मानता हूँ

जी मालिक मानता हूँ
क्यों नहीं मानूंगा
कैसे नहीं मानूंगा हुजूर

मानता हूं कि
कदम से तेज जुबान चलती है
चलती ही है मालिक

लेकिन इतनी तेज
इतनी तेज कि
जीभ लटककर
पाँव को ही गछार ले

ये क्या मालिक!
मानता हूँ, जी दिल से
मानता हूँ
हुजूर आपकी
कच्छमच्छी को भी जानता हूँ
दुआ करता हूँ
बादशाहत सलमात रहे
इकबाल बुलंद रहे
हुजूर का हाथी चलता रहे
आवाम का हाथ बंधा रहे

मानता हूँ, कैसे नहीं मानूंगा
एक और बात पते की
बात सुकून की पुर-अम्न की
ख्वाब में भी आवाम के अब
ख्वाहिश-ए-जम्हूरीयत नहीं रही

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