शुक्रवार, 10 जून 2016

जिस्म से जिरह

जान से बे-खबर
बे-जिस्म जीवन!
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बचपन की निरीह नादानी
यौवन की नैतिक चेतावनी
बुढ़ापे की बढ़ती बदचलनी

जिस्म-दर-जिस्म
जिस्म से जिरह

ओ मेरे पाठक! कृपया, इंतजार करें!
इंतजार!!

जो है नहीं उसका इंतजार?
हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है!

जो है नहीं वह किसी का
इंतजार नहीं करता।

इतनी-सी! बस इत्ती-सी बात!
समझ नहीं आई!

जो था नहीं
कहीं किसी पाप-पुण्य में शामिल

हमने उसके ही इंतजार पर भरोसा किया
किया और भरपूर भरोसा किया,
बहुत ज्यादा

इस तरह एक ढोंग को पवित्र नाम दिया
इसी तरह इस जीवन को खर्च कर दिया

भूल गये कबीर!
देह देही बिन सबद न स्वादं!
बिन फागुन अबीर!
बिन कारण दंगा फसाद!

हाँ जी! जान से बे-खबर,
बे-जिस्म जीवन!

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