बहुत हुई ‘मन की बात’, अब नफरत के बाजार में खुलेंगी ‘मुहब्बत की दुकान’

बहुत हुई ‘मन की बात’, अब नफरत के बाजार में खुलेंगी ‘मुहब्बत की दुकान’

भारत जोड़ो न्याय यात्रा की योजना बड़े लक्ष्य को सामने रखकर बनाई गई है। इस लक्ष्य को हासिल करने में यह कितनी कामयाब होती है, वह कई बातों पर निर्भर करती है। लक्ष्य की व्यापकता और ऐतिहासिकता को ध्यान में रखने पर आज की चतुर्दिक परिस्थिति में भारत जोड़ो न्याय यात्रा के लिए लक्ष्य को हासिल कर पाना बहुत मुश्किल काम लगता है।

राहुल गांधी ने इस कठिन को करने का बीड़ा उठाया है। वे कांग्रेस पार्टी के सांसद हैं। इसके पीछे कांग्रेस पार्टी का निर्देश तो है ही, बड़ी बात यह है कि राहुल गांधी की अपनी भी इच्छा थी। कांग्रेस में एक समय ‘दूर दृष्टि, पक्का इरादा, कड़ी मेहनत’ की बात की जाती थी, कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के लिए, वे खुद कितने प्रेरित होते थे, कहना मुश्किल है।

अपने बचपन के किसी-न-किसी अवसर पर किसी-न-किसी के मुंह से राहुल गांधी ने इसे सुना जरूर होगा। वे इन शब्दों को आज दुहराते नहीं हैं। वे इन शब्द-युग्मों को जी रहे हैं। उनकी बातों में, उनकी आंख में, हर कदम में झलकता है, ‘दूर दृष्टि, पक्का इरादा, कड़ी मेहनत’ का संकल्प। सत्तालोलुप लोगों में इस तरह की झलक आ ही नहीं सकती है।

2024 के आम चुनाव में इसके नफा-नुकसान का हिसाब सत्ताकांक्षी लोग लगायें, उनको शोभा देता है। देश की लोकतांत्रिक और राजनीतिक दुर्दशा से उत्पीड़ित लोगों के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही भारत जोड़ो न्याय यात्रा जरूर आशा की अरगनी है।

भय-भूख-भ्रष्टाचार, रोजी-रोटी कमाने के अवसर न मिलने की व्यग्रता का बोझ आम नागरिकों में से अधिकाधिक लोगों की जान पर भारी है। सूखे पत्तों की तरह रोजी-रोटी के लिए दर-बदर भटकते, देश-विदेश की ओर उमड़ते लोगों के दर्द की कोई सुनवाई नहीं। रोजी-रोजगार की मरीचिका में फंसे लोग ठगों के भी हत्थे चढ़ जाते हैं और हंसी ठट्ठा के पात्र बन जाते हैं।

पुलिस को शिकायत करने पर या मामलों के तूल पकड़ लेने पर अधिक-से-अधिक मीडिया के सहारे आश्वासन और सरकारी पोस्टर की तरफ ध्यान खींचकर राज्य की भूमिका की इतिश्री हो जाती है। ऐसे में धर्म ध्वजा थामे धूल उड़ाते जत्थे पहले से ज्यादा उदास कर जाते हैं। 

किसी समाज, जमात या राजनीतिक दलों के बारे में कोई भी धारणा उन में सक्रिय और प्रभावी और  बेहतर लोगों को देखकर बनानी चाहिए। उनके बारे में ऐसे लोगों की बातों या आचार-आचरण को ध्यान में रखकर उनके बारे में किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं हो सकता है। अच्छे-बुरे लोग हर जगह होते हैं।

हमारे समय की विडंबना है कि बुरे लोग किसी भी जमात में हों वे बड़ी जल्दी एक दूसरे के करीब आ जाते हैं, आ ही नहीं जाते बल्कि बहुत सहजता से एक-दूसरे के काम भी आते हैं। कभी मुखर या प्रत्यक्ष रूप से तो कभी मौन या अप्रत्यक्ष रूप से।

अच्छे लोग कभी साथ नहीं आते, साथ आते हैं तो अच्छे नहीं बुरे काम के लिए साथ आते हैं- सार्वजनिक सक्रियता से अर्जित शक्ति का इस्तेमाल अपने या अपनों के स्वार्थ को हासिल करने में सार्वजनिक हितों की उपेक्षा से अधिक बुरा काम और क्या हो सकता है! भाई-भतीजावाद से भरे इस चारण काल में आचरण की बात करना बहुत कष्टप्रद है, मगर जरूरी भी है।

विडंबना यह है कि हमारे देश में बुरे लोगों का ‘एक दलीय लोकतंत्र’ काम कर रहा है- बाहर से अलग-अलग दिखने पर भी सभी दलों के बुरे लोगों के प्रच्छन्न दल का लोकतंत्र। कभी-कभी यह प्रच्छ्न्नता समाप्त हो जाती है, जिसे हम दल-बदल के रूप में जानते हैं। यह दल-बदल सार्वजनिक हित को किसी क्षति से बचाने के लिए शायद ही होता है।

रिकॉर्ड बताता है कि बुरे लोगों की संख्या किसी दल में कम नहीं है। सवाल उठने पर बहुत ही निर्लज्ज तरीके से कह दिया जाता है कि आम नागरिकों में बुरे लोग उससे भी कहीं ज्यादा हैं या यह कि लोग जैसे होते हैं, वैसे ही लोगों को चुनते हैं! क्या इस में कोई सचाई नहीं है! सचाई है। लेकिन फर्क है, ताकत के स्रोत का फर्क है।

सार्वजनिक हितों की बात करते हुए दल शक्ति अर्जित करके संगठित रूप से सार्वजनिक हित के विरुद्ध अपने या अपनों के स्वार्थ साधने और किसी एक व्यक्ति का अपने या अपनों का हित साधने में जो फर्क होता है, वह फर्क है। देखा जाये तो इसके लिए भी वह संगठित शक्ति ही जिम्मेदार है जो असंगठित लोगों को किसी दुराचार से रोकने में किसी भी तरह से विफल रहती है।

असल में संगठित शक्ति असंगठित लोगों को अपराधी बनने की फिसलन भरी राह पर धकेल देती है और खुद अपराध, बड़े-बड़े अपराध करने की सामाजिक वैधता हासिल करती रहती है। यह कहना और मानना झूठ या गलत हो तो इससे अधिक संतोष की बात और क्या हो सकती है! लेकिन सच हो, तो! हम किस मुंह से न्याय, नैतिकता, लोकतंत्र की बात करते हैं।

हताशा में चुल्लू भर पानी की तलाश में लग जाने में कोई समझदारी नहीं है। समझदारी है यह मानने में कि पूर्ण न्याय-निष्ठ व्यवस्था के आदर्शित सपनों से बाहर निकलकर व्यावहारिक ढंग से सोचते हुए बेहतरी की उम्मीद करनी चाहिए।

भारत अपने ज्ञात समय के प्रारंभ में प्रकृति पूजक था। उसके लिए रहस्य बहुत कुछ था। आकाश में सूरज, चांद, सितारों की उपस्थिति और अनुपस्थिति, उड़ते, पंछी जल में तैरते मछली जिनके अदृश्य होने के पथ का कोई निशान वह ढूंढ नहीं पाता था। इस तरह समय-समय पर दृश्य-अदृश्य का खेल उसके लिए बहुत निराला और अचंभा में डालनेवाला होता था।

ऋषि-मुनि दृश्यमान ईश्वर के सान्निध्य में अदृश्य के दर्शन की साधना में लगे रहते थे। दर्शन और फिलॉसफी शब्द के अर्थ और आशय का प्रारंभिक अंतर ध्यान देने से बात साफ-साफ समझ में आ सकती है, जिस पर फिर कभी। उसके लिए नित-नित नूतन होती, अपना श्रृंगार करती, रौद्र रूप धारण करती हुई दृश्यमान प्रकृति स्वयं अदृश्य ईश्वर का स्वरूप थी। कण-कण में ईश्वर के होने के भाव-बोध पर यकीन हुआ।

कई ऐसे काम होते हैं जिन्हें पवित्र नहीं माना जाता है, उसके लिए भी तो जगह चाहिए! ऋग्वेद में मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं है, ऐसा बताया गया है। अदृश्य के दर्शन न कर पाने की बेचैनी के कारण वह मूर्तिपूजक बन बैठा। इससे मूर्ति कला सहित संगीत, काव्य कला के विभिन्न स्वरूप उद्घाटित हुए।

केरल के एझावा और नारायण गुरु (1854-1928) को याद करना चाहिए। मूर्ति की जगह दर्पण लगाया गया, संकेत यह कि मंदिर में लोग अपने ही वाह्य रूप को देखकर उसके अंदर विराजमान अदृश्य का दर्शन करने के महत्त्व को समझें और प्रेरित हों। याद रखना चाहिए कि योगी भी ईश्वर को मूर्तियों में नहीं स्वयं में देखने की साधना करते हैं, देखते हैं।

गहराई से देखने पर पता चल जायेगा कि पूजा मूर्ति की नहीं, पूजा उस अदृश्य की होती है, जिसका आह्वान मूर्ति में किया जाता है और जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा होती है। सामान्य जन या लोक के लिए मूर्ति पूजन के विधि-विधान की उपयुक्त लौकिक पद्धतियों के लिए शास्त्र रचे गये। इस लौकिक पद्धति के साथ-साथ और समानांतर ऋषि-मुनि अदृश्य के दर्शन की साधना का भी विधि-विधान सामने आया।

दोनों विधि-विधान एक दूसरे के रास्ते में व्यवधान नहीं बनते थे। इस तरह ईश्वर तक पहुंचने के लिए मनुष्य अनेक रास्ते पर चलने लगा। वेद को अपौरुषेय या ईश्वरीय रचना माना गया और पूजन-पद्धतियों को मनुष्य की रचना। लोक और वेद में द्वंद्व या विमत की स्थिति में शास्त्र ने सम्मति दी- वेद-समर्थित और लोक-प्रचलित में द्वंद्व होने पर लोक-प्रचलन ही मान्य है।

भक्ति काल के संतों ने कई बार लोक-वेद का संदर्भ जिया है। तुलसीदास- “जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।। मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।। सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।” और यह भी कि “लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।”

कबीर साहब- “लोका मति के भोरा रे। जो कासी तन तजै कबीरा, तौ रांमहि कहा निहोरा रे॥” और यह भी कि “पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥”

आदि शंकराचार्य के मुताबिक सर्वव्यापी आत्मा जीवात्मा अभिन्न है, रामानुज के अनुसार जीवात्मा से भिन्न है और भिन्न भी है। ये बड़े लोग हैं। इन में मत भिन्नता का सम्मान करते हुए भी, हमारे लिए संविधान के निर्देशों के अंतर्गत सर्वमान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था ही अधिक काम की है। धर्म को व्यक्तिगत मामला मान भी लिया जाये तो भी धर्म के नाम पर होनेवाले आयोजनों को व्यक्तिगत मामला मानना मुश्किल है। 

अपने बच्चे को स्नेह करना व्यक्तिगत मामला हो सकता है, लेकिन उसके प्रति क्रूर व्यवहार व्यक्तिगत मामला नहीं हो सकता है। खैर, धर्म और भक्ति पर बहुत सारी बातें की जा सकती हैं, फुरसत में करनी भी चाहिए। संक्षेप में यह कि लोक हित के हर काम के मूल में भक्ति होती है। भक्ति के दो पहलू हैं- प्रेम और ज्ञान।

प्रेम, ज्ञान को और ज्ञान, प्रेम को स्वार्थ में अंधा होने और एक दूसरे की दुष्टताओं से भी बचाता है। इसलिए भक्ति सभी तरह की भावनाओं को पवित्र नहीं मानती है। उद्दंडता का निषेध और न्याय-निष्ठ विनम्र व्यवहार लोक में भक्ति के अनन्य लक्षण हैं और लोकतंत्र उसी का अन-अन्यतम उपाय।

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ की मूल प्रेरणा ‘नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान’ की बात से जोड़कर देखना चाहिए। नफरत का बाजार कैसे बनता है! नफरत का बाजार बनता है अधिकतर लोग खुद को स्वार्थ की घेरेबंदी में कैद कर, अन्यों के लिए नफरत फैलाने लग जाते हैं।

मुहब्बत की दुकान कैसे खुलती है! मुहब्बत की दुकान खुलती है जब निर्भय चित्त होकर उन में से कुछ लोग स्वार्थ की घेरेबंदी से बाहर निकलकर मुहब्बत के महान उद्देश्यों की तरफ बढ़ते हैं। स्वार्थ और मुहब्बत एक साथ नहीं सध सकता है। स्वार्थ में अंधा होना, एक दूसरे की दुष्टताओं को बढ़ाते रहना, न्याय विमुख उद्दंड व्यवहार लोकतंत्र का निषेध और लोकतंत्र की आत्मा उत्पीड़न है।

लोकतांत्रिक मूल्य को बचाना हो तो ‘नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान’ की तरफ आम नागरिकों, नागरिक जमातों को कान धरना ही होगा। वर्तमान की अकुलाहट और उत्पीड़कताओं के बीच ‘नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान’ चाहे भविष्य दूत राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खोले, इंडिया (I.N.D.I.A – इंडियन नेशनल डेवलेपमेंटल इनक्लुसिव अलायंस) खोले।

कम-से-कम पिछले दस साल में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की दिलचस्पी इस में कभी दिखी नहीं, बल्कि इसकी विपरीत दिशा में ही चलती रही है।

2024 में मौका मिला तो क्या पता, वे ही ‘नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान’ खोल लें। लोकतांत्रिक मूल्यों इतनी भयानक गिरावट के बाद उम्मीद तो नहीं है कि अपनी दिशा सुधारने में उनकी कोई दिलचस्पी हो सकती है। वैसे भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का व्यवहार में तो जन प्रतिनिधि होने का नहीं, जन प्रतिनिधि की ताकत लेकर अतीत के प्रतिनिधि बनने की व्याकुल चेष्टा रही है, वे भला क्यों वर्तमान की अकुलाहट के बीच भविष्य के दूत की आहट क्यों सुनेंगे।

जो हो भारत जोड़ो न्याय यात्रा की पग आहट धीरे-धीरे निकट, अति निकट से आने लगी है। बहुत हुई मन की बात, मनमानी की बात! अपने मन की बात, रोजी-रोटी की बात, आत्म-सम्मान की बात, भक्ति के लोकराग में निहित लोकतंत्र की बात को ध्यान से सुनने का अवसर तो अब आया है। सुन पायेंगे लोग या वैसे ही नहीं सुन पायेंगे, जैसे नहीं सुन पाये देश के सत्ताधीश मणिपुर की चीख पुकार।

संसद के कान में वह चीख पुकार न पड़े इसके लिए किया गया सारा इंतजाम। अपने ही कान तक नहीं पहुंच पाये अपनी ही चीख सा है इंतजाम। आंख-कान को भरमाने के चाहे जैसे हों इंतजाम अंतरात्मा को भरमाना तो किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है, क्या पता हो भी। डरे हुए लोग कहते हैं, ये हैं तो मुमकिन हैं। पता नहीं लोग अपनी अंतरात्मा की सुनेंगे या उन के मन की बात! बहुत हुई अतीत के प्रतिनिधि के मन की बात, मनमानी की बात और अब नफरत के बाजार में भविष्य के दूत की मुहब्बत की दुकान!

कुछ ‘उत्पाती युवा’ दर्शक दीर्घा से संसद में क्यों कूदे इस पर संसद में भी सवाल पूछना गुनाह सरीखा हो गया है। जवाब कौन दे, क्यों दे, किस को दे! लेकिन, ‘इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आप को’ बहुत कठोरता से पूछा था बाबा नागार्जुन ने। ‘इंदु जी’ के जवाब का पता नहीं, राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में उस सवाल का विनम्र जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं।

आज की चतुर्दिक परिस्थिति में भारत जोड़ो न्याय यात्रा अपने लक्ष्य को हासिल कर पाती है या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि भारत का मतदाता समूह क्या फैसला लेता है या क्या उसे फैसला लेने दिया जाता है, इसी पर सारा दारोमदार टिका है।

फिलहाल, अन्नदाता किसान बदहाल और आंदोलित हैं। तैत्तिरीय उपनिषद अन्न के महत्त्व का संदेश देता अन्न को ब्रह्म मानकर चलने से जीवन भी चलता है और ब्रह्म का भी दर्शन होता है। प्राणी अन्न खाकर बढ़ते हैं, प्राण अन्नमय कोश में बसता है, ब्रह्म भी। किसान बदहाल हैं। आंदोलित हैं। मई महीने में कैसी फसल घर आयेगी इसका इंतजार करना होगा। सत्ता से ऐसे कठिन सवाल पूछने वाले बाबा नागार्जुन के दोहे ‘अन्नपचीसी’ के प्रति आभार जताते हुए उस पर नजर डालें-

सीधे सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़।

अन्नपचीसी खोल ले, अर्थ जान ले मूढ़।

कबिरा खड़ा बज़ार में लिए लुकाठी हाथ।

बंदा क्या घबराएगा जनता देगी साथ।

छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट।

मिल सकती कैसे भला अन्न चोर को छूट।

आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाश।

कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफाश।

नागार्जुन मुख से कढ़े साखी के ये बोल।

साथी को समझाइए रचना है अनमोल।

अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़ करोड़।

सचमुच ही लग जाएगी, आँख कान में होड़।

अन्न ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच।

औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच।

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