निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!

निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!

निष्ठा बहुत ही कठिन है। धूमिल को याद करें, वे पूछते हैं —

क्या मैं व्याकरण की नाक पर

रूमाल लपेटकर

निष्ठा का तुक

विष्ठा से मिला दूँ?

(साभार: धूमिल: संसद से सड़क तक)

निष्ठा का सवाल सिर्फ लेखकों कवियों तक सीमित नहीं है — यह समस्त नागरिक, सामाजिक और राजनीतिक जमात से जुड़ा है। अधिकतर का जवाब क्या होगा?  वाणी में नहीं, आचरण में! निष्ठा को समझना, तय करना और टिकाये रखना सचमुच बहुत कठिन, बहुत कठिन है।

 

अज्ञेय की कहानी को याद करते हैं। द्रोही का पात्र कहता है :-

निष्ठा क्या है? जिसका हम पालन करें। कर्तव्य क्या है? जिसके लिए हम कष्ट झेलें। प्रतिज्ञा क्या है? जिसे हम निभाएँ! पर यह सब उस अखंड निष्ठा, उस प्रकीर्ण कर्तव्य, उस उग्र प्रतिज्ञा के आगे क्या है? उस व्रत के आगे जिसमें माता-पिता, बन्धु-बान्धव, घर-बार, प्रतिष्ठा, कलंक, सब भूल जाने पड़ते हैं? उस आदर्श के आगे जिसका अनुसरण करनेवाला पतित होकर भी दिव्य पुरुष होता है? जानती हो कमला! वह क्या है? प्रेम!

(साभार : अज्ञेय : कहानी – द्रोही)

निष्ठा का सवाल सचमुच कठिन है!

गंभीर पाठक का भाव ; हार से ज्यादा जीत में जोखिम है

गंभीर पाठक का अभाव

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लगभग सभी गंभीर लेखक गंभीर पाठक के अभाव को कभी-न-कभी महसूस करता ही है।
निराश भी होता है, फिर सम्हलता है। निराशा के भँवर से बाहर निकलने की कोशिश करता है — कभी जुट जाता है, कभी टूट जाता है! क्या ऐसा सिर्फ आज के लेखकों — हिंदी लेखकों — के साथ हो रहा है? नहीं, बिल्कुल नहीं! करुण रस के सब से बड़े संस्कृत कवि भवभूति ने भी इस दर्द को सहा था। कबीरदास जैसे युगांतरकारी कवि को सराहनेवाले कितने थे? अपने समय में माँग कर खाने और मसीत में सोने, किसी के साथ नातेदारी न जोड़ने की घोषणा करनेवाले तुलसीदास के साहित्य के कितने पाठक थे?  इस मामले में तो भवभूति की पीड़ा की अभिव्यक्ति बहुत प्रेरक है!

ये नाम केचिदिह न प्रथयन्त्यवज्ञां जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः ।

उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा कालो ह्मयं निरवधिः विपुला च पृथ्वी ।।

(साभार: भवभूति : उत्तररामचरित : अनुवाद – इंद्र : राजपाल एण्ड सन्ज़)

समान धर्मा पाठक का आदर न मिलने पर भवभूति जैसा संस्कृत का महाकवि भी निराश हो गया था। टिका रहा इस विश्वास पर भी की पृथ्वी भी बहुत बड़ी है और काल भी विस्तृत है। कभी-न-कभी कोई-न-कोई ऐसा होगा जो उस की रचनाओं का आदर करेगा, सराहेगा।

  

निष्ठा किसी भी विद्वान को ऐसे मजबूत कवच से मंडित कर देती है कि प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह उसे ऐसा पारदर्शी मुखरक्षक भी देती है जो किसी भी दिशा से आने वाले प्रकाश की किसी भी किरण को नहीं रोकती। उसका लक्ष्य होता है अधिक प्रकाश, अधिक सत्य, अधिक तथ्य और तथ्यों का अधिक संयोग। यदि उस लक्ष्य प्राप्ति में वह असफल होता है, जैसा कि उसके पहले कई विद्वान असफल हुए हैं, तो वह यह जानता है कि सत्य की खोज में असफलताएँ कभी-कभी विजय और सच्चे विजेता की शर्त बन जाती हैं, चाहे उसे संसार पराजित कहता है।

(साभार: भारत हमें क्या सिखा सकता है: मैक्समूलर – अनु. सुरेश मिश्र)

आज के लेखकों को भी निराशा की घड़ी में इस भवभूतीय विश्वास और  कवच-प्रदायी निष्ठा को अपने अंदर सक्रिय कर रचना में — विफलता के जोखिम पर भी — तल्लीन रहना चाहिए। लेखक के लिए आज हार से ज्यादा जीत में जोखिम है।

सांस्कृतिक अराजकता

सांस्कृतिक अराजकतावाद:

विश्वास है, साहित्य संभव होता रहेगा — हुस्न का मय्यार बदलकर भी बरकरार रहेगा!

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यों ही नहीं जीतता कछुआ खरगोश से ...

उसकी चाल धीमी थी पर

लगातार थी...!!!

आज सुबह एक मित्र ने व्यक्तिगत रूप से यह खुशनुमा संदेश भेजा। अच्छा लगा। सोचा, कहानी पुरानी है। संदेश नया है। इस में मेरे काम करने की धीमी गति का इशारा किया गया है, मेरी जीत, यानी अंतिम जीत, में भरोसा जताया है। थोड़ी देर तक, अच्छा लगता रहा! मन उछलता रहा मित्र के भरोसे पर। मन अटका रहा अपनी धीमी गति पर। धीमी गति से दुख भी हो रहा था। तेज से तेज रफ्तार होती जा रही इस दुनिया में धीमी गति! गति बढ़ाने के क्या उपाय हो सकते हैं। भला जीत का प्रलोभन किसे नहीं होता है! जीत के लिए ही तो बार-बार कीलिंग इंस्टिक्ट की दुहाई दी जाती है। कीलिंग इंस्टिक्ट — यानी जीत के लिए प्रतिद्वंद्वी मार डालने पर आमादा होने की हद तक की मनोवृत्ति! भयानक है यह सब। किसी भी कीमत पर जीत! किस की जीत? जीत व्यक्ति की। व्यक्ति की जीत का दु:स्वप्न ही तो व्यक्ति को युयुत्सा के मनोभाव के गिरफ्त में फँसाकर अकेला करने का मूलमंत्र है। यहीं भूत है। व्यक्ति की जीत का दु:स्वप्न ही वह प्रेत है, जिसके पाँव के निशान दिखते तो आगे जाते हुए हैं, लेकिन जा पीछे रहे होते हैं, बहुत पीछे आदिम काल तक — यही तो है आदि पुरुष के प्रति जादुई खिंचाव और फिर से वैसा ही कुछ बनने की जानलेवा ललक का रहस्य! जी, इसी सरसों में भूत के होने का अंदेशा नहीं, विश्वास बढ़ता गाया।

कल की ही तो बात है। महेश मिश्र जी ने जॉर्ज ऑरवेल की किताब — फासिज्म एंड डेमोक्रेसी — के एक लेख के हवाले से इस दौर में साहित्य की किसी संभावना के पूरा खत्म नहीं भी तो, संभावना के कम-से-कमतर होने की बात पर चिंता जतायी थी। इस लेख में व्यक्ति की स्वायत्तता के अभाव — उस की व्यक्तिगत भावनाओं, इच्छाओं, प्रज्ञाओं, कर्मठताओं, प्रसन्नताओं, संतोषों का किसी अन्य के अधीनस्थ हो जाने के हाहाकर — की चिंता थी। व्यक्ति की स्वायत्तता की एक सीमा होती है, उस सीमा से बाहर व्यक्ति की स्वायत्तता के उच्छृंखलता में बदलते कितनी देर लगती है! किसी हद तक उच्छृंखलता और अराजकता पूँजीवाद की वैचारिकी के अनुकूल होती है। उसे मानव संगठन के किसी भी रूप से परेशानी होती है — सिविल सोसाइटी और अहिंसा प्रतिश्रुत संगठन से भी। परेशानी होती है, क्योंकि संगठित होने की कुछ बुनियादी शर्तें होती हैं, कुछ अनुशासन होता है, संगठन से कुछ-न-कुछ तो शक्ति बनती ही है। इस परेशानी को दूर करने का पूँजीवाद की वैचारिकी के पास एक उपाय होता है — संगठन से उत्पन्न शक्ति को वह व्यक्ति की शक्ति होने का, संगठन की जीत के व्यक्ति के जीत होने का सामाजिक भ्रम बनाता है। ऐसे में, हमारा सचेत कवि भी कह उठता है — है जिधर अन्याय, है उधर शक्ति! या यह कि उपन्यासकार दर्ज करता है कि लोगों के बिखर जाने का उतना डर नहीं है, जितना संगठित होने से, क्योंकि संगठन में शक्ति है और शक्ति अनिवार्यत: अन्याय करती है।

थोड़ा, जीत और हार पर भी बात कर लेते हैं, यहाँ संक्षेप में विस्तार से फिर कभी, फिर कहीं! यदि धोनी की जीत जिसे कहा जाता है, वह अगर सिर्फ धोनी की जीत हो तो वह हमारी खुशी का कारण कैसे हो सकता है! हम क्यों खुशी से मतवाले या बावरे हो जाते हैं। चलिए, ध्यान दिलाएँ — खेल की अपनी राजनीति होती है, राजनीति का अपना खेल। ऐसा मानते हैं तो इसे दोनों जगह लागू हो सकने की संभावना पर विचार करना आप की भी जिम्मेवारी है।

कल जब मैं ने महेश मिश्र के वाल पर गाँधियन नैतिकता और मार्क्सीय दृष्टि के महत्व का इशारा किया तो मेरे मन में क्या बात थी, इसे थोड़ा-सा साफ करना जरूरी है। गाँधियन नैतिकता का आशय व्यक्ति की व्यक्तिगत भावनाओं, इच्छाओं, प्रज्ञाओं, कर्मठताओं, प्रसन्नताओं, संतोषों के स्वत्वों के स्व अधीन और मार्क्सीय दृष्टि का आशय स्वत्वों के स्व अधीन होने की सांगठनिक संभावनाओं को हासिल करने — स्व के स्वत्व और संगठन की शक्ति के रसायन के सामाजिक अंतर्लयन का आशय है! थोड़ा कठिन है। असंभव नहीं। क्योंकि इस कनवर्जेंस (Convergence) के अलावा संगठन से उत्पन्न शक्ति को व्यक्ति की शक्ति होने का, संगठन की जीत के व्यक्ति के जीत होने का सामाजिक भ्रम बनाने के पूँजीवाद की विषाक्त-हितैषिता से बच निकलने का फिलहाल न कोई कौशल है, न कोई कारगर उपाय दिखता है। जय पराजय की शब्दावली में नहीं, सह-अस्तित्व में ही अस्तित्व के सुरक्षित होने की समझ के रूप में पढ़ा जाये — कीलिंग इंस्टिक्ट से तत्काल मुक्त होने की आपात-धर्मिता एवं सर्वाइवल इंस्टिक्ट की दीर्घकालिक जरूरत और महत्व को डिकोड करने और समझने का प्रयास किया जाये। रोजी-रोटी सहित जीवन के सारे उपक्रम सामूहिक और सांगठनिक उद्यमों और उद्यमिताओं से हासिल होते हैं! और हाँ, इसे मेरा व्यक्तिगत निष्कर्ष न मानकर सामाजिक स्वीकृति का प्रस्ताव मानना उचित होगा — यही प्रार्थना है। विश्वास है, साहित्य संभव होता रहेगा — हुस्न का मय्यार बदलकर भी बरकरार रहेगा!

यह फासिज्म से पार का और उस से भयावह दौर है

ऑरवेल के निष्कर्ष को भाषा के पार जाकर देखना चाहिए, उन्हें फासिज्म और सोशलिज्म के पश्च प्रभाव (After Affect) को समझने का मौका नहीं मिला, थोड़े-से विभ्रमित निष्कर्ष पर पहुँचने की छूट उन्हें मिलनी चाहिए।

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लोकतंत्र पर फासिस्ट और कम्युनिस्ट दोनों में सर्वसत्तावाद के लक्षण होते हैं, एक ही आधार पर प्रहार करते हैं। ऊँचे और बड़े लोगों को अच्छा लगनेवाला तर्क सामने आता है । लोकतंत्र में निकृष्तम को उच्चतम स्थान मिल जाता है। सर्वसत्तावाद के समर्थक लोकतंत्र को एक धोखा मानते हैं। वे मानते हैं, लोकतंत्र पूरा धोखा नहीं है, लेकिन अंततः धोखा है। लोकतंत्र के पक्ष में जितने तर्क हैं उन से ज्यादा विपक्ष में हैं। पाँच साल में एक बार अपने पसंदीदा को अपना समर्थन देने का मौका मिलता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उनका जीवन उनको रोजगार देनेवाले से नियंत्रित होता है। रोजगार देनेवाला से तात्पर्य सकल पूँजीवादी व्यवस्था से है , जो पूँजीवादी व्यवस्था इस या उस तरीके उसके पसंदीदा को अपनी ओर मोड़ लेता है। लोकतंत्र के सारे गुण तभी तक बने रहते हैं जब तक पूँजीवादी व्यवस्था इसे बने रहने देती है। यह एक ऐसी दुनिया होती है जहाँ स्वशासित या स्वनियंत्रित व्यक्ति नहीं होता। आलोचना का मोल नहीं रहता है। लेखक के पास कुछ बुनियादी निष्ठा होनी चाहिए। आज के दौर में लेखन एक व्यक्तिगत मामला होता है। ऑरवेल के मन में केंद्रित अर्थव्यवस्था  इस में वे पूँजीवाद और समाजवाद (स्टेट कैपिटलिज्म) को भी जोड़ लेते हैं। बेरोजगारी, गरीबी से मुक्त करनेवाला हमारा बुद्धि और संवेदना, अर्थात संपूर्ण प्रज्ञा का नियंत्रण, या अपने पक्ष में अनुकूलन भी देर सबेर कर लेता है। हमने देखा है भारत में एक कंपनी अपने कर्मचारियों को अपेक्षाकृत कम दाम में अपना शेअर बेचती है और शेअरधारक कर्मचारी अपनी कंपनी के नफा-नुकसान की चिंता कंपनी के मालिकों से अधिक करने लगता है। बहुत सारे शेअर धारक मतदाता भी होते हैं। सारे मतदाता शेअर धारक नहीं होते हैं, लेकिन सारे शेअर धारक मतदाता होते हैं। क्या ऐसे माहौल में जहाँ व्यक्ति के चिंतन मनन , संवेदनाओं, इच्छा और चयन आदि की स्वायत्ता न हो और ये क्षण-क्षण बदलने की छम-छम चपलताओं से आक्रांत हों वहाँ क्या लेखन संभव है! ऑरवेल मानते हैं नहीं। ऑरवेल का मानना जरूरी नहीं कि हमारे लिए भी सही हो, बल्कि नहीं है। हाँ, कठिन जरूर है। यह  सच है कि जब व्यक्ति जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के संदर्भ  में गत्यात्मक स्थिरता (इसे जड़ता न समझा जाये) न हो तो, उसकी प्रज्ञात्मक-स्वायत्ता, मानसिक स्वायत्ता, चयन की इच्छा और क्षमता भंगुर हो जाता है। जब इच्छा की स्वतंत्रता नहीं तब नैतिकता की बात बे मानी है, यह बात तो बार-बार कही गई है। जब इच्छा स्वायत्त नहीं तो चिंतन का स्वायत्त होना दूर की कौड़ी है। से में गाँधियन नैतिकता और मार्क्सवादी दृष्टि काम आ सकती है – अलग-अलग नहीं, इनके भौतिक मिश्रण से नहीं, बल्कि एक साथ और इनके रासायनिक मिश्रण से। भौतिक मिश्रण और रासायनिक मिश्रण के अंतर पर यहाँ विस्तार से कहने की जरूरत नहीं है। एक बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए, समाजवाद और फासीवाद दोनों एक ही तरह के कारण से लोकतंत्र का विरोध कतरते हैं, लेकिन हम ने दोनों के विरोध के अंतर को ठीक से समझा नहीं। हमने फासिज्म और सोशलिज्म को ही तरह का बरताव किया – जबकि फासिज्म खुद निकृष्ट है और उत्कृष्ट के बारे में सोचता भी नहीं है, वहीं शोसलिज्म निकृष्ट को उत्कृष्ट बनाने की बात पर सोचता है। यह सच है कि ऊँचे और बड़े लोगों को भी जीवन में भौतिक समृद्धि के उपरांत जो भी आधिभौतिक भौतिक चाहिए वह लोकतंत्र में ही मिल सकता है। निकृष्तम को उच्चतम स्थान मिलने का तर्क उतना प्रभावी नहीं रह जाता है। और अंततः निकृष्ट के उत्कृष्ट बनने की प्रक्रिया की खोज शुरू होगी। इस खोज के रास्ते कठिन होंगे, लेकिन  में गाँधियन नैतिकता और मार्क्सवादी दृष्टि  का रसायन उनका पाथेय या बटखर्चा  जोगाता रहेगा। इस काम में साहित्य की भूमिका है, बस साहित्यकार को समकालीन हताशा से बाहर निकलना होगा और समझदार पूँजी का सहयोग मिलेगा। और हाँ, आगत एवं आसन्न संकट का संबंध सिर्फ व्यवस्था की वैचारकिता से तो है ही, कुव्यवस्था के कारण हुए प्राकृतिक क्षरण से भी है। यह फासिज्म का नहीं, उसके पार का और उससे अधिक भयावह दौर है, खैर।

ऑरवेल के निष्कर्ष को भाषा के पार जाकर देखना चाहिए, उन्हें फासिज्म और सोशलिज्म के पश्च प्रभाव (After Affect) को समझने का मौका नहीं मिला, थोड़े-से विभ्रमित निष्कर्ष पर पहुँचने की छूट उन्हें मिलनी चाहिए। बाकी फिर कभी।

(महेश मिश्र के वाल पर टिप्पणी के संदर्भ में)

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

इंसाफ की डगर

इंसाफ की डगर
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लोकतंत्र से क्या अपेक्षा होती है? लोकतंत्र से जो भी अपेक्षा होती है, उस अपेक्षा के पूरे होना का दारोमदार लोकतंत्र के नेताओं पर होता है। लोकतंत्र के नेता अपने व्यवहार में लोकतांत्रिक हों भी यह जरूरी तो नहीं रह गया है! फिर भी उम्मीद तो, उन्हीं से होती है। 1961 में एक फिल्म आई थी – गंगा जमुना। भारत की संस्कृति गंगा-जमुनी है। इस फिल्म में शकील बदायूनी का एक गीत है, इसे गायक हेमंत कुमार ने गाया है। यह गीत बहुत लोकप्रिय भी हुआ था, आज इसकी चर्चा कम होती है। संदेश यह कि लोकप्रियता चाहे जितनी ऊँची हो, एक दिन वह लोक स्मृति से निकल ही जाती है। बहरहाल उस गीत की कुछ पंक्तियों को याद किया जा सकता है –

इंसाफ की डगर पर बच्चो दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
सच्चाइयों के बल पर आगे बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
अपने हों या पराए, सब के लिए हो न्याय
रस्ते बड़े कठिन हैं, चलना सम्हल सम्हल के
इंसानियत के सर पर इज्जत का ताज रखना
तन मन की भेंट देकर भारत की लाज रखना
जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के

लोकतंत्र अपने नेताओं से इससे ज्यादा क्या उम्मीद रखता है! बहरहाल, बच्चे बड़े हो गये, बाकी तो दिख ही रहा है! लोकतंत्र के संदर्भ में, उसके खतरों के बारे में, महत्त्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध न हों तो इस गीत को सुन लीजिए; उपलब्ध हों तो उन से गुजरते हुए इसे भी सुन लीजिए।

लोकतंत्रीय नागरिक

लोकतंत्रीय नागरिक 

आज राज्य और समाज भयानक तनाव से गुजर रहे हैं। मणिपुर की घटना से लोग बहुत विचलित हैं। लोकतंत्रीय सरकारों के रहते यह सब हुआ है, होता रहा है। इस तरह की घटनाओं को, वह कहीं भी हो, नजरंदाज करना मुश्किल तो है ही, खतरनाक भी है। याद करना चाहिए, ‘भारत में विभिन्न वंशों और राजाओं का शासन रहा, लेकिन समाज अपना काम करता रहा और कभी भी इस काम में कोई दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की। राजनीतिक नेतृत्व के परास्त होने या शासन से बाहर कर दिये जाने के बावजूद, बिना किसी उथलपुथल के इसकी संपन्नता अक्षुण्ण रही। सापेक्षिक रूप से समाज स्वशासी था। समाज और राज्य स्वतंत्र इकाई के रूप में काम करते थे, यह टैगोर का स्पष्ट रूप से मानना था।’ (साभारः THE POLITICAL IDEAS OF RABINDRANATH TAGORE: Reflections of a Public Intellectual: SUBRATA MUKHERJEE)
 समाज में स्वशासन का होना आज दूर की कौड़ी हो गई है। यह राजनीतिक विफलता से अधिक नागरिक जमात की बौद्धिक एवं सामाजिक अनुपस्थिति से उत्पन्न संकट है। लोकतंत्र के नाम पर समाज धर्म, समुदाय आधारित वोट बैंक में और नागरिक महज वोटर बनकर रह गया है।  दुनिया भर में घट रही घटनाओं को देखते हुए यह साफ-साफ मान लेना चाहिए कि सराकारें, वे कैसी भी हों कहीं भी हों, कभी नहीं चाहती हैं कि समाज लोकतंत्रीय हो। चुनाव केंद्रित राजनीतिक दलों से इस मामले में, अब व्यर्थ की न तो लोकतंत्रीय उम्मीद की जानी चाहिए और न ही दोष देना चाहिए। यह मान लिया जाना चाहिए कि सारा दारोमदार नागरिकों पर ही है। लोकतंत्र के प्रति निष्कपट निष्ठा रखनेवाला नागरिक जमात ही लोकतंत्रीय समाज और लोकतांत्रिक सरकार बनवा सकता है। एक अच्छा नागरिक होने के लिए क्या जरूरी है?  ‘किसी व्यक्ति को अच्छा हरवाहा बनने के लिए भूगर्भशास्त्री बनने की जरूरत नहीं है और इस बात की भी जरूरत नहीं है कि वह उस चट्टानी परत को या उसके नीचे की चट्टानी परत को जाने जो उस मिट्टी को थामे है, जहाँ वह रहता है और काम करता है और जहाँ से वह अपने लिए पोषण प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अच्छा और उपयोगी नागरिक बनने के लिए यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति अच्छा इतिहासकार हो और यह जाने कि जिस संसार में वह रहता है वह कहाँ से आया और जहाँ वह रहता है तथा काम करता है और जहाँ से वह अपना श्रेष्ठ पोषण हासिल करता है, उस बौद्धिक जमीन को तैयार करने के लिए मानव जाति को भाषा, धर्म और दर्शन के कितने चरणों से होकर गुजरना पड़ा है।’ (साभारः Bharat : Hamein Kya Sikha Sakta Hai? (Hindi Edition)Max Muller and Suresh Mishra)
 जी, सारा दारोमदार नागरिकों पर ही है।


अचानक छा जाता है अंधेरा

अचानक छा जाता है अंधेरा

अचानक छा जाता है अंधेरा

फिर उठता है पर्दा

मंच पर बिखर जाती है रौशनी

पर्दा उठानेवाला भी अंधेरे में  

दर्शक दीर्घा भी अंधेरे में

बहुत मद्धम उजाला नेपथ्य में

 

मंच के नीचे से आती है आवाज

दर्शकों को अंधेरे में क्यों रखा जाता है!

जवाब देता है पर्दा उठानेवाला

कृपया, शांति बनाये रखें

ऐसा ही होता आया है शुरू से

नाटक का यही है रिवाज

शांत पापम, बिल्कुल शांत फालतू आवाज।

 हँसता हुआ सूत्रधार, सूत्र से पीठ खुजलाते हुए

जनता खुश होना क्यों नहीं सीखती

जानते हुए भी कि खुश न होना द्रोह है!

नेपथ्य से आती है आवाज जनता खुश है महाराज!

काली रौशनी कहकहे में लिपटकर पसर जाती है!

आकाशवाणी, पुष्प वृष्टि

नाटक का यही है रिवाज

शांत पापम, बिल्कुल शांत फालतू आवाज।

छा जाता है अंधेरा।

लोकतंत्र का भविष्य पर

लोकतन्त्र का भविष्य : लोकतान्त्रिक सरकार के लिए लोकतान्त्रिक समाज होना अनिवार्य है!
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आज के प्रश्न की पुस्तक श्रृँखला की 24वीं कड़ी में Vani Prakashan वाणी प्रकाशन की नई पुस्तक लोकतन्त्त्र का भविष्य Arun Tripathi अरुण कुमार त्रिपाठी के संपादन में आई है। इस पुस्तक में कई महत्त्वपूर्ण आलेख हैं। इन आलेखों में लोकतंत्र के भविष्य के संदर्भ में काफी गहन चिंतन किया गया है। सिर्फ भारत के लोकतंत्र के संदर्भ में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र की घनीभूत चिंता को भी इस पुस्तक के आलेखों के केंद्र में रखा गया है। "सम्पादक की  बात" में काफी विस्तार से लोकतन्त्त्र के अतीत और वर्त्तमान के उलझे सूत्रों को सुलझाने में भविष्य की संभावित और आशंकित रूपरेखा को आँकने की तीव्र छटपटाहट है। इस छटपटाहट में भारत की अद्यतन लोकतांत्रिक स्थितियों की भी आहट है। इस पुस्तक में शामिल लेखों को पढ़ते हुए इस आहट की आवाज क्रमशः तेज होती जाती है। आम नागरिकों की तरह जनतंत्र मेरी भी चेतना का बड़ा इलाका घेरता रहा है। यह पुस्तक रेखांकित करती है कि लोकतान्त्रिक सरकार के लिए लोकतान्त्रिक समाज होना अनिवार्य है। यहाँ इस सवाल पर भी विचार करना जरूरी है कि समाज के लोकतांत्रिक होने की प्रक्रिया क्या है और इस प्रक्रिया में सरकार या राज्य की भूमिका क्या हो सकती है या होनी चाहिए। इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे भी फिर से, एक स्वतंत्र लेख तैयार करने की इच्छा हो रही है। वैसे, इस पुस्तक की आलोचना की भी इच्छा है। पता नहीं यह सब मुझ से हो पायेगा या नहीं। एक बात और, यह पुस्तक आम और निर्विशिष्ट नागरिकों के लिए तो दिलचस्प है ही, राजनीति और समाज शास्त्र के शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी है।   
इस पुस्तक में शामिल हैं –
1 लोकतन्त्रः नन्ही-सी जान, दुश्मन हजार – रमेश दीक्षित
2 लोकतन्त्र का पुनर्निर्माण – शंभुनाथ
3 लोलुभावनवाद और तानाशाही – अभय कुमार दुबे
4 लोकतन्त्रः स्वप्न से अन्तर्विरोध तक – नरेश गोस्वामी
5 पूँजीवाद से परे जाने की जरूरत – विजय झा
6 लोकतन्त्र की धड़कन है आन्दोलन – डॉ सुनीलम
7 औपनिवेशिक अतीत को उतारने की जरूरत – गिरिश्वर मिश्र
8 आपातकाल का अतीत और उसका भविष्य – जयशंकर पाण्डेय
9 न्यायपालिकाः क्या कुछ संभावना शेष है? – अनिल जैन
10 गोदी मीडिया का स्तम्भ – अरुण कुमार त्रिपाठी
11 अल्पसंख्यकों को चाहिए समान अवसर – सैयद शाहिद अशरफ
12 लोकतन्त्र के हाशिये पर – कमल नयन चौबे
लगभग आम राय यह है कि दुनिया भर में लोकतंत्र के विपन्न होने में लोकतांत्रिक पद्धतियों से चुनी हुई सरकारें ही भूमिका अदा कर रही हैं; अर्थात सरसों में ही भूत! अभी तो यहाँ इतना ही।

मास क्लास

लोक

डिजिटल आवारगी

डिजिटल आवारगी

डिजिटल दुनिया में लोग पहुँच रहे हैं। कुछ लोग पहुँच चुके हैं। पहुँच ही नहीं गये हैं, वहाँ बस भी गये हैं। वहाँ उन्हों ने अपने लिए मनोबांछित घर, सड़क, गली, वाहन, वाशरूम की डिजिटल सुविधा अर्जित कर ली है। इस के साथ ही डिजिटल आवारगी के लिए भी बहुत सारे अवसर वहाँ उपलब्ध हैं। कुछ लोग अपने हिसाब से कुछ गंभीर काम करना चाहते हैं, वे भी आवारगी के सुख से खुश होने के लोभ से अपने को बचा नहीं पा रहे हैं। क्या यह डिजिटल घर सुरक्षित है? सुरक्षित हो या नहीं, सुविधाजनक बहुत ही है। सुविधा का आकर्षण कई बार सुरक्षा मानकों की अवहेलना करवा बैठता है। डिजिटल आवारगी विशेषज्ञता का दंभ भर कर किसी को भी विशेषज्ञ की भंगिमा में  कुछ भी कहने के लिए उकसाती रहती है। असल में, हाइपर एक्टिविटी हमें अटेंशन डेफिसिट में डाल देती है। इसके साथ साइबर लोफिंग या डिजिटल आवारगी की ओर मन और अधिक तेजी से लपकने लगता है।  मन की  गति से लोग जहाँ-तहाँ पहुँच जा रहे हैं।  जरूरी नहीं कि वहीं पहुँचें, जहाँ वे पहुँचना चाहते थे। यह चाहना बहुत महत्त्वपूर्ण और यह  इच्छा स्वातंत्र्य के सवाल से जुड़ा हुआ है। इतने तरह के  प्रभावों से इस तरह आच्छादित रहता है मन कि इच्छा स्वातंत्र्य की हवा निकल जाती है। निकलते हैं कहीं और के लिए, पहुँच कहीं और जाते हैं। जहाँ पहुँचते हैं, वहीं रम जाते हैं। जहाँ जाने की इछ्छा लेकर निकलते हैं उस जगह को भूल जाते हैं, उस जगह जाने की अपनी इच्छा और इच्छा के कारणों के प्रति उदासीन हो  जाते हैं। न सिर्फ उदासीन हो जाते हैं, बल्कि मानने लगते हैं कि जहाँ पहुँचे वहीं के लिए निकले थे। न इच्छा बचती है, न स्वतंत्रता। 

लेखक कुछ और लिखने के लिए बैठता है और लिखने कुछ और ही लग जाता है। पाठक कुछ और पढ़ने के लिए सोचता है पढ़ने कुछ और ही लग जाता है। हालाँकि, अब पाठक तो बचे नहीं हैं, लेखक में उन्नत या अवनत हो गये हैं। अवनत! जी हाँ अवनत। क्योंकि मेरे लिए यह मानना कठिन है कि पाठक हमेशा लेखक से कमतर होता है। लिखना एक तरह का कौशल है तो पढ़ना भी एक तरह का कौशल है। न सिर्फ दोनों तरह की कुशलता में अंतर होता है, बल्कि दोनों तरह की कुशलता के लिए भिन्न तरह की दक्षता उपयोगी होती है। अच्छे पाठक का बुरे लेखक में अंतरण पाठक की अवनति ही है। हिंदी पर तो इसका बड़ा दुष्प्रभाव हुआ है। इस प्रक्रिया में हिंदी का पाठक भी काम से गया और लेखक भी काम से गया। नहीं क्या! उच्च कोटि के पाठक के अंदर भावनात्मक उमंग और बौद्धिक समझ का  घनत्व किसी साधारण लेखक से कहीं ज्यादा होता है।  

हिंदी लेककों के पास ऐसा कोई पाठक, पाठक समूह या कम्युनिटी सपोर्ट नहीं है जो उसके लेखन की प्रक्रिया दौरान लेखन की गुणवत्ता को बढ़ाने में कोई योगदान कर सके या करता हो। यह बात भी सही है कि हिंदी के लेखक में अपने पाठक के प्रति भी कोई खास सम्मान तो बना नहीं, अब तो पाठक काअस्तित्व ही संदेह के घेरे में है। संभव है, प्रोफेसर लोग अपने छात्रों से पाठक के अभाव की थोड़ी-बहुत क्षतिपूर्त्ति कर लेते होंगे। क्या हम अपनी इच्छा और स्वतंत्रता को समझने और इनकी परवरिश के लिए जरा भी उत्सुक हैं! या यों ही बहते जाना है!  

मेरे ध्यान में है कि पंत जी की कविता को एक प्रोफेसर साहब न सिर्फ पढ़ते थे बल्कि उस पर बातचीत भी करते थे। मैंने महसूस जारी… 


याद नहीं, तो क्यों याद नहीं है

याद नहीं, तो क्यों याद नहीं है

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सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

ओ रात दिन आँसू बहाना याद है तो

वो कामिल आजादी क्यों याद नहीं

 

सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

मोहान में पैदा हुए हसरतें कामिल थी

नये-नये ख्वाब मुकम्मल खैरियत याद है

तो आवाज-ए इन्कलाब क्यों याद नहीं

वो कामिल आजादी क्यों याद नहीं

 

सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

वो दश्त-ए-खुद फरामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आते तो क्यों नहीं अक्सर याद आते हैं

क्या कहूँ खुद को अब मन में गरूर इस तरह कि

न दामनों की खबर है न गिरेबानों की

 

सवाल है तो यही सवाल कर खुद से

वो जो बाँसुरी रहती थी साथ उनके सदा

वो नगर आशिकी से इसरार कोई

याद नहीं है तो क्यों नहीं है

 

सवाल है तो यही सवाल कर से खुद से

सवाल कि दस्तखत नहीं वहाँ तो क्यों नहीं

ओ रात दिन आँसू बहाना याद है तो

तो फिर हसरत मोहानी क्यों याद नहीं

ओ रात दिन आँसू बहाना याद है तो

वो कामिल आजादी क्यों याद नहीं

 

(हसरत मोहानी को याद करते हुए)

इतिहास के आइने में हाल-फिलहाल

इतिहास के आइने में हाल-फिलहाल

1757 में इस्ट इंडिया की जीत के बाद से भारत में ब्रिटिश राज का प्रारंभ हो गया। वारेन हेस्टिंग्स और रॉबर्ट क्लाइव को ब्रिटिश राज की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। 1773 से 1785 तक वारेन हेस्टिंग्स फोर्ट विलियम प्रेसिडेंसी (बंगाल) के प्रथम गवर्नर जेनरल रहे जो वस्तुतः भारत के पहले गवर्नर जेनरल थे। हालाँकि पहले अधिकारिक गवर्नर जनरल लार्ट विलियम बेंटिक थे, जिनके शासन काल में राजा राम मोहन राय के प्रयास से सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा।  1773 से 1785 तक वारेन हेस्टिंग्स अपने पद पर बने रहे। 1787 में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उन पर महाभियोग लगाया गया। हालाँकि, 1795 में वे बरी हो गये और 1814 में प्रिवी काउंसिलर भी बन गये। महत्वपूर्ण यह है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भ्रष्टाचार और सत्ता के प्रशासनिक दुरुपयोग के मामले में शासक पर महाभियोग लगा, गहन जाँच प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि इस के पीछे कई कारण सक्रिय थे, औपनिवेशिक अंतर्विरोध और भिन्न हित-मत आदि। इस महाभियोग का नेतृत्व एडमंड बर्क ने किया। उन पर आरोप क्या थे, आज महाभियोग के कुछ बिंदुओं को याद करना आज हमारे लिए दिलचस्प हो सकता है। वे कुछ थे, ग्रेट ब्रिटेन के संसदीय विश्वास के साथ धोखा, ब्रिटेन के राष्ट्रीय चरित्र को कलंकित करना, भारतवासियों के अधिकारों और स्वतंत्रता का अतिक्रमण, भारत की संपदा का विनाश।

महत्त्वपूर्ण यह है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भी जनता को कष्ट में डालने पर महाभियोग लगता था। कानूनी कार्रवाई होती थी। एक बात साफ-साफ कहना जरूरी है। इस संदर्भ को न्यायपूर्ण व्यवस्था या जन हितैषी सोच का उदाहरण नहीं माना जा सकता है। लोकतांत्रिक शासकों को भी शामिल करते हुए भी फिलहाल सोचा जा सकता है कि क्या शासकों के अंतर्विरोध से उत्पन्न टकराव जो ऊपर से  न्यायपूर्ण और जनहितैषी दिखते तो हैं, क्या सचमुच वे न्यायपूर्ण और जनहितैषी होते भी हैं! पता नहीं, इतिहासकार और विद्वान लोग बेहतर निष्कर्ष निकाल सकते हैं। मेरे जैसे साधारण नागरिक के अधकचरा ज्ञानवाले उत्तप्त मन में नाना-नाना तरह की फालतू सवालिया तरंगें तो यूँ ही उठती रहती हैं।

लिखाता नहीं है इंक्लाब

लिखता हूँ इश्क
लिखा जाता है पेंशन 

लिखता हूँ इश्क 
लिखा जाता है दवाई

लिखता हूँ इश्क 
लिखा जाता है दुहाई सरकार

ऐसा नहीं कि यह है चमत्कार
युवाओं के साथ भी होता होगा 
कुछ इसी प्रकार। 

क्या पता नहीं भी होता होगा!
उन के माथे पर तो 
लदता गया है असह्य भार!
जरूरी नहीं कि वे लिखते होंगे रोजगार 
और हो जाता होगा वह कुछ और! 

लब्बोलुआब! 
लिखो कुछ भी। 
लिखाता नहीं है इंक्लाब! 

इंतजार

इंतजार

रहता था पहले किसी-न-किसी का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता अब किसी का कोई इंतजार


पहले रहता था बहुत सारी चीजों का इंतजार

कहीं से कोई चिट्ठी-पत्री आये 

इंतजार रहता था डाकिये का

डाकिया तब मेरे इंतजार का एक सब-से बड़ा आसरा था


जिंदगी थोड़ी व्यवस्थित हुई 

राष्ट्रीय पुस्तकालय की सीढ़ियों पर

किसी वृक्ष की छाँव में 

कभी बैठकर, कभी लेटकर इंजार रहता था

मित्रों का संभावनाओं से भरे हुए कवियों का


हमेशा रहता था इंतजार घड़ी के काँटों के घूमने का

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

रहता था पहले किसी-न-किसी का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता अब किसी का कोई इंतजार



प्रेमिकाएँ तो थी नहीं, न उनके होने की कोई गुंजाइश थी

फिर भी उनका इंतजार रहता था

सब से ज्यादा इंतजार रहता था संपादकों के रुख का

पत्रिकाओं का, कविताओं को, कहानियों का

उत्तेजनाओं से भरा इंतजार


काम पर जाता था समय से

वेतन मिल जाता था समय पर

चल रही थी गृहस्थी, पूरा परिवार माथे पर था

लेकिन तब वह सब बोझ नहीं था

न कहूँगा कि इनके मुतल्लिक कोई इंतजार नहीं रहता था

रहता था जरूर मगर उस इंतजार में कोई उत्तेजना नहीं थी


रहता था पहले किसी-न-किसी का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता अब किसी का कोई इंतजार



रहता था इंतजार खबरों का

अखबार का, अखबार जो खबर का बहुवचन है

खबरों की बहुवचनात्मकता बची नहीं रही

न बचा रहा अखबार का इंतजार


रहता था बहुत सारी बातों का इंतजार

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

नहीं रहता कोई इंतजार अब किसी का इंतजार


दीवार घड़ी को देखता हूँ

काँटे वहीं घूमते रहते हैं गोल-गोल 

उन्हें मेरे देखने न देखने से कोई फर्क नहीं पड़ता

बस घूमते रहते हैं गोल


तारीख बदल जाती है

दिन नहीं बदलता है

महीनों में कहीं जाना हुआ

उठकर चल देता हूँ


मनोकामना बस इतनी थी कि कुछ बचे-न-बचे

किसी की आँख में बचा रहे थोड़ा-सा इंतजार

मेरी आँख में बचा रहे किसी के लिए थोड़ा-सा इंतजार


उत्तीर्ण! और उऋण?

उत्तीर्ण! और उऋण?
——–
गाँठ बाँध लीजिए। क्लास नोट के बल पर अच्छे अंक से पास हुआ जा सकता है — तैरकर पार, उत्तीर्ण हुआ जा सकता है,  उऋण नहीं हुआ जा सकता है। क्लास नोट से बाहर निकलकर और मझधार में टिके रहकर ही उऋण हुआ जा सकता है। इस समय उत्तीर्ण होना जरूरी है और शायद उऋण होना भी जरूरी है। कैसे होगा,एक साथ उत्तीर्ण भी और उऋण भी। भारतीय संस्कृति बताती है, रुपये पैसे के अलावे और भी ऋण होते हैं — पितृ देव ऋषि ऋण आदि और जोर लिजिए उपकार ऋण आदि भी।
क्लास रूम तो जीवन निर्वाही सैलरी की शर्त है। सार्थक अध्यापक कभी क्लास रूम से सीमित नहीं होता, वह अपने छात्रों के हृदय के विस्तार में टहलते हुए उनके दिमाग की अंतर्यात्रा करते हुए अपने और छात्रों के चित्त को व्यापक और अंतःकरण को उदात्त बनाता हुआ है उत्तीर्ण और उऋण होने की कोशिश में लगा रहता है — अपनी धुन में किसी भी हद तक। इस ऐसा अध्यापक नहीं मिलते हैं? मिलते हैं। ऐसे दो चार अध्यापकों को तो मैं ने देखा भी है, खोजें तो कई दिख जाएंगे — अतीत में भी और वर्तमान में भी। ऐसे अध्यापक का सान्निध्य मुझे नहीं मिला यह और बात है। जो मुझे नहीं मिला वह होता नहीं यह मानने को मैं तैयार नहीं। अपना-अपना नसीब — यही उचारकर तो लोग जिंदा रहते हैं, मैं भी हूँ तो क्या अजब……!

साहित्य के शेरपा

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक

(साभार :जयशंकर प्रसाद : कामायनी) 
———
जीवन का कोई भी हो, हर जिंदा आदमी के अंदर शिखर पर पहुंचने की एक स्वाभाविक चाह होती है। कुछ पहुँच पाते हैं, कुछ का सफर बीच में ही समाप्त हो जाता है। कुछ तो उत्तुंग शिखर पर पहुंच जाते हैं। विडंबना यह कि उत्तुंग शिखर पर पहुँचनेवाले को भी किसी शिला के छाँह की चाहत होती है। समस्या यह कि उत्तुंग शिखर से भी ऊपर शिला कहाँ से आये, और शिखरवासी को छाँह कहाँ से मिले। जीवन का प्रवाह तो नीचे होता है, जिसे भींगी नजरों से शिखरवासी देख ही सकता है। शिखरवासी को गंगा स्नान का सुयोग कभी नहीं मिलता है। बहरहाल, यहाँ इतना भर कहना है कि शिखर पर पहुँचनेवाले को हर कोई याद करता है, उन शेरपाओं को कौन याद करे जिनके बिना शिखर पर पहुँचना असंभव होता है! साहित्य के शिखर पुरुषों के शेरपाओं को हम नहीं जानते! क्या सचमुच जानना भी नहीं चाहते! शायद चाहकर भी जान नहीं पायें —मैं जब भी शिखर की तरफ देखने की कोशिश करता हूँ उन अजाने शेरपाओं को मन-ही-मन प्रणाम करता हूँ। मेरा कोई शेरपा नहीं, लेकिन नाविक तो है जो मुझे अक्सर भुलावा देकर धीरे-धीरे शिखरिणी कोलाहल से दूर ले जाता है। 

भोटतंत्र की माया

एहि भोटतंत्र की माया!

माया महाठगिनी बहुत पुरानी
कबहुं मुहँ पर मूति दैत हो
कबहुं चरन पखारी!

केहि विध दरसाऊँ
हमहि तोर परम हितकारी!

करहु लाल ऐसन कछु किरदानी लोगन थू-थू कहि जा के निंदा खूब बखानी!

जमा होई जाए लोगन भोटवालन तब
 चरन पखारि चानस बनै कुछ
 जेहि विध हितकारी तिरलोकी छवि जगत में लगे उरानी!

एहि भोटतंत्र की माया बहुत पुरानी साधो
माया बहुत पुरानी
राज परशासन लीला केरि तिरगुन फांस रखबारी
माया महाठगिनी हम जानी
बस जानी नहि सवधानी।

कबहुं मुहँ पर मूति देत हो
कबहुं चरन पखारी!

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

बीज

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा इस पर अपने विश्वास को टिकाये रखना

टिकाये रखना विश्वास जैसे कोई अंधा टिकाये रखता है

हाथ की छड़ी पर विश्वास और पार करता रहता है रास्ता

चाहे हो जितना भी टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता, पार करता रहता है।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा इसे सम्हाल कर रखना अपने पास

अपने पास जैसे धरती रखती है सब कुछ अपने पास

मिला लेती है अपने में, नष्ट करने के लिए नहीं

लौटा देती है, फिर ढेर सारा फल, बीज, वृक्ष और बहुत कुछ

किसी चीज को सम्हालकर रखने के लिए नहीं है कोई सुरक्षित जगह

बस धरती है सुरक्षित जगह, समझना धरती में तुम हो

धरती में होते हुए तुम महसूस करना धरती तुम में है।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा धरती का विश्वास आकाश में है

समझना तुम आकाश में हो धरती के विश्वास के साथ

यह मत भूल जाना कि आकाश भी तुम में है उतना ही

बिल्कुल उतना ही जितना तुम हो आकाश में।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा आकाश का विश्वास सागर में है

समझना तुम सागर में हो

धरती और आकाश के विश्वास के साथ

सागर भी तुम में उतना ही है,

जितना सागर में तुम हो।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा सागर का विश्वास तुम्हारे पसीने में है

तुम अपने पसीने में रहना

याद रखना उतना ही पसीना तुम में है,

धरती आकाश और सागर के विश्वास के साथ।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा बीज को सम्हालकर रखना

अपने पसीने के साथ, पसीना में ही सब सुरक्षित हैं --

बीज धरती आकाश सागर और इन सब का विश्वास।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा सम्हालकर रखना विश्वास

विश्वास सम्हाल कर रखना पसीना में।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कह कि पसीना की कमी हो जाने पर

कुछ नहीं बचेगा तुम में और न तुम बचोगे किसी में।

 

पुरखों ने बीज दिया मुट्ठी भर

कहा सम्हालकर रखना।

इतिहास और आश की संयुति

इतिहास और आश की संयुति
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सीमस हीने (Seamus Heaney) की इन स्फूर्तिदायी पंक्तियों में पीड़ित जनसमुदाय को अपनी वाणी की अनुगूंज अवश्य सुनाई दे सकती है: 
इतिहास का कहना है, 
कब्र के इस तरफ (रह कर) कोई आशा मत करो, 
किन्तु जीवन काल में एक बार तो 
न्याय की मनोवांछित लहर 
उठ भी सकती है। 

यही आशा और इतिहास की संयुति होगी।
(साभार : अमर्त्य सेन : न्याय का स्वरूप) 

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ

मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ
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ना ना, किसी लव गुरु ने नहीं
यह तो कबीर ने सिखलाया है
सभ्यता को कान में बताया है
प्रेम में नाचता हुआ मत्त मन
आत्मन्वेषण और आत्मविस्तार
के कठिन रास्ते पर कदम बढ़ाता है
तब उसका ‘नाच’ चुपके से
आलोचना में बदल जाता है।

जैसे वसंत
चुपके से चुंबन में सिमट जाता है
प्रेम सिर्फ भावना न रहकर
मौसम बन जाता है और
अपनी धुरी पर नाचती हुई धरती
हल्की-सी सिहरन के साथ
चुपके से प्रेमपत्र में बदल जाती है।

पूछो तुलसी से कि कैसे
किसी राम का मन खग-मृग-मधुकर से
छल मृग के दृश्याभास से बिंधे
अपनी सीता के मन का पता पूछता है

कहेंगे रवींद्र कि कैसे पागल हवा में
मन का पाल खुल जाता है
उधियाता हुआ मन मानसरोवर पहुँच जाता है

बतायेंगे नागार्जुन जिन्होंने बादल को घिरते देखा
जिन्होंने हरी दरी पर प्रणय कलह छिड़ते देखा
कालिदास से पूछा पता व्योम प्रवाही गंगाजल का

ना ना, किसी लव गुरु ने नहीं
यह तो जीवन के ताना-बाना ने
पुरखों ने सिखलाया है
कि इस कठकरेज दुनिया में
मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ
हे मेरे जीवन से एक-एक कर विदा हो रहे
रूप-रस-गंध के यौवन

प्रेम ही गुरु है! गोबिंद भी!
मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ