निस्संदेह

निस्संदेह आपके मन में प्रति जो लगाव है, वह मुझे बल देता है। लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि मेरे प्रति अपने लगाव को किसी अन्य पर थोप नहीं सकते। मुझे इसका कुछ तो अनुमान था ही कि देशज के साथियों की ओर से किस तरह की प्रतिक्रिया आ सकती है। यह स्वाभाविक है। दो कारण तो तत्काल समझ में आ सकता है। पहला यह कि मैं कविता के नाम पर जो लिखता हूँ उसे कविता मानने में लोगों को स्वाभाविक संकोच होता है। संकोच मेरे मन भी कम नहीं है। यह अलग बात है कि मैं इसके अलावे और कर कुछ नहीं सकता हं। दूसरा यह कि मैं जब खुद किसी आपसदारी में शामिल नहीं होता हूँ, तो कोई अन्य बेगानी की शादी में अब्दुल्ला क्यों बने भला!
अरुण जी, सच पूछिये तो मेरे अंदर साहित्यकार बनने की योग्यता कभी अर्जित हो ही नहीं पाई, ललक रही होगी जरूर। ललक नहीं थी तो इतने दिन तक जैसे-तैसे इसमें लगा ही कैसे रह गया! अब वह ललक ढलान पर है। बहुत होगा तो क्या होगा! उन तमाम बड़े साहित्यिक लोगों के उदाहरण भरे पड़े हैं कि उनके साथ अंततः क्या सलूक हुआ और हो रहा है। कह सकते हैं कि इन बातों में छद्म आत्मसंतोष ढूढ़ रहा हूँ। जब सच से आंख मिलाने का साहस नहीं बचता है तो छद्म ही सहारा बनता है जीवन का। कहने को बहुत कुछ है,  लेकिन अभी इतना ही।
मुझे किसी से इस मुताल्लिक कोई शिकायत नहीं है। मन उन न करें। अपना लगाव बनाये रखें। देशज पर मेरी कविता को रखने के लिए आभार।

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