शनिवार, 16 अगस्त 2014

जैसा हूँ, वैसा दिख नहीं सकता

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

मैं दुखी हूँ पर वैसा दिख नहीं सकता क्योंकि
आधा पेट खाकर सोया बच्चा अपनी हँसी खो देगा


मैं अकेला हूँ पर पर वैसा दिख नहीं सकता क्योंकि
इससे आप सभी और आप जैसे भी असहमत हो जायेंगे


मैं उदास हूँ पर वैसा दिख नहीं सकता क्योंकि
यह मेरी जिंदगी, हाँ जिंदगी समझते हैं न, की तौहीन होगी


मैं आजाद हूँ पर वैसा दिख नहीं सकता क्योंकि
मेरे तमाम तरह के आका एक साथ मुझ पर टूट पड़ेंगे


मैं शरीफ हूँ, पर वैसा दिख नहीं सकता क्योंकि
मुझे लगता है, मैं इस तरह से जरूर ही लुट जाऊँगा

औरों की नहीं जानता पर मैं जैसा हूँ, वैसा दिख नहीं सकता क्योंकि
हमारे सभ्य समाज में उससे असुविधा होती है, भ्रम होता है


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Praphull Jha, Vinita Parate, Martin John और 40 अन्य को यह पसंद है.


Ashok Jha Sach kahe na sir to kya aap kehte haina wo mai bayan nahi kar sakta lekin lazawab.
16 अगस्त पर 10:37 अपराह्न · नापसंद · 1


Radheyshyam Singh हाँ प्रामाणिक और भोगी जाती अवस्था का चित्रण है।बधाई एक अच्छी कविता के लिए।
16 अगस्त पर 10:45 अपराह्न · नापसंद · 2


Kunika Banderwal Bht hi achi line likhi h sir bht hi achi trha se smaj or bharat ki vyavstha ka varnan kiya h bht khub
16 अगस्त पर 11:02 अपराह्न · नापसंद · 2


Pushpendra Singh bhut hi umda pktiyan..... duhre chritra walon pr.... jo ki aj k smy pe hr vykit ka h

16 अगस्त पर 11:14 अपराह्न · संपादित · नापसंद · 1


Rajeev Ranjan Mishra behtareen….lajawaab achhi srimaan!!
17 अगस्त पर 01:06 पूर्वाह्न · नापसंद · 1


Javed Usmani लाजवाब
17 अगस्त पर 10:55 पूर्वाह्न · नापसंद · 1


Chaturved Arvind BAHUT ACHCHHI KAVITA HAI, PRAFULL JI.
17 अगस्त पर 03:07 अपराह्न · नापसंद · 1
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