गुनाह बेपरदा होगा चमन मुस्कुरायेगा

गुनाह बेपरदा होगा
चमन मुस्कुरायेगा
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दिखाकर ख्व़ाब जो लूट ले चमन
बेपरवाह कि
कैसे मुल्कियों में कायम रहे अमन
मुल्क का नहीं वह खैरख्वाह
उसका साया भी  पुरगुनाह

वह मेरा रहनुमा नहीं, हरगिज़ नहीं

लोभ लालच का फंदा
सुलह या सौगात नहीं

वो लूटते रहें वैखौफ
यह तो खुशनुमा मंजर नहीं है
जो दिखता है बाहर
यकीनन वह अंदर नहीं है
अल्फाज़ हैं भटके हुए-से
नीयत भी साफ नहीं है

वह दिन भी आयेगा
गुनाह बेपरदा होगा
चमन मुस्कुरायेगा

2 टिप्‍पणियां:

kuldeep thakur ने कहा…


जय मां हाटेशवरी.......
आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
31/03/2019 को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में......
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
https://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर