देशज पर कमल

कमल की कहानी--- प्रोजेक्ट ऑक्सिजन की पठनीयता निश्चित ही प्रवाहपूर्ण है। इस कहानी की पारिस्थितिकी भी प्रतीकात्मक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है। 90 के आसपास एक कविता लिखी थी; जब व्यवस्था बाजार के हवाले हो जाये और बाजार बाजीगर का अखाड़ा तो बाघ और बानर के अश्लील विकल्पों के बीच आदमी औंधे मुँह गिरा होता है। कमल जी की कहानी में व्यवस्था और व्यापार का जो रिश्ता खिला है उस में मुनाफा सर्वभक्षक की तरह कायम है। पैकेजिंग और प्रोपगैंडा का असर यह कि जनहित और जनसुरक्षा के नाम पर जन को भयाक्रांत कर लूट मचाना इनका किरदार बन गया है। सौंदर्य और शील का होना जीवन की नैसर्गिकता का मनोरम पक्ष है। इस मनोरम पक्ष की रक्षा शक्ति करती है, रक्षा तभी तक जब तक सौंदर्य और शील मिलकर शक्ति का नियंत्रण और नियमन करते हैं। हादसा यह कि सर्वभक्षी शक्ति के दुर्दांत ने सफलतापूर्वक शील और सौंदर्य को अपना दास बना लिया है। शील और सौंदर्य का इतने बड़े पैमाने पर तथा इतना और ऐसा कुत्सित इस्तेमाल सभ्यता ने इसके पहले कभी नहीं देखा।
व्यवस्था में रहकर व्यवस्था के माध्यम से न्याय सुनिश्चित करने के विश्वासवाले नौजवान अधिकारी अपने दुःस्वप्न में उभरनेवाले व्यवस्था के चरित पर अंगुली उठानेवाले नौजवान के सामने खुद को कितना लाचार पाता है! दुर्विपाक यह कि इसकी लाचारी को सौंदर्य अपने गार्हस्थिक शील से और बढ़ा देती है, यह कहते हुए कि खुद को इतना इन्वॉल्व न करो।
पूरे कथा प्रसंग में ये जो कनेक्टिविज्म का सवाल है कहानी की रूह है। मुझे संजीव की कहानी अपराध और ऑपरेशन जोनॉकी की भी बहुत याद आ रही है। यह कहानी एक बड़ी कहानी कि क्राउनिंग है! पूरी कहानी का जन्म होना बाकी है। हाँ, यह कहानी इतने पर भी अपने मुकम्मल होने का भ्रम रचने में सक्षम है। इस भ्रम को भेद कर उस कहानी को पाना रचनात्मक चुनौती भी है और चाहत भी। इस चुनौती को रचनाकार कैसे आत्मसात (इंटरनेलाइजेशन ऑफ रियलाइजेशन के अर्थ में) करता है और समय की चाहत को कैसे पूरा करता है यह तो बाद की बात है, फिलहाल तो देशज के प्रति आभार और कमल को बधाई। अभी तो इतना ही...

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