पछतावा 2

#पछतावाकोलख्यान
आछे दिन पाछे गये, हरि सो किया ना हेत।
अब पछितावा क्या करै, चिड़िया चुगि गयी खेत।।
(साभार : कबीरदास)
हरि से हेत न करने के मामले पर फिर कभी। अभी चिड़िया के खेत चुगने पर। चिड़िया खेत कब चुगती है! चिड़िया के खेत चुगने का पता कब चलता है!
किसान बीज बोता है। बीज बोकर किसान निश्चिंत हो जाता है, रखवारी नहीं करता है। इस अवसर का लाभ उठाकर चिड़िया बीज चुग लेती है। किसान बीज के पौधा बनने और फलप्रसू होने का इंतजार करता है। चुग लिये गये बीज पौधे में विकसित नहीं होता है, फलप्रसू होने की तो बात ही क्या! फल नहीं मिलता है। पछतावा बचता है। हरि का खेत हरि की चिड़िया। किसान हरि से हेत कर बोये गये सारे बीज को बचा ले जाए भला यह कैसे संभव है।
बोये गये कुछ बीज को चिड़िया चुगेगी ही। अछताने-पछताने के बाद संतोष की बारी आती है। मलूकदास तो कह गये हैं अजगर चाकरी नहीं करता, चिड़िया पंछी भी काम नहीं करती है लेकिन राम तो सब के दाता हैं। इसलिए संतोष धन। तुलसीदास तो कह गये हैं  —
गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।
जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान ॥
जब सब धन धूरि समान हो जाए तो फिर कहाँ पछतावा! संतोष धन यों ही हाथ नहीं आता है। पछतावा की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए पछतावा जरूरी है!

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