गुरुवार, 26 जनवरी 2017

मानता हूँ

जी मालिक मानता हूँ
क्यों नहीं मानूंगा
कैसे नहीं मानूंगा हुजूर

मानता हूं कि
कदम से तेज जुबान चलती है
चलती ही है मालिक

लेकिन इतनी तेज
इतनी तेज कि
जीभ लटककर
पाँव को ही गछार ले

ये क्या मालिक!
मानता हूँ, जी दिल से
मानता हूँ
हुजूर आपकी
कच्छमच्छी को भी जानता हूँ
दुआ करता हूँ
बादशाहत सलमात रहे
इकबाल बुलंद रहे
हुजूर का हाथी चलता रहे
आवाम का हाथ बंधा रहे

मानता हूँ, कैसे नहीं मानूंगा
एक और बात पते की
बात सुकून की पुर-अम्न की
ख्वाब में भी आवाम के अब
ख्वाहिश-ए-जम्हूरीयत नहीं रही

एक टिप्पणी भेजें