शनिवार, 30 अगस्त 2014

चेहरे के अलावे सब कुछ बेनकाब

प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan

यहाँ तक की तुम से भी कोई शिकायत नहीं
चलन ही कुछ ऐसा है,
जो कह रहा हूँ वह वक्त की बात है
और वक्त की भी क्या है, अपनी ही शिकायत है
शिकायत अपनी, इसलिए सहम-सहम कर कह रहा हूँ
अब चेहरा कोई दिखता नहीं
बस नकाब ही नकाब दिखता है
हद यह कि नकाब भी नकाब पहनकर ही निकलता है
जो चल रहा है, वह नकाब से नकाब का संवाद है
कहीं धनबाद है तो कहीं इलाहाबाद है
कहीं समाजवाद, कहीं संप्रदायवाद और कहीं जनवाद है
असल में जो चल रहा है, वह नकाब से नकाब का संवाद है

आनेवाले दिनों में
हमारे दौर को इस तरह याद किया जायेगा कि
यह एक ऐसा दौर गुजरा है जब
चेहरे के अलावे सब कुछ बेनकाब था

किसी नकाब को बुरा लगे तो शर्मसार मेरा नकाब ही होगा
और नकाब के शर्मसार होने का बेहतर अर्थ नकाब को मालूम होगा।

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