मंगलवार, 29 सितंबर 2015

समझदारी का गीत

समझदारी और ना-समझी
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जाल में तो हम सभी हैं। फिलहाल, जिनके हाथ में जाल की डोर है और जो समझते हैं कि वे जालदार हैं जाल में नहीं, वे भी धोखे में ही हैं। गुड़ खाये गुलगुले से परहेज! ‘समझदार लोग’ जिन्हें ‘कुछ करना’ होता है वैसे ही फेसबुक, ह्वाट्सअप, नेट मोबाइल आदि से दूर ही रहते हैं। रहते हैं कि नहीं! रहते हैं कि नहीं! ! रहते हैं।  तो, जाल में तो जालदार समेत हम सभी हैं, फिलहाल।
आज कंप्यूटर मेरे सार्वजनिक और वैयक्तिक व्यवहार और आचरण का अनिवार्य उपादान बन चुका है। लेकिन जब, तब के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी कंप्यूटर प्रसार के लिए सक्रिय थे, तब के समझदार लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। अपनी ‘छोटी-सी हैसियत और बडी-सी समझदारी’ के साथ मैं भी उस विरोध से सहमत और और उस विरोध में शामिल था; इसके लिए मैं लगातार शर्मिंदा रहा हूँ, कम-से-कम अपनी नजर में। इसलिए, ‘डीजिटल इंडिया’ के बारे में किसी पूर्वग्रह प्रेरित राय, खासकर नकारात्मक राय से बचना चाहता हूँ। अब जो कहना चाहता हूँ उसके लिए हंगरेजी (अंगरेजी!) का प्रयोग जरूरी है :
Till active and effective resistance is not possible then strategic persistence is unique tool to use until then capacity and mechanism to enforce active and effective resistance is not readily available at hand for full utilization, say exploitation.
समझदारों का गीत, अंगरेजी में ही उतरता है। अंगरेजी में गाना आसान नहीं सो हंगरेजी में कोशिश की। यह अपराध तो नहीं!

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