गुरुवार, 3 नवंबर 2016

देखो न मेरी जान

देखो न मेरी जान
मोह मुझे किस तरह हलकान कर रहा है
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ना जाने क्यों उन जगहों पर भटकता रहता है मन

जहाँ भी तुम्हारे होने की होती है संभावना, सघन
ये ख्याल बहुत परेशान करता रहा है कि बची होगी अभी भी वहाँ किसी-न-किसी रूप में
तुम्हारे होने की संभावना या कम-से-कम परछाई
कभी-कभी तो मैं अचंभे में पर जाता हूँ
अपनी काया में इतनी बड़ी तो न थी तुम
फिर इतनी बड़ी कैसे है तुम्हारी माया
माया तो माया उससे भी बड़ी छाया

समझदार कहते हैं कि वहाँ कुछ नहीं है
कुछ है तो बस गहन है अंधकार
तुम्हें लील जायेगा अंधकार
निकलो भागो वहाँ से,
जान बचाओ,
तुम पागल हो चुके हो

उनका कहना है जो
विरुद्ध नहीं विपरीत हैं

छाया की संभावनाओं की
तलाश में जो भी गया
वापस नहीं आया आज तक

वे कविता में विज्ञान खोजते हैं, विज्ञान के सत्य
मैं विज्ञान में कविता की संभावनाओं को टटोलता हूँ

उन्हें मालूम है क्रिया और प्रतिक्रिया का वैश्विक विज्ञान

वे संगठित हैं, शक्तिशाली हैं
शक्तिशाली हैं, इसलिए सत्य हैं और सुंदर भी
उनका सौंदर्य सब को मोह रहा है

यह मोह खतरनाक है
शक्तिशाली हैं उन्होंने तुम्हें छाया में
छाया को माया में, माया को मोह में बदल दिया है

ठठा रहे हैं जितनी शक्ति से
उतनी ही तेजी से मैं समा रहा

तुम में नहीं,
छाया में, माया में, मोह में
कैसे बचा जा सकता है
इस समय, कैसे
मोह से द्रोह! यह भयानक होगा

भयानक कि यह द्रोह
गार्हस्थिक मोह,
माया और छाया को
अगर पार कर सका तो
तुम तक जरूर पहुँच जायेगा   

भयानक कि तुम आखिरी संभावना हो
संभावना को खोने से बचने की युक्ति पर

देखो न मेरी जान
मोह मुझे किस तरह
हलकान कर रहा है
जैसे कि तुम डेमोक्रेसी हो
और मैं संविधान

 

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