शनिवार, 23 अगस्त 2014

एक मुल्क, कंधों पर जिसे ढोता हूँ

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

मैं सिरहाने से, लिपटकर रोता हूँ
अपने पैर, अपने आँसू से धोता हूँ

अपने जागरण में, बेहिस सोता हूँ
तेरे साथ पाता, सपनों में खोता हूँ

चैत पूनो रात, दिन का अजोता हूँ
शामिल हूँ, हाँ सच पर अनोता हूँ

एक मुल्क, कंधों पर जिसे ढोता हूँ
रे सम किधर, बस महज झौता हूँ

अपने पैर, अपने आँसू से धोता हूँ
एक मुल्क, कंधों पर जिसे ढोता हूँ

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