भनिति सुनत हरषाही। 
ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।
(रामचरितमानस)
अपनी प्रतिबद्धता की समझ बहुत साफ और सुदृढ़ थी, तभी तो विनय पत्रिका में कह गये —
जाके प्रिय न राम-बदैही। 
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, 
जद्यपि परम सनेही॥
अब, हमें अपने कवि होने या वचन प्रवीण होने, वाहवाही मिलने या न मिलने की जैसी भी स्थिति हो अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता (Creative commitment) के साथ अपने सलूक के सवाल को कैसे हल करना है। 

प्रेम रिश्ता टूटन जुड़न

प्रेम रिश्ता टूटन जुड़न
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रिश्ता कोई हो, रिश्तों का मूल आधार होता है प्रेम। प्रेम के कई प्रकार होते हैं, कई स्तर होते हैं। कोई ऐसा रिश्ता नहीं होता है जिसमें टूटन की हद तक का तनाव न आता हो, कई बार तो टूट भी जाते हैं। फिर जुड़ जाते हैं। इस टूटन से बचने और फिर जुड़ने की प्रक्रिया के बारे में संतभाव कवियों ने सहज ममता से हिदायत दी है। ये हिदायतें प्रेम के प्रकार और स्तर पर भी बहुत कुछ निर्भर और कारगर होता है। चूँकि सहज है, इसलिए बस याद दिलाने के लिए –
रहिमन धागा प्रेम का , मत तोरो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुरे , जुरे गाँठ परी जाय।
और आगे —
रूठे सुजन मनाइए , जो रूठे सौ बार। रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।
कबीर तो कहते हैं —
सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार।
अब हमारे लिए यह कितना व्यावहारिक है, यह तो बहुत हद तक हम पर निर्भर है। 

साहित्य में बड़ा होना

साहित्य में बड़ा होना
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मनुष्य प्रजाति को जीवन यापन की आज की स्थिति में पहुँचने में लाखों वर्ष लगे हैं। यहाँ प्रजाति की नहीं व्यक्ति की बात की बात करना चाहता हूँ। किसी व्यक्ति मनुष्य का बड़ा होना क्या होता है? बड़ा वैज्ञानिक, बड़ा विद्वान आदि होना क्या होता है? ये बड़े सवाल हैं। 
फिलहाल, साहित्य में बड़ा होना क्या होता है! बात हिंदी साहित्य के संदर्भ में कर रहा हूँ, वैसे यह लागू अन्य भाषा के साहित्य के संदर्भ में भी हो सकते हैं।
बड़ा होने और महान होने में भी अंतर है। बड़ा साहित्यकार वह होता है जिसकी रचना की मूल संवेदना का कारगर प्रभाव लोकचित्त में संस्थापित होने और लोक व्यवहार को मनुष्य जाति के जीवन यापन को अधिक समावेशी, अधिक स्वीकार्य और अधिक मनोरम, अधिक पर दुख कातर आदि बनाने में सक्षम हो। इस तरह से सक्षम साहित्यिक रचना लोक चित्त में इस तरह संस्थापित होने में सफल होने पर महान होने और कहलाने की स्थिति में पहुँचती है। रचनाकर विस्मृत हो जाता है। रचना विस्मृत हो जाती है। उस रचना की शैली (संरचना या फॉर्म से भिन्न) और संवेदना का प्रवाह और प्रयोग जीवन दुख का तात्रा बनकर मनुष्य जाति की जीवन यात्रा में शामिल रहता है। विस्मृत रचना या रचनाकर की मूल संवेदना का प्रवाह और प्रयोग जारी रहती है, यानी चेतन मस्तिष्क से निकलकर भी अचेतन, अवचेतन मस्तिष्क में उपस्थित और सक्रिय रहा करती है। भिन्न-भिन्न हित समूह इस प्रवाह को अपचालित करने की प्रक्रिया में भी लगे रहते हैं। कुछ अवधि के लिए कामयाब भी होते हैं। फिर कोई दूसरा साहित्यकार उस विस्मृत मूल संवेदना और शैली को भिन्न-भिन्न फॉर्म या संरचना में लोकचित्त में पुनर्संयोजित कहां तक पहुंचे ते हैं। इसे भारतीय संदर्भ में पुनर्नवा और पश्चिम के संदर्भ में संस्कृति चक्र की प्रक्रिया से भी समझा जा सकता है। सभ्यता में समन्वय, समावेश और संतुलन की प्रक्रिया चलती रहती है। 
महफिलबाजी से जो बड़ा, बड़ी या महान होने में लगे हुए हैं, संतुष्ट हैं वे प्रणम्य हैं। 

स्थिति भयावह

स्थिति भयावह है
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जब इतने बड़े-बड़े लोगों, मैडल अलंकृत लोगों की यह स्थिति है तो यह पुरस्कार वह पुरस्कार, यह सम्मान वह सम्मान के बल पर अपने विशिष्ट होने के बोझ से लदे-फदे लोगों का क्या होगा। अमर्त्य सेन जैसे लोगों की रहवास की स्थिति से अवगत ही होंगे, नहीं है तो यह मसला आप के लिए विचारणीय नहीं भी हो सकता है। अभी Hitendra Patel जी की पोस्ट से पता चला कि राहुल सांकृत्यायन के पुत्र भी अपने फ्लैट के मामले में परेशानी में है। वे वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आते होंगे। वरिष्ठ नागरिकों की कानूनी सहूलियतों की इस मामले में क्या उपलब्धता है, पता नहीं। अदालत से राहत मिल सकती है, पता नहीं। एक पर कोई अन्याय होता है अन्य खामोश रहता है। सभी अकेले हो गए हैं। असंगठित जनता संगठित शक्ति के सामने लाचार। संगठनों की एक अन्य दिक्कत भी है। जहाँ संगठन है, वहाँ शक्ति है और जहाँ शक्ति है वहाँ अन्याय पक्षपात है। आदमी क्या करे। हमारे नागरिक बोध की हालत यह है कि हम अत्याचार को नागरिक पर हुए अत्याचार के रूप में नहीं पढ़ते बल्कि जाति समुदाय धर्म लिंग वर्ग राज्य क्षेत्र हैसियत से जोड़कर पढ़ते हैं। कहाँ है नागरिक जमात! अन्ना आंदोलन के समय ही मैंने लिखा था कि यह आंदोलन राजनीतिक दल के रूप में बदल जायेगा। बुरी बात यह कि नागरिक जमात पब्लिक स्फियर में पब्लिक स्टंट के लिए जगह बन जायेगी। नागरिक जमात अपनी विश्वसनीयता और उद्देश्य से अंतहीन भटकाव में पड़ जायेगा। नागरिक जमात के नाम पर खाप पंचायतों की सक्रियता देखी जा सकेगी। खाप रहित नागरिकों का क्या होगा! खाप जैसे भी हों, दिख तो वही रहे हैं। एक पोस्ट लिखकर मैं भी अपने नागरिक दायित्व के पूरा होने के आनंद में डूब जाऊँगा, एक लाइक देकर या दिये बिना आप भी नागरिक कर्तव्य के सर्वोच्च निर्वाह के सुखसागर में ऊबडूब की मानसिक सुविधा का भोग करने में व्यस्त हो जायेंगे। क्या यही सच है कि कोई एक डूबेगा तो अन्य व्यस्त रहेंगे। पता नहीं कैसे कुमति लग गई....

पछतावा 3

#पछतावाकोलख्यान
आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।
(साभार : कबीरदास)
हरि से हेत न करने के मामले पर फिर कभी। अभी चिड़िया के खेत चुगने पर। चिड़िया खेत कब चुगती है! चिड़िया के खेत चुगने का पता कब चलता है!
किसान बीज बोता है। बीज बोकर किसान निश्चिंत हो जाता है, रखवारी नहीं करता है। इस अवसर का लाभ उठाकर चिड़िया बीज चुग लेती है। किसान बीज के पौधा बनने और फलप्रसू होने का इंतजार करता है। चुग लिये गये बीज पौधे में विकसित नहीं होता है, फलप्रसू होने की तो बात ही क्या! फल नहीं मिलता है। पछतावा बचता है। हरि का खेत हरि की चिड़िया। किसान हरि से हेत कर बोये गये सारे बीज को बचा ले जाए भला यह कैसे संभव है।
बोये गये कुछ बीज को चिड़िया चुगेगी ही। अछताने-पछताने के बाद संतोष की बारी आती है। मलूकदास तो कह गये हैं अजगर चाकरी नहीं करता, चिड़िया पंछी भी काम नहीं करती है लेकिन राम तो सब के दाता हैं। इसलिए संतोष धन। तुलसीदास तो कह गये हैं  —
गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।
जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान ॥
जब सब धन धूरि समान हो जाए तो फिर कहाँ पछतावा! संतोष धन यों ही हाथ नहीं आता है। पछतावा की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए पछतावा जरूरी है!

पछतावा 2

#पछतावाकोलख्यान
आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।
(साभार : कबीरदास)
हरि से हेत न करने के मामले पर फिर कभी। अभी चिड़िया के खेत चुगने पर। चिड़िया खेत कब चुगती है! चिड़िया के खेत चुगने का पता कब चलता है!
किसान बीज बोता है। बीज बोकर किसान निश्चिंत हो जाता है, रखवारी नहीं करता है। इस अवसर का लाभ उठाकर चिड़िया बीज चुग लेती है। किसान बीज के पौधा बनने और फलप्रसू होने का इंतजार करता है। चुग लिये गये बीज पौधे में विकसित नहीं होता है, फलप्रसू होने की तो बात ही क्या! फल नहीं मिलता है। पछतावा बचता है। हरि का खेत हरि की चिड़िया। किसान हरि से हेत कर बोये गये सारे बीज को बचा ले जाए भला यह कैसे संभव है।
बोये गये कुछ बीज को चिड़िया चुगेगी ही। अछताने-पछताने के बाद संतोष की बारी आती है। मलूकदास तो कह गये हैं अजगर चाकरी नहीं करता, चिड़िया पंछी भी काम नहीं करती है लेकिन राम तो सब के दाता हैं। इसलिए संतोष धन। तुलसीदास तो कह गये हैं  —
गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।
जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान ॥
जब सब धन धूरि समान हो जाए तो फिर कहाँ पछतावा! संतोष धन यों ही हाथ नहीं आता है। पछतावा की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए पछतावा जरूरी है!

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Sheshnath Prasad
आप मेरी पोस्ट पर कुछ भी, हाँ कुछ भी लिखकर कोई गलती नहीं करते हैं। मुझे यह अच्छा लगता है। और आप से अनुरोध है कि आप जरूर लिखें। खेद व्यक्त करने का तो कोई सवाल ही नहीं है। और हाँ, यदि आप का मन मेरे जवाब या मेरी टिप्पणी से खिन्न होता है तो मुझे इसके लिए खेद होना चाहिए और है।
आप ने कई सवाल उठाये हैं और वे महत्वपूर्ण हैं। सभी सवालों का जवाब यहाँ संभव नहीं है, कुछ का जवाब देना जरूरी है। मैं भले ही जवाब की तरह लिखूं, आप से अनुरोध है कि इन सवालों पर मेरे जवाबों को मेरे पक्ष की तरह पढ़ने की कृपा करें, सिर्फ अपने सवालों के जवाब की तरह नहीं। संभव होगा तो इन सवालों को स्वतंत्र पोस्ट के रूप में डालने की कोशिश करूंगा।
जो बात वर्ग या समूह के लिए कही जाती है वह उस वर्ग या समूह के किसी सदस्य के ऊपर तत्काल लागू नहीं होती है। वर्ग या समूह पर कही गई बात उस वर्ग या समूह की प्रजाति पर लागू होती है। जैसे, सफेद शेर विलुप्त हो रहे हैं यह किसी व्यक्ति शेर पर लागू नहीं हो सकती है। किसी एक शेर को सामने खड़ा कर उसके विलुप्त होने की परीक्षा नहीं की जा सकती है और न इस आधार पर कोई निर्णय किया जा सकता है। उसी तरह व्यक्ति पर कही गई बात को उसके पूरे वर्ग पर लागू किया जा सकता है। जैसे, यह या कुछ शेर लंगड़ा है तो यह नहीं कहा जा सकता कि शेर लंगड़ा होता है। अधिक के लिए इंपरेटिव नॉरमेटिव या आगमन निगमन पद्धतियों का संदर्भ आप ग्रहण कर सकते हैं। 
बौद्धिक वर्ग को बौद्धिक वर्ग के सदस्यों पर लागू करना ठीक है या नहीं, निर्णय आप करें।
बौद्धिक वर्ग कैसे बनता है या किन से बनता है! क्या इसमें सिर्फ भौतिक धरातल पर जीवित लोग ही शामिल होते हैं यह एग्रीगेट होता है या एवरेज अर्थात सकल या औसत होता है यह एक जटिल प्रक्रिया है। इस पर यहाँ अभी लिखना संभव नहीं है मेरे लिए। बौद्धिक कौन होता है! सभ्यता का मूल संघर्ष सत्ता संघर्ष होता है। मनुष्य के मनुष्य बनने में अन्य मनोभावों के इतर, बुद्धि का बड़ा और प्राथमिक योगदान है। बुद्धि के अनुपात में सत्ता का संदर्भ समझा जा सकता है। आत्म आकलित बुद्धि के अनुपात में अपेक्षित और अर्जित सत्ता का असंतुलन सत्ता संघर्ष के पहले पायदान यानी बौद्धिक संघर्ष से जोड़ देता है। संक्षेप में, प्रसंगतः, यह कहना जरूरी है कि बौद्धिक वर्ग का कोई नेता नहीं होता या बौद्धिक वर्ग का सदस्य किसी का अनुयायी नहीं होता है। बौद्धिक संघर्ष का एक रास्ता राजनीतिक संघर्ष की तरफ जाता है और राजनीतिक संघर्ष में बदल जाता है। इसी तरह से और तरह के संघर्षों में भी बौद्धिक संघर्ष बदलता रहता है।
गाँधी या कृपलानी नेहरु आदि राजनीतिक वर्ग में माने जाने चाहिए, बौद्धिक वर्ग में नहीं। उन्हें कौन फीडबैक देता था, नहीं देता था कि मुझे नहीं मालूम, लेकिन वे क्रीत दास नहीं थे।
कविता क्या है? यह कैसे बनती है? इसे किस तरह पढ़ना चाहिए? यह अलग से विवेचनीय है। इसका कोई अंतिम उत्तर नहीं हो सकता, मेरे पास तो नहीं हो सकता। कविता किसी व्यक्ति पाठक के द्वारा पढ़ भले ली जाती हो, कुछ सीमित समय में, उतरती है व्यापक समय के फलक से गुजरते हुए। कवि होना और बात है वचन प्रवीण होना और बात है, तुलसीदास कह गये हैं। बहुत लंबा हो गया। वेतनभोगी भी बौद्धिक वर्ग में शामिल हो और अपने वेतनभोग के अवसरों को बचाते हुए ही उसकी बुद्धि खिले तो क्या कहेंगे। आज के बौद्धिक परिसर को देखते हुए ही इन पंक्तियों को मैं ने यहाँ साभार डाला है। मुक्तिबोध की प्रतिबंधित पुस्तक का स्मरण कराता हूँ। एक बात और जबलपुर से एक स्तर पर ओशो का भी जुड़ाव था और मुक्तिबोध का भी। भाई, बाकी अन्यत्र।

पछतावा 1

अंत तो प्रारंभ का उपहार है। अब अंत का प्रारंभ हो चुका है। अंत के पहले जीवन को समझने की कोशिश करना जरूरी लगता है। लाखों साल के मानव काल खंड के ऐसे समय में सौभाग्य से मेरे जीवन का दौर तब शुरू हुआ, शायद अंत भी, जब मानव बुद्धिमत्ता अपने चरम पर है। हालांकि इस दौर में भी व्यक्ति स्तर पर हर किसी की बुद्धिमत्ता समान नहीं है। इसके बाद लगता है मानव बुद्धिमत्ता का दौर ढलान पर होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दौर शुरू होगा। शुभ होगा! अशुभ होगा! कहना मुश्किल है। मनुष्य की आबादी के छोटे हिस्से की बुद्धिमत्ता बनी रहेगी। धीरे-धीरे आबादी का यह छोटा-सा हिस्सा छोटा, और छोटा, और छोटा होता जायेगा। कितना छोटा! मेरे लिए कहना मुश्किल है। 
बेहतर है, जीवन को विभिन्न दौरों में समझने की कोशिश की जाए। पहला दौर सहज बुद्धि और स्वप्न का होता है।
 अगला दौर स्वप्न को वास्तविक करने की योजनाओं की रूपरेखा बनाने और शक्ति संयोजन का होता है। न तो शक्ति संयोजन की योजना इच्छित तरीके से पूरी तरह से कामयाब होती है, न तो अंततः बनाई गई रूपरेखा के अनुसार जीवनयापन होता है।
अगला दौर सपनों के बाहर जीवन के वास्तविक आधार को समझने और तदनुरूप खुद को बदलने या समायोजित करने का होता है। पंख समेटने का दौर!
पंखों का समेटा जाना और पंखों का झड़ना अपने साथ पछतावा का दौर लेकर आता है। 
जिसके सामान्य जीवन में पछतावा का कोई कारण नहीं होता है वह, विरल अपवाद को छोड़ दें तो, बहुत बड़ा झुठ्ठा होता है। इतना बड़ा झुठ्ठा कि अपनी आत्मा को भी, अपने झूठ को सच मानने के लिए राजी कर लेता है। अपनी आत्मा के सच को अपने दिमाग के झूठ में फाँस लेना क्या संभव हो सकता है? पता नहीं। मुझ जैसे लोगों के लिए यह संभव नहीं है। इसलिए, मैं अपवाद नहीं हूँ। विस्तार से लिखने और समय-समय पर साझा करने का मन है। डर बस इतना ही है कि कभी तो मन की कर नहीं पाया। 

खराऊँ

चित्त चंचल क्यों
जो नहीं रहा खराऊँ
——–
पहले उदास फिर उतप्त मन
पूछा माहौल बड़ा भरकाऊ है
हमें शीघ्र अब यह बतलाओ
मेरा कहाँ खराऊँ है!

किस अजायबघर में रखा
किस को बेचा
वह तो नहीं बिकाऊ है!

सब चुप
बोले अति गंभीर सभासद
शांत क्रोधं शांत क्षोभं
शांत शांत शांत
सब सांतम!

वक्त बदल गया
स्वर्ण दंड में बदल खराऊँ
वह देखो जो दमक रहा है
बदलना बिकना नहीं है!

धीर ललित उदात्त!
चित्त चंचल क्यों! 
जो नहीं रहा खराऊँ!

घोर दरवाजा

चोर दरबाजा
—––
पैंट सिलवाने दरजी के पास गया
पहली बार पता चला
होता है पैंट में एक चोर पॉकेट
मैं चोर नहीं था
फिर भी मन में
रहता था ग्लानि बोध कि
लिये फिरता हूँ चोर पॉकेट। 

दरजी ने बताया था
चोरों से बचाव करता है —
चोर पॉकेट।

शुरू में मन नहीं मानता था
फिर धीरे धीरे सहज हो गया।

होता है एक चोर दरवाजा
घर में भी बचाव के लिए ही।

होता है इतिहास में भी
चोर दरबाजा
अपने ही कारणों से।

चोर दरवाजा का इस्तेमाल
 करने लगे जब मालिक बार-बार
तोरण द्वार बन जाता है
चोर दरबाजा।

तोरण द्वार पर खुदा रहता है
कोई मनजीत आदर्श वाक्य
जैसे......!

जानकार

जानकार
🙏🙏🙏
जानकार जानता है
बाकी कोई कुछ नहीं जानता है

अधकचरा जाननेवाले
सब जानते हैं
जानकारी का काम
इससे चल जाता है

विद्यालय विश्वविद्यालय
की अवमानना नहीं होती है
वे जानकारी बांटते रहते हैं

अदालतें
जानकारी खोलती रहती है
समाज में जानकारी
खौलती रहती है

यों ही नहीं चलती रहती है
यों ही नहीं गुजरती रहती है
पवित्र व्यवस्था

यों ही नहीं होते हैं
पावन कार्य

जानकार जानता है
जानकारी
किस दरवाजे से
आती है और जाती है

आप से है प्रार्थना, बस आप से है प्रार्थना

आप से है प्रार्थना, बस आप से है प्रार्थना

 

इसलिए तो हे महामहिम

इसीलिए हे महामहिम

 

पता नहीं किस चीज पर टिकी हुई है पृथ्वी

इस सवाल पर तरह-तरह की कहानी है

न पृथ्वी का मतलब मालूम है मुझे

न टिके होने के बारे में ठीक-ठीक कुछ पता है

मालूम इतना भर है कि कहानी है कई

 

कोई आँख नचाकर कहता है

कोई तर्जनी तानकर कहता है

कोई अंगूठा दिखाकर कहता है

कोई छाती फुलाकर कहता है

कोई भिंची हुई मुट्ठी उछाल कहता है

कोई कहकर कंधा झुका लेता है

कोई खुशामद में कहता है

कोई आमद की उम्मीद में कहता है

कोई एक बाँह उठा कर कहता है

कोई दोनों बाँह उठकर कहता है

कोई झंडा लहराकर कहता है

कोई डंडा हिलाकर कहता है

 

कहाँ तक कहूँ, मुख्तसर यह कि

कहने की जितनी वजहें

उतनी तरह से कहता है, कहानी

मेरी समझ में कुछ नहीं आता है

 

इसलिए तो हे महामहिम

इसीलिए हे महामहिम

 

है जो भी शक्ति-पीठ

उन्हें होना ही चाहिए न्याय-पीठ

मगर ऐसा होता नहीं है

 

इसलिए तो हे महामहिम

इसीलिए हे महामहिम

न्याय-पीठ तो है ही न्याय-पीठ

होनी चाहिए आपके पास भी कोई कहानी

काठुआए हुए काठघर की काठ-हथौड़ी के पास

 

कहानी कि किस चीज पर टिकी हुई है पृथ्वी

यह भी कि क्या है पृथ्वी और क्या है टिकना

इसलिए तो हे महामहिम

इसीलिए हे महामहिम

आप से है प्रार्थना, बस आप से है प्रार्थना

नवाक/ न्यू-स्पीक

नवाक / न्यू-स्पीक

जॉर्ज ऑरवेल का उपन्यास 1984 (NINETY EIGHTYFOUR) 1949 में प्रकाशित हुआ। राजकमल गौरवग्रंथ माला: कालजयी साहित्य की विशिष्ट प्रस्तुति के अंतर्गत इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। अभिषेक श्रीवास्तव ने इसका हिंदी अनुवाद किया है। हिंदी भाषा समाज की खासियत को ध्यान में रखते हुए बहुत बढ़िया अनुवाद संभव किया है अभिषेक श्रीवास्तव ने। इसमें न्यू-स्पीक के बारे में, उसकी विकासमान वैयाकरणिक कोटियों के बारे में बताया गया है।

यह माना गया है कि 2050 तक अंग्रेजी भाषा पूरी तरह बदल जायेगी, न्यू-स्पीक में। इतनी बदल जायेगी कि पुराने सारे पाठ समझ एवं प्रयोग से बाहर हो जायेंगे। क्या इस तरह सिर्फ अंग्रेजी भाषा बदलेगी! मेरी उत्सुकता भारतीय भाषाओं को लेकर है। हिंदी के लिए खासकर। हिंदी के लिए खासकर इसलिए कि हिंदी मेरे सर्वाधिक इस्तेमाल की भाषा है। क्या हिंदी (अन्य भी) नवाक (नव वाक) में बदल जायेगी!

टू द प्वाइंट होने की माँग बढ़ रही है। पावर प्वाइंट्स, कथ्य के बुलेट फॉर्म्स अधिक सहजता से स्वीकार्य हो रहे हैं। संवाद का कारगर माध्यम शब्द से अधिक चित्र बन रहे हैं। बाइनरी युग आ गया है या तेजी से आता जा रहा है। ग्रे एरियातेजी से छोटा होता जा रहा है। हाँ या ना, दोस्त या दुश्मन, बीच की कोई स्थिति नहीं।

सप्रसंग व्याख्या और विस्तृत विवरण, गये जमाने की चीज है। आज दृश्य का विस्तार हो रहा है। श्रव्य तेजी से संकुचित हो रहा है। टेक्स्ट जितनी पढ़ी जा रही है, उससे कई गुणा चित्र पढ़े जा रहे हैं। दर्शक की क्षमता एवं सुविधा के आधार पर चित्र मनोबांछित टेक्स्ट बनकर हासिल हो रहा है। सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो संज्ञा का (डिजिटेलेजाइशन) संख्या में बदलना शुरू हो गया है। कुछ मामले में पहचान नाम से नहीं नंबर से हो रहा है। संज्ञा के साथ पहचान के बहुत सारे संदर्भ लिपटे रहते हैं, जैसे जाति, धर्म, लिंग आदि। विशिष्ट संख्या (युनिक नंबर) नाम का स्थान बड़ी आसानी और अधिक विश्वसनीयता से ले रही है। आगे क्या होनेवाला है!

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पुतला और उसकी हँसी

पुतला और उसकी हँसी

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एक कमरा है। हर तरफ से बंद। हर तरफ से खुला। यह समझना मुश्किल है। हर तरफ से बंद और हर तरफ से खुला, एक साथ कैसे संभव है! यह आधुनिक तकनीक है। महाभारत में इसकी चर्चा मिलती है। आधुनिक तकनीक से हमारे समय में यह संभव हुआ है। द्वार और दीवार का फर्क मिट गया है। दूर से देखने पर द्वार ही द्वार नजर आते हैं। कहीं कोई दीवार नहीं। पास आने पर पता चलता है, दीवार ही दीवार है। कहीं कोई द्वार नहीं। तो असल में, यह क्या है! यह दीवार भी है। यह द्वार भी है। बस पता नहीं चलता कहाँ दीवार है, कहाँ द्वार है। एक आदमी को पता है। वह आगंतुक है। आगंतुक कमरा में घुस जाता है। उसके पीछे आनेवाले को पता ही नहीं चलता, वह आदमी गया कहाँ। वह आदमी कैसे आगंतुक में बदल गया! बाकी कैसे नागंतुक बनकर बाहर रह गये! नागंतुक कमरे के अंदर जा नहीं सकते। बाहर आगंतुक दिखाई नहीं देता।

कमरा सजा-धजा है। एक आदमी दिखाई देता है। पुतला भी हो सकता है। वह आदमी है या पुतला, पता नहीं चलता है। हर चीज आँख के इशारे पर। हाथ की पहुँच में। उसकी पीठ दिखाई देती है। पीठ पर अंकित बड़ी-सी शक्ति-मुद्रा साफ-साफ दिखती है। आगंतुक न समझ आनेवाली मुख ध्वनि से शक्ति-मुद्रा को संबोधित करता है। कमरा में बहुत सारे पुतले प्रकट होते हैं। पुतला में कोई हलचल नहीं। आगंतुक फिर कुछ बुदबुदाता है। इस बार शक्ति-मुद्रा पीछे और मुख-मुद्रा सामने। साफ होता है। वह आदमी है। कमराधिपति है। आगंतुक कमराधिपति को अपनी भाषा में संबोधित करता है। कमराधिपति सुनकर मुसकुराता है। कमरे के सारे पुतले में जान आ जाती है। हरकतें होने लगती हैं। कमराधिपति अट्टहास करता है। पुतलों का दिव्य चक्षु-नृत्य आरंभ हो जाता है। अब कमराधिपति की मुख-मुद्रा पीछे, शक्ति-मुद्रा आगंतुक के सामने।

बाहर खड़े लोग चकित। कुलिश-दृष्टि। धुआँ। लपट। चीख। पुकार। हाहाकार। दलन-वृष्टि।

कृपा-दृष्टि। पुष्प-वृष्टि। अन्न-वृष्टि। धन-वृष्टि। मदन-वृष्टि।

आगंतुक कमरा से बाहर आ गया है। बाहर का दृश्य देख वह जरा भी चकित नहीं है। भ्रमित नहीं है। नागंतुकों की ओर बढ़ता है। वह अपनी अंगुली नागंतुकों की ठोंठ पर रखता है। इशारा! निर्देश! आदेश! चुप रहो। सब चुप रहो।

आगंतुक शंकित है। कमराधिपति कितने दिन तक हँसते रहेंगे। कितने दिन तक अट्टहास लगाते रहेंगे। कमराधिपति के चेहरे पर थकान छा रही है। कमराधिपति की थकान रोनी-मुद्रा में आ गयी तो क्या होगा? मुस्कान सिसकियों में बदल सकती है क्या? अट्टहास रुलाई में बदल सकती है क्या? कृपा-दृष्टि जाये भाँड़ में।   ऐसे में प्रकट-अप्रकट पुतलों का क्या होगा? दिव्य चक्षु-नृत्य का क्या होगा? कुलिश-दृष्टि का क्या होगा?