सभ्यता के गर्भाशय से जारी इस रिसाव के बारे में

सभ्यता के गर्भाशय से जारी इस रिसाव के बारे में

सत्य के साथ खड़े होने की कोशिश में ही तो हो जाता है,
वह सारा कुछ
जो नहीं होना चाहिए होता है किसी सभ्य समाज में,
किसी भी समय

विडंबना यह कि पूर्ण सत्य को हम झेल सकते नहीं और अर्धसत्य हमें नहीं झेल पाता है
अपने-अपने खंडित सत्य को अपनी-अपनी लहुलुहान मुटि्ठयों में भींचे 
हम कब समझ पाते हैं
रक्त जो बिना थरथराये चू रहा है निरंतर मुटि्ठयों के बीच से 
बूँद-बूँद ओस की तरह
सभ्यता के गर्भाशय से जारी इस रिसाव के बारे में दो टूक 
कहा नहीं जा सकता इस समय कुछ भी
कि वह निकलता है घायल हेथलियों से या कि
सत्य के खंडित हृदय से या
अज्ञातवास में पड़े सत्य के किसी और मर्म से

किसके पास नहीं था सत्य जो मरे या मारे गये थे दंगे में 
या जिन्होंने किया था शिकार हुड़दंगे में
सब की हथेलियों में ही तो था ऐसा सत्य
उनकी हथेलियों में भी जो निहायत ही शांतिप्रिय और चुप थे

किसी दूसरे के हाथों नहीं
अपनों के ही हाथों मारे जाते है हम निरपवाद
महाभारत हो या सुखिर्यों के पीछे चीख के मशान पर बेलछी हो, गोधरा हो,
मेरठ, भागलपुर, मुजफ्फरनगर या अपनी सिसकियों में खामोश अहमदाबाद

अभिमन्यु ही नहीं दुर्योधन भी तो मारा गया था
अपनों के ही हाथ

एक ही धर्म था
मार्यादाच्युत रावण और मार्यादा पुरुषोत्तम राम का
दोनों को ही इष्ट और अभीष्ट थे
आशुतोष, औढरदानी, प्रलयंकर, शिव, शंकर
जो अंतत: रह गये थे नकुल
सत्य की सीता को दोनों ने ही
अपने पलड़े पर तौलना चाहा था अपने बटखरे से
दोनों ने शक्ति से काम लिया था
कोई जीता था कोई हारा था जैसा कि 
होता ही है संग्राम में

अशोक वाटिका की छाया में जितना निरापद रहा
अंत तक शंकाओं की  संस्कृतियों के बीच भी
खंडित गर्भ-भार के साथ अंतत: कहाँ टिक पाया
शंकातीत होकर अनंनतर अयोध्या के भव्य राजप्रासाद में ही
किसी के भी हाथ कहाँ आया वह कवि-कल्पित-सा सुराज
था जिसका आश्वासन और इंतजार
सत्य चुराता रहा मुँह जंगलों में
जिसे कभी पार नहीं कर पाया कोई शासनाध्यक्ष

दुहराते हुए कवि की वाणी गये नेहरू कि
तय करनी अभी बहुत दूरी जंगलों के पार
जंगल पार करने के लिए तेजी से बढ़ते गये कदम
सिर्फ हरियाली पीछे छूटती गई
जंगल के क्रूर अट्टहास का आतंक फैलता गया
बेकाबू लपट के साथ

धँसती चली गई जंगल की जिरह हमारे भीतर इस कदर
कि जब भी कुछ कहने के लिए खोलो मुँह तो
हो जाती है पूरी-की-पूरी भाषा ही एक भयावह जंगल

युग बदला सत्य जंगलों से निकलकर चेनलों में फँसा
भटकता रहा चैनल-दर-चैनल जेट पर तो कभी नेट पर
होता रहा लहुलुहान जो पहले से ही था हलकान
लगाता रहा चक्कर चारों ओर अखंड मशान के निर्विकार

इधर कवि अपनी नतनियों से खेलने में लीन थे
उधर सृष्टि संहार से गुजर रही थी
कवि के पास भी कहने के लिए बचा था बहुत कुछ
जो अंतत: साबित करता था
उनके कवि होने को और यह कि
अन्न के बिना मरे कुछ लोग 
अखबार ने अब तक नहीं बताया
अच्छी कविता नहीं मिल पाने के कारण मरे कितने,
डूबे कितने, कितने हुए विकलांग

वे भी अपने सत्य से पराजित हुए जो मानते थे --
सत्य घायल होकर भी कराहता नहीं मंत्र छोड़ता है
समय का सबसे बड़ा सत्य कराहने ओर मंत्र छोड़ने को
साध लेता है एक साथ जनतंत्र के मैदान में

देखो-देखो वे रहे हैं, धीरे-धीरे
जिन्हें अपने होने पर ही गर्व है और
है अपने करने पर जरा-सी भी शर्म
देखो-देखो वे रहे हैं, हँसते हुए, चुनौती की चाल!
(06 अक्तूबर 2013 को शीर्षक में बदलाव के साथ इस कविता में बेलछी,मेरठ, भागलपुर, मुजफ्फरनगर जोड़ा गया है)
6. दिशाएँ विश्राम में हैं

सब दिशाएँ विश्राम में हैं --
जीवन जितना कठिन कभी नहीं जंगल थे,
पहाड़ थे जंगली जानवर थे, पथरीले दिल थे
अँधेरी रात थी, तो उजले दिन भी थे
बूढ़े थे, कमसिन थे जीवन के दिन थे
कठिन थे सूरज, तय समय पर उगता था विचार
लोग नमस्कार करते थे सूरज तय समय पर डूबता था

लोग नमस्कार करते थे
सूरज कभी किसी की निजी जिंदगी में
दखल नहीं देता था और चाँद भी
जीवन के ही प्रयोजन से दमकता था उपमा बनकर
आता था सूरज रंगों की छतरी खोलने तक बना रहता था
अँधेरा था जो डराता भी था
डर से बचाव के लिए ओट का भी काम करता था
दिशाएँ अनंत की ओर दौड़ती थी बाग में बच्ची बनकर
कहते हैं निराला बोलता था `झींगुर', जरा डटकर

दादी की कहानियों की सारी बच्चियाँ बूढ़ी हो गई हैं
दिशाएँ उनकी झुर्रियों में अनंत विश्राम में हैं
अभी भी रोज उगता है सूरज जैसे कि चटकते हैं फूल
बस जरा-सा सहमकर : बस जरा सहमकर
सो गई अमीनाचुपके से हामिदके कान में कहकर --
                    --  सो जा, कि दिशाएँ विश्राम में हैं

 7. गर्म हवा में लहराते परचम

बाजार में बहुत शोर है, ढोल का, नगाड़ों का और कहीं-कहीं विचारों का
पूजन का, वंदन का, आरती का, साज-सजावट का, प्राणहीन स्पंदन का
शोर की अपनी वेदना है, अपनी कहानी है
अपनी ही उदासी हैगति बहुत है
इन सबसे पार पाने की बेइंतहा ख्वाहिशें हैं, शोर में
यह शोर काटता भी है, परेशान भी करता है और 
बुलाता भी है बड़े प्यार से
जो शोर में शामिल नहीं हैं
जिनमें शोर शामिल नहीं है
उन्हें भी शोर सालता है

बहुत शोर था बाजार में
अधिक बिकता था शोर जिसके पास जितना भी था
शोर पर चढ़कर आई चीजों में गाजी दमक थी
जैसे शेर पर चढ़कर आई हों
शोर और शेर में मात्रा का अंतर था
मात्रा अधिक थी शोर में

पूरी जतन से बनाया था बनानेवाले ने लेकिन
कुछ ऐसी भी थी मूर्त्तियाँ, जो बिकी नहीं
किसी भी कीमत पर अंतत:

हालाँकि खरीददार ने 
अपनी आँख पर तौला उन्हें भी पूरे मनोयोग से था,
दमकी थीं वे भी खरीददार की आँखों में बार-बार,
मोल-तोल भी किये थे, गिरी-चढ़ी बार-बार कीमतें
कई बार लगा अब बिकीं कि तब बिकीं,
हर बार बीच में ही बात टूट गई
एक ठहाके के साथ खरीददार मुड़ गये 
किसी अनचाही दिशा में
और इस तरह नहीं बिक सकीं कुछ मूर्त्तियाँ
अंतत: किसी भी कीमत पर
दोष नहीं था, बेचनेवाले में, खरीदनेवाले में,
मूर्त्तियों में तो कतई नहीं
जो बिक नहीं सकी थीं
वे पूजन की परिधि से बाहर ही थीं
मूर्त्तिकार अपनी अँगुलियों को देखते थे बार-बार,
उनमें लिपटी थी करुणा
मन उदास था शोर नहीं होने के कारण,
शोर के होने के कारण, कुछ भी पता नहीं

पूजा-पांडालों के सामने से गुजरते हुए
अक्सर दिखीं वे मूर्त्तियाँ जो बिक नहीं सकी थीं
गहरे हरे रंग के प्लास्टिक में 
अधढँकी-अधखुली आभाहीन,
मेरी तरह उदास, गमगीन
इस तरह से देखे जाने पर या किसी और ही कारण से
पर हिलीं थीं वे मूर्त्तियाँ वामावर्त पर  
इसी उदासी में चल पड़ीं कुछ मूर्त्तियाँ
शोर को चीरकर जुलूस में बदलते हुए

आस-पास के लोग
इस बनती हुई जुलूस के अस्तित्व से बेखबर
हाथ में फूल लिये
मूर्त्तियों की तलाश में चंचल हो रहे थे
उन्हें इस बात का कोई इल्म ही नहीं कि
कब भीड़ जुलूस में बदल जाती है

हवा बहुत गर्म है खेत में, खलिहान में, फुटपाथ पर
फिर भी जो बिकते नहीं उनका विसर्जन भी संभव नहीं होता
किसी संग्राम में इस तरह आदमी के विर्सजन के खिलाफ
वे एक अंतहीन जुलूस में अक्सर पाये जाते हैं आज भी
बेखौफ ... बेखौफ ... बेखौफ होरी के काँधे धरे गमछे की तरह
गर्म हवा में लहराते परचम की तरह ... परचम की तरह

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10 टिप्‍पणियां:

mahesh mishra ने कहा…

"बाघ घास नहीं खाते लेकिन उन्हें घास की चिंता करनी होगी"

"विडंबना यह कि पूर्ण सत्य को हम झेल सकते नहीं और अर्धसत्य हमें नहीं झेल पाता है"

"फिर भी जो बिकते नहीं उनका विसर्जन भी संभव नहीं होता"

बहुत अर्थवान कवितायेँ. अप्रतिम और शानदार. पलासी कविता में पलासी किस रूपक के लिए व्यंजित है, कृपया समझाइये.

प्रफुल्ल कोलख्यान ने कहा…

आदरणीय महेश जी, आभार ... पलासी में प्रतिरोध हुआ होता ... तो घास रौंदे गये होते.. लहरा नहीं रहे होते ... बाघ की घास चिंता से भी जोड़कर देखने की कृपा करें ...
तात्पर्य यह नहीं कि दोनों कविताओं को जोड़कर पढ़ें बल्कि यह कि अपनी, स्मृति, मेधा, संस्कृति, बोध, इतिहास, राजनीति, प्रज्ञा और भाषा की आत्म-संयुक्ति के आस-पास कविताओं को ले जाकर पढ़ना चाहिए। एक बात और हिंदी शब्दानुशासन में "घास" स्त्रीलिंग है... इस कविता में घास पुलिंग रूप में व्यवहृत है ... यहाँ हिंदी शब्दानुशासन का अतिक्रमण है ... यह अतिक्रमण क्यों है.... इस पर भी सोचने की जरूरत है...

mahesh mishra ने कहा…

'जरूरी है देश' कविता बहुत अच्छी है. यह कविता संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन दोनों को एक साथ सहेज कर चल रही है...कितना अच्छा है आपका पर्यवेक्षण और कितनी वृहद दृष्टि...प्रकृति और मनुष्य में साहचर्य, सहजीवन...मर्यादा और एकत्व...कबीर की लुकाठी...

mahesh mishra ने कहा…

'बाघ का घास खाना व्यंजना है.'

प्रफुल्ल कोलख्यान ने कहा…

आप भी सोचिये... कि सोचना जरूरी है...
घास स्त्री लिंग है हिंदी शब्दानुशान में। इतिहासानुशासन में इस तरह से पराभव का यह स्वीकार पुरुष व्यवहार है। शब्दानुशान और इतिहासानुशासन में से किसी एक के अतिक्रमण की मजबूरी सामने होने की इस स्थिति में कविता ने शब्दानुशान के अतिक्रमण का अपराध करते हुए इतिहासानुशासन को बचाने का प्रयास किया हो, क्या पता!
पलासी में प्रतिरोध हुआ होता तो हमारे जैसे कायरों, अर्थात, घास की इतनी वृद्धि नहीं हुई होती, जिनकी कायरता का ‘लाभ’ उठाते हुए शुभ को क्षतिग्रस्त करनेवाले यह सत्ता-लोभी-वर्ग अर्थात, राजनीतिक नेतृत्व का बड़ा समूह, वजूद में नहीं होता जिनकी जमीर को खा-पचाकर पलते हैं बाघ अर्थात, पूँजी के बल पर दुनिया दखल करने के अभियान पर लगा पूँजी से जुड़ा बड़ा वर्ग। बाघ सीधे घास नहीं खाते - पूँजी से जुड़ा यह बड़ा वर्ग सीधे अपना उल्लू सीधा नहीं करता है, बल्कि इसके लिए वह हमारे प्रतिनिधियों और राजनीतिक व्यवस्था, अर्थात लोकतंत्र को साधता है। बाघ लेकिन लोकतंत्र से ही मरता है। इसीलिए स्थिति की नजाकत को भाँपते हुए बाघ महाराज ने कहा, असल, मुसीबत की जड़ यह लोकतंत्र है, बाघ इसी लोकतंत्र से मरते हैं। इसलिए बाघ, अर्थात, पूँजी के बल पर दुनिया दखल करने के अभियान पर लगा पूँजी से जुड़ा बड़ा वर्ग, लोकतंत्र को ‘सम्हालने’ पर लगा हुआ है...
रधुवीर सहाय की कविता को उम्मीद थी कि न टूटे सत्ता का तिलस्म, अंदर का कायर तो टूटेगा... वह कायर तो और मजबूत ही हुआ है.. इस नीच ट्रेजडी को समझते हुए मुक्तिबोध की कविता इस मनोभाव के आस-पास पहुँच जाती है कि पूँजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता. ... यह समाज चल नहीं सकता... मगर यह समाज चल रहा है हमारे जैसे कायरों के बल पर जिनके काँधे पर नागार्जुन की कविता बताती है कि लदी हुई पालकी लाला (ला.. ला) अशर्फी लाल की.. दर्द हो या हिंदी की कविताएँ और भी हैं ...
क्या कहते हैं भाई महेश.. जब डूबता है देश तो ...
बाघ का घास खाना व्यंजना नहीं है। हिंदी शब्द-शक्ति में व्यंजना का अभिधार्थ (अभिधेयार्थ) खंडित नहीं होता है। शब्द-शक्ति के संदर्भ से यह लक्षणा है और लोक-व्यवहार के संदर्भ से मुहावरा। आप जानते हैं मुहावरा वह शब्द-युग्म या वाक्य खंड होता है जिसका अर्थ उस शब्द-युग्म या वाक्य खंड से बाहर (Beyond) जाकर स्थिर होता है और भिन्न अर्थ में व्यंजना होने को सिद्ध कर लेता है या कभी-कभी व्यंजना होने का आभास गढ़ लेता है।

खैर आप इतने ध्यान से पढ़ते हैं मेरे लिए यह आह्लादकारी है, सहारा भी। शुक्रिया। स्नेह बनाये रखें।

प्रफुल्ल कोलख्यान ने कहा…

आभार और शुक्रिया...

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