शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

मुझे मालूम है कि

मैं उनके निहितार्थों में जरूर होता हूँ
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हे प्रिय! मुझे मालूम है
जितनी भी अच्छी बातें हैं
वे अक्सर मुझे संबोधित नहीं होती हैं
फिर भी मैं उनके निहितार्थों में
खुद को तलाश रहा होता हूँ
मुझे पता भी नहीं होता कि
कितने सारे वनकटैया से
मेरा वजूद इन दिनों घिर रहा होता है

हे प्रिय! मुझे मालूम है
जितनी भी अच्छी बातें हैं
वे अक्सर तुम से संबोधित होती है
लेकिन वे बातें तुम तक पहुँच नहीं पाती है
और हवा में टँगा इंद्र धनु उदास हो जाता है

हे प्रिय! देखो न कि कैसे
वनकटैया और इंद्र धनु आपस में उलझ रहे हैं
और कितना क्रूर हो गया है आसमान इन दिनों
हे प्रिय! देखो न
जीवन अट्ठारह सौ सत्तावन हो रहा है इन दिनों

हे प्रिय! मुझे मालूम है
जितनी भी अच्छी बातें हैं
वे अक्सर मुझे संबोधित नहीं होती हैं
फिर भी मैं उनके निहितार्थों में जरूर होता हूँ

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