शिक्षा का सार और सामाजिक व्यवहार

(निवेदन है कि इसे मेरिटोक्रेसी के संदर्भों को भी ध्यान में रखें)

शिक्षा का सार और सामाजिक व्यवहार

शिक्षा की जरूरत मनुष्य को मनुष्य बनाने और बनाये रखने के लिए है, यह बात हम ढंग से समझ-समझा नहीं पाये। बचपन में पढ़ने की प्रेरणा और प्रताड़ना के लिए जिन लोकोक्तियों का प्रयोग अक्सर सुनने को मिलता था उनमें एक प्रसिद्ध लोकोक्ति यह थी कि पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होओगे खराब। माता-पिता को सबसे अधिक चिंता होती थी अपनी संतति को खराब होने से बचाने और नवाब बनाने की। खराब होने से आशय जीवन की सार्थकता और कुल-गौरव के नाश होने से हुआ करता था। नवाब होने से न सिर्फ जीवन सार्थक बनता है बल्कि 'नवाबी' के भी बहुत सुनहरे अवसर जीवन में हासिल होते हैं। इस तरह माता-पिता बाबा नागार्जुन के दुखरन मास्टर के स्कूल में बच्चों का दाखिला नवाबी हासिल करने के रंगीन स्वप्न के साकार होने की संभावना को परखते हुए करवाते थे। यह तब की बात है जब खेल इतना बड़ा व्यवसाय नहीं बना था अर्थात खेल ही था, हालाँकि खेल में गुसैंया बनने का आरंभ कब का हो चुका था। इस आरंभ के बावजूद, मुहावरा में खेल का रिश्ता हँसी से कायम था। कठिन काम के बारे में कहा जाता था कि यह कोई हँसी-खेल नहीं है!

मनुष्य का जन्म भले ही मनुष्य के रूप में होता हो  लेकिन मनुष्य बनने और बने रहने के लिए उसे आजीवन और अनवरत संघर्ष करना पड़ता है। गालिब ने यूँ ही नहीं कहा था कि `बसकि दुश्वार है, हर काम का आसाँ होना / आदमी को भी मुय्यसर नहीं इन्साँ होना'। मनुष्य बनने और बने रहने का यह संधर्ष क्या और कैसा होता है, यह जानना मनुष्य बनने और बने रहने की प्रक्रिया की प्राथमिक शर्त्त है। तात्पर्य यह कि मनुष्यता की जिस अर्थ में चर्चा होती है उस अर्थ में मनुष्यता नित्य अर्जनशील गुण और चरित्र है। मनुष्य के लिए सबसे कठिन काम होता है अमानुषिक परिस्थिति में भी अपनी मनुष्यता को बरकरार रखना। इस कठिन काम में दक्षता हासिल करने के लिए बहुत सारे उपाय काम में लाये जाते हैं। उन उपायों में से ही एक उपाय है शिक्षा। सामान्य बात-चीत में लोग एक दूसरे से शिक्षित और अशिक्षित के व्यवहार में अंतर की अपेक्षा व्यक्त करते हैं। आशय यह हुआ करता है कि शिक्षित मनुष्य का सामाजिक व्यवहार और आचरण अशिक्षित मनुष्य के सामाजिक व्यवहार और आचरण से न सिर्फ भिन्न होना चाहिए बल्कि सामाजिक उत्थान की दृष्टि से उन्नत, स्पृहणीय और अनुकरणीय भी होना  चाहिए। कई बार तो अशिक्षित और निरक्षर कहे जानेवाले लोगों के आचरण में ही अधिक रौशनी दीख जाती है। और हम चमत्कृत हो जाते हैं। कभी-कभी इसका गहरा असर हमारे जीवन पर पड़ता है।

मैं कोलकाता में नौकरी के सिलसिले में आया और मेरे पास रहने की कोई जगह नहीं थी। रिश्तेदारों के यहाँ रहना नहीं चाहता था। सूत्रों को पकड़ते हुए कादापाड़ा के पास आरिएंट पंखाकल से सटी मजदूर बस्ती घोरबीबी लेन पहुँचा। यहाँ मजदूरों के बच्चों के लिए एक प्राइमरी स्कूल चलता था। इस स्कूल के शिक्षक श्यामसुंदर दास और वंशीधर मिश्र ने मेरी बहुत मदद की। रहने के लिए घर तो नहीं मिला लेकिन विनोद के कारण मेरा मन रम गया। विनोद के पास पंखाकल के गेट के सामने ही चाय की एक नन्ही-सी गुमटी थी जिसमें वह चाय, पावरोटी की दुकान चलाता था। दिन भर मजदूरों को चाय पावरोटी बेच कर रात में वहीं बोरे पर सो जाता था। घर विनोद के पास भी नहीं था। धीरे-धीरे मुझ पर यह रहस्य उजागर हुआ कि बीस-बीस साल से वहाँ रहनेवाले कई लोग बिना घर के ही रह रहे हैं। मुझे बल मिला। पास का सुभाष सरोवर जिसमें स्नान आदि पर तब प्रतिबंध नहीं था और विनोद मेरे ये दो संबल थे।

कोलकाता के लोगों में अखबार पढ़ने का व्यसन-सा है। हिंदी का एक अखबार विनोद की चाय दुकान पर भी आता था। जिन्हें अखबार पढ़ना आता था वे खुद भी उलट-पुलटकर देख लेते थे और जिन्हें नहीं आता था वे दूसरे के मुँह से देश और देस के बारे में सुन लेते थे। वहाँ रहते हुए धीरे-धीरे समाचार बाँचने का मुख्य दायित्व मुझ पर आ गया। समाचार विश्लेषण का भी काम करना पड़ता था। उन्हें सुनना और सुनाना दोनों ही अच्छा लगता था। कई बार तुलसी और कबीर ही नहीं निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि के काव्यसार का भी प्रसंगानुसार प्रयोग कर उसके प्रभाव को देख मन पुलकित होता था।

बुधराम इतना ही नाम मालूम था उसका। राजस्थान के पिलानी का रहनेवाला बुधराम बिड़ला जी के गाँव के होने के कारण अपने को कुछ खास ही मानता था। बोलता नहीं था मगर समाचार रोज ही सुनता था। गरमी जा रही थी और बरसात आ रही थी। बाहर में सोना अधिक कष्टकर हो गया था। लोग वर्षा से बचने के लिए आस-पास के अपने परिचितों के यहाँ विपत्ति में सिर छुपाने की जगह ठिकियाने के उपक्रम में लग गये थे। लेकिन मैं कहाँ जाता? ऐसे में एक दिन बुधराम ने कहा मेरे साथ रह सकते हो, लेकिन एक शर्त्त है कि मेरे घर में कुछ खाओगे नहीं। वैसे भी मैं होटल में ही खाया करता था, सो अंतत: राय बनी कि मैं बुधराम जी के साथ ही रहूँ। अंतत: मेरी धुनी बुधराम जी के यहाँ रम गई।

बुधराम जी के साथ वहाँ रहते हुए एक ऐसी घटना घटी जिसने मेरे मन पर गहरा असर डाला। उस दिन बहुत पानी पड़ा था। गली में जाँघ भर पानी जमा हुआ था। जब काम से वापस आया तो पूरी तरह भींग गया था। होटल के खाना से मुझे अरुचि हो गई थी। काम से लौटते समय बाजार से डेढ़ सौ ग्राम चिउरा और एक आम खरीद लिया करता था, उन दिनों रात का यही स्थाई भोजन हो गया था। भारी बरसात में उस दिन वह अवसर भी बह गया था। ठिकाने पर पहुँचकर पाया कि बुधराम बड़े दत्त-चित्त होकर शुद्ध घी में पराठे सेंक रहे हैं। बरसात की गंध में देशी घी के गंध के मिल जाने से वातावरण मह-मह हो उठा था। मेरी हालत देखकर बुधराम ने कुछ कहा नहीं; वह पूरी एकाग्रता से पराँठे सेंकता रहा। मैं भी खामोश था। बुधराम भी खामोश। अंत में बत्ती बुता कर बुधराम सोने की तैयारी करने लगा तो मैंने पूछा अरे बुधराम खाना नहीं खाना है क्या? बुधराम ने संक्षिप्त उत्तर दिया, नहीं। मेरे यह कहने पर कि जब खाना नहीं था बनाया ही क्यों? बुधराम ने जो उत्तर दिया वह मेरे जीवन में हासिल शिक्षा का सार है। उसने कहा कि अपने प्रण के कारण मुझे खिला तो नहीं सकता है, लेकिन मेरे साथ भूखा जरूर रह सकता है। बुधराम पढ़ा-लिखा आदमी नहीं था। लेकिन अपने प्रण और मन दोनों की रक्षा करना जानता था।

दुनिया बदल गई या मैं ही बदल गया! अब तो जीवन से मन और प्रण दोनों ही कुच कर गये! सब कुछ को जायज ठहरा दिये जाने का नतीजा यह हुआ और हो रहा है कि जीवन में प्रेरणा और प्रतिज्ञा दोनों के लिए निरंतर जगह कम होती चली गई है। काकेभ्यो दधि रक्षिताम के न्याय से ही कायदा-कानून और संविधान तक की व्याख्या की जा रही है। जब अर्थ को प्रयोजन से विलग कर मात्र शब्द में ही सीमित कर दिया जायेगा तब शब्द तो मरेंगे ही अर्थ भी मरेगा। फिर अर्थ के अभाव में सार्थकता ही कैसे बच सकती है? -वित्त निरर्थक जीवन क्या मानवीय होगा? सामाजिक जीवन से प्राप्त शिक्षा के सार और सामाजिक व्यवहार के विमर्श के लिए प्रभावी जगह अभी भी बची है, पूरी गंभीरता से सामाजिकता के तलघर में इसकी तलाश करनी चाहिए।

साधु-स्वभाव को सूप जैसा होना चाहिए, जो सार-सार को गहि रहे और थोथा को उड़ा दे। आज के समय में इस का बहुत बड़ा अर्थ बनता है और वह बड़ा अर्थ तर्क के आधार पर नहीं बल्कि ट्रिक के आधार पर बनता है। थोथा रखने की जगह कहाँ है। इस निस्सार संसार में भी इतने सार आज के साधुओं ने खोज निकाले हैं कि सार के लिए ही कोई जगह नहीं बन पा रही है। थोथा की कौन पूछे। हर किसी को सार चाहिए। बहुत सारे लोगों को मालूम भी नहीं है कि जो दाना खा कर वे जिंदा रहते हैं उसका उत्पादन किन थोथों के कारण और कैसे संभव होता है। किसानों का पसीना, धरती का वात्सल्य और आकाश का आशीष सिर्फ दाना में ही नहीं, थोथा में भी मुस्कुराता है। आज शिक्षा के सार को जो सामाजिक व्यवहार बन रहा है उसमें कीमती चुपके से मूल्यवान का पर्याय बनी और फिर धीरे से मूल्यवान बन गई। मूल्यवान होने से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया कीमती होना! बाजार की व्यायवसायिक बुद्धि कहती है कि धान से अधिक किमती चावल है क्योंकि उसमें सार ही सार है। खेत-खलिहान की  कृषक बुद्धि कहती है नहीं-नहीं धान अधिक मूल्यवान है क्योंकि उसमें सार के साथ-साथ थोथा भी है। सार और थोथा मिलकर ही सृजन की संभावना को बचाये रखते हैं। 

सृजन की संभावना के संकुचित होने से भोग का अवसर भी संकुचित हो जाता है। थोथाहीन सार का भविष्य सिर्फ भोग होता है, सृजन नहीं। भोग का कोई भविष्य नहीं होता। सृजन के बिना कोई भविष्य नहीं होता। भविष्य के बिना दुनिया नहीं चल सकती, इसलिए सिर्फ भोग से दुनिया नहीं चल सकती है। तात्पर्य यह कि सिर्फ सार से दुनिया नहीं चल सकती है। मनुष्य की बहुत बड़ी आबादी को थोथा बता कर मनुष्यता की चौहद्दी से बाहर खदेड़ने पर अड़े सार-संग्राही शक्ति संपन्न लोग सभ्यता के भविष्य को ही तो तिरस्कृत  कर रहे हैं! सिर्फ सफलता ही स्वीकार्यता का आधार नहीं बन सकती है। बाबा नागार्जुन इसलिए भी प्रणम्य हैं कि वे उनको भी प्रणाम करते हैं जो पूर्णकाम नहीं हो सके। कवि ने सार सार को गहि रहने और थोथा को उड़ा देने का साधु-सुझाव दिया था, इस साधु-सुझाव का आशय ऐसा तो नहीं था, जैसा हम समझ और बरत रहे हैं!


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