मुल्क के ईंधन बन जाने की त्रासद कथा

नैतिक निस्संगता और आंतरिक भुरभुरापन से

मुल्क के ईंधन बन जाने की त्रासद कथा


स्वयं प्रकाश जी हमारे समय के प्रसिद्ध एवं स्वंयसिद्ध हिंदी साहित्यकार हैं। उनके लेखन का महत्त्व कई दृष्टियों से है। उनका उपन्यास ईंधन, एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। 2004 में ईंधन का प्रथम संस्करण आया। हिंदी में प्रकाशन की प्रक्रिया और परिस्थितियों को देखते माना जा जा सकता है कि इसका लेखन पिछली सदी में संपन्न हुआ होगा। इसकी कथा वस्तु का आधार पिछली सदी के संदर्भों से बना होगा। यह सब अनुमान का विषय है। प्रकाशन के इतने वर्षों के बाद इसकी समीक्षा की क्या जरूरत है! इससे पाठकों की कौन-सी जरूरत पूरी हो सकती है! खासकर जब हम दशकों में सोचने-विचारने के अभ्यस्त हो गये हैं। प्रत्येक पीढ़ी दस साल में बदल जाती है। यह पीढ़ी बदलाव निरंतर होता रहता है। तकनीकी विकास की तीव्रता का तो हाल यह है कि, आज सामने आई तकनीक कल पुरानी हो जाती है, अभी की चीज अभी-की-अभी पुरानी हो जाती है। युग परिवर्तन का जो लक्षण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संकेतित किया, बात उससे बहुत आगे बढ़ चुकी है। वास्तविक विकल्प भले ही उतने नहीं हों, आभासी विकल्पों की भरमार-सी लग गई है। उपलब्ध वास्तविक विकल्पों और आकांक्षित आभासी विकल्पों के स्वरूप तथा मिजाज से भी नई-नई मनोवृत्तियों, अभिरुचियों, रोजी-रोजगार, काम-संतुष्टि के अवसर और मनोरंजन के तौर-तरीकों, खेल, कला-संस्कृतियों, सिनेमा, साहित्य  की विलक्षण अभिव्यक्तियों की सूक्ष्मता में भी भारी बदलाव आया है। आर्थिक गतिविधियों, सामाजिक संदर्भों, स्वीकरण और निरसन की प्राथमिकताओं के मिजाज साथ ही पठन-पाठन की पद्धतियों में भी बहुत अंतर आया है। वेश-भूषा, साज-सज्जा के विन्यास को सहज ही लक्षित किया जा सकता है। चालाकियों, धुर्त्तताओं और मूर्खताओं में भी अंतर आया है। ईंधन की स्निग्धताओं और रोहितों के सारे प्रसंग आज बदल गये हैं। तो फिर इसके प्रकाशन के इतने वर्षों के बाद इसकी समीक्षा की क्या जरूरत है! सामान्य, सरल शब्दों में कहें तो आज इसकी समीक्षा का कोई खास औचित्य नहीं है। जहाँ, समीक्षा की जरूरत नहीं है, वहीं आलोचना की बहुत अधिक जरूरत है। कायदे से यहाँ समीक्षा और आलोचना के तात्त्विक अंतर को स्पष्ट किया जाना जरूरी है। हालाँकि इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए यहाँ बहुत अवकाश नहीं है। इस पर बहुत सारी बातें पहले भी होती रही है। शास्त्रीय विवेचन के उलझाव-सुलझाव का प्रयास न भी किया जाये तो भी इतना टाँक रखना जरूरी है कि समीक्षा मूलतः समीक्ष्य कृति के रचनाकाल और रचनाशीलता को देखते हुए तथा तत्कालीन धूल-धुआँ से निकालकर रचना के विविध पक्षीय महत्व को आँकने का काम करती है। आलोचना का मूल दायित्व सभ्यता विकास के साथ संवाद कर सकने और उसकी दिशाओं तथा दशाओं को समझने में रचना के उपयोगी हने के महत्व को देखने व आँकने का प्रयास करना है। कहना न होगा कि समीक्षा रचना प्रकाशन के साथ-ही-साथ किया जाना जरूरी होता है ताकि वह पाठक, सर्वजन या तत्कालीन नागरिक जमात की नजरों से ओझल न रह जाये। आलोचना का काम रचना के पूरे परिप्रेक्ष्य के, कम-से-कम एक स्तर पर, थिर हो जाने के बाद ही शुरू होता है। आलोचना का मौलिक काम पाठकों के परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए, सभ्यता विकास के बहुविध अध्ययन के परिप्रेक्ष्य से जोड़कर ज्ञान और रस की बहुआयामिता में परखना और संयोजित करना। समकालीनता का दबाव या कह लें धूल-धुआँ का असर समीक्षकों पर कुछ ज्यादा पड़ता है। असर तो आलोचकों पर भी पड़ता है, लेकिन इन से बचने का कुछ अधिक अवसर आलोचक को सुलभ होता है। हालाँकि यह समाज का और इसलिए साहित्य का भी, अनालोचन काल है फिर भी यहाँ, स्वयं प्रकाश के उपन्यास ईँधन को आलोचना की नजर से देखने की जरूरी कोशिश की गई है। फिर कहें यह समय अनालोच्य है। दृष्टि की निकृष्टता कहती है तत्काल समीक्षा के रूप में विज्ञापन, रचना के प्रचार का जितना महत्व है उसकी तुलना में आलोचना तुच्छ ही समझी जा सकती है; साँप के गुजर जाने या रस्सी घसीट लिये जाने के बाद उसकी लकीर की निशानदेही की तरह। यह समझना चाहिए की लकीर की दशा-दिशा के अध्ययन और विश्लेषण के महत्व को न समझा जायेगा तो पुरातात्विक अध्ययन का ही क्या महत्त्व रह जायेगा। स्निग्धताओं और रोहितों के सारे प्रसंग आज भले ही बदल भी गये हों तो क्या! बेटू का सवाल बदला नहीं है, हाँ बदली है सवाल की तीव्रता, सवाल की भयावहता और सवाल का दायरा इसलिए जरूरी है ईंधन की आलोचना।

रोहित ने स्निग्धा को बहुत सारा कुछ सिखाया।

और इस बात के लिए स्निग्धा ने रोहित को कभी माफ नहीं किया।

स्निग्धा और रोहित के माध्यम से जो जीवन दर्शन सामने आता है, वह पिछली सदी में जितना जीवंत था उससे जीवंत इस सदी के चौथे दशक में भी प्रयोज्य तथा प्रचलित है। दी गई, जीवन स्थिति में हर किसी को जीना होता है। जीवन यापन की पद्धतियों और शर्तों के अनुसार ही जीवन का सलीका विकसित होता है और फिर उसी तर्ज पर जीवन दर्शन भी आकार पाता है। रोहित ने ऐसा क्या कुछ स्निग्धा को सिखाया जिस बात के लिए उसने कभी उसको माफ नहीं किया! कोई कुछ भी सिखाये तो वह गुरु का दर्जा हासिल कर लेता है और इसके लिए सीखनेवाला कृतज्ञता बोध से भर जाता है। यहाँ परिस्थिति विपरीत है तो इसके अंदर जाना होगा। यह अंदर की बात है। जानना होगा कि रोहित स्निग्धा को क्या सिखा रहा था! वह सिखा रहा था निम्न-वर्गीय घरेलू काम जो महिलाएँ घर में पारंपरिक तौर पर करती आई हैं, और जिन घरेलू काम को करने में पुरुषों की दिलचस्पी कम होती है, जानकारी भी कम होती है। यहाँ, उलटी स्थिति है। रोहित अपनी पारंपरिक भूमिका में लौटने की कोशिश करता है, इसके लिए जरूरी है कि स्निग्धा को भी अपनी पारंपरिक भूमिका में लौटना होगा। जाहिर है, स्निग्धा को यह पसंद नहीं आया होगा और रोहित ने ठीक भी ही महसूस किया होगा कि स्निग्धा ने इसके लिए उसे कभी माफ नहीं किया। आज, इस समय घरेलू कार्य के बदले संदर्भों पर गौर करें तो कई बदलाव नजर आयेंगे। शहरी घरों में रसोई की बनावट और रसोई में व्यवहार में लाये जानेवाले उपकरणों में भी बदलाव आया है। खान-पान में भी अंतर आया है। अंतर पहले भी था, वर्गगत अंतर। स्निग्धा और रोहित की जीवन शैली में वर्गगत अंतर भी है, जो पसंद-नापसंद आदि में दिखता था। यहाँ का खाना स्निग्धा की पसंद का नहीं  था। क्या खाना था? यह किस तरह का खाना? स्निग्धा वैसे भी रसोई या घरेलू काम से कभी जुड़ी नहीं रही। रोहित उसे सबकुछ धैर्यपूर्वक सिखाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन स्निग्धा के मन में चल क्या रहा था! यह कि क्या यही सब सीखने की तमन्ना लेकर वह इस घर में आई थी? क्या कोई भी लड़की शादी के बाद मां-बाप का घर छोड़कर यही सब सीखने ससुराल आती है? इस तरह कदम-कदम पर जलील होना, पल-पल दोषी ठहराया जाना। घड़ी घड़ी, छोटी छोटी चीजों के लिए तरसना और एक तरह का अदृश्य पर निरंतर हिंसा और रक्तपात झेलना! उसे अपने पापा की याद आती है। पापा का घर ही क्या बुरा था?  क्यों क्यों लड़कियों अपने मायके में याद करके रोती हैं बुढ़ापे तक। स्निग्धा को अब बाप के राज का मतलब समझ में आ रहा था। स्निग्धा हमेशा कुढ़ती रहती थी कि क्या-क्या करना पड़ेगा उसे रोहित के घर को अपना घर बनाने के लिए। बाप का घर और उस घर को भूलने में कितने बरस लगेंगे। उसे घर की चिंता है। लेकिन पापा के घर को भूल जाने के साहस का अभाव उस में है। उसका मन यह सोचकर सिहर जाता है कि जीवन भर ऐसे ही फटीचर परिस्थितियों में बदहवास की तरह रहना होगा। उसे चिंता है कि क्या घर के  इसी माहौल में अपने बच्चे को जन्म देगी? इसी माहौल में उसके बच्चे शिक्षा प्राप्त करेंगे! स्निग्धा को रोहित के घर के माहौल की चिंता सताती है, घर के बहर के माहौल की कोई खबर ही नहीं है। वह निराश होकर रोहित के बारे में सोचती है कि एक बार ताकत लगाकर रोहित अपने वर्ग से ऊपर क्यों नहीं उठ जाता! लेकिन उसमें इस आत्मविश्वास का अभाव है कि वह रोहित में ऊपर उठने की इच्छा कभी वह जगा पायेगी। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचने लगी कि ऐसे नहीं चलेगा समस्याओं का समाधान उसे ही करना होगा। समाधान करना होगा लेकिन उसे तो यह भी पता नहीं कि रोहित की तनख्वाह कितनी है! गौर से देखें तो यही वह दौर था जब रोहित के घर के माहौल में बदलाव की ही नहीं, विश्व-व्यवस्था में भी बदलाव की बयार आँधी बनने की तैयारी में थी। उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) सभी के मन में बेहतर जीवन-स्तर की नयी-नयी संभावनाओं के लोभ और स्वप्न के आयातित पौधे को रोप-सींच रहा था। ऐसे में स्निग्धा की तरह सभी गृहणी मोर्चा सम्हालने के लिए तत्पर हो रही थी। अपने-अपने रोहितों के बारे में सोच रही थी कि एक बार ताकत लगाकर उनका रोहित अपने वर्ग से ऊपर क्यों नहीं उठ जाता!

भारत नये बदलाव के स्वागत की आंतरिक और अवचेतन आकांक्षा से लबाब था। हर किसी को संभावनाओं के चमकीले दाने दिख रहे थे, पसरे हुए आशंकित जाल की रस्सी और रस्सी की गाँठ नहीं दिख रही थी। भारत की स्थिति पर गौर करने से यह बात बिल्कुल साफ दिख सकती थी कि भारत विविधताओं, बहुलताओं से समृद्ध ही नहीं बल्कि विभिन्न स्तर एवं प्रकार की विषमताओं से ग्रस्त एवं अंदर से विखंडित भी रहा है। इसका अंतर्मन स्पर्श-कातर गाँठों और हमेशा टीसती रहनेवाली रसौलियाँ से भी पीड़ित रहा है। इसकी भुरभुरी सामाजिक संरचनाओं और उसकी परंपराओं में विषमताओं, गाँठों और रसौलियों की सक्रियताओं में कोई कमी नहीं हो पाई थी। आजादी के आंदोलन के दौरान आकांक्षित मूल्यबोध और ज्ञानोदय एवं आधुनिकता की आयातित नैतिकता जीवनबोध का जीवंत हिस्सा नहीं बन पाई थी। औद्योगिक क्रांति के साथ दुनिया में जब राष्ट्रवाद आकार पा रहा था तब भी भारत में राष्ट्रवाद उस रूप में गठित नहीं हो पा रहा था। भारत में हम और अन्य के इतने सारे ऐतिहासिक, आर्थिक, क्षेत्रीय, धार्मिक, जातिवादी, आनुवंशिक आदि के संदर्भ थे कि राष्ट्रवाद का विकास असंभव था। जानकारों ने माना कि भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा है और राष्ट्रवाद से अधिक जरूरी एवं उपयोगी है, मानवदाद। विडंबना यह कि दुनिया में जब राष्ट्रवाद का दबदबा था तब भारत विश्व-मानववाद की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जब दुनिया में बहुराष्ट्रवाद या अधिराष्ट्रवाद (ट्रांसनेशनलिज्म) का उभार आया तो इसके साथ भारत में राष्ट्रवाद, धर्म-आधारित राष्ट्रवाद, बहु-सूत्रीय नहीं एक-सूत्रीय राष्ट्रवाद का ज्वार उठ रहा था। विडंबना यह भी कि यह राष्ट्रवाद राष्ट्रवासियों में हम और अन्य के दलदल से बाहर निकलकर एक होने की गुहार नहीं लगाता है। इस बार जो राष्ट्रवाद का ज्वार उठा उसके अंदर धर्म-आधारित हम और अन्य की भावना को पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र और तीखा बनाने के दर्प और उन्माद के साथ आगे बढ़ने के नाम पर पीछे ले जाने का प्रपंच साफ दिख रहा था। अयं बन्धुरयं औरनेति गणना करनेवाली लघुचेतना का प्रभाव विस्तृत हो रहा था। वसुधैव कुटुंबकम के लिए आवश्यक उदार चरित पर लघुचेतना का ग्रहण लग गया था। हालाँकि, अयं बन्धुरयं नेति गणना लघु चेतसाम। उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम। संसद के प्रवेश कक्ष में यथावत अंकित था, फिर भी बन्धुरयं की गणना सत्ता की मूल प्रेरणा बन गई; अ-पारदर्शी प्रभुओं के नेतृत्व में पारदर्शिता और स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को नष्ट करनेवाला क्रोनी कैपिटलिज्म (साथ-गाँठवाला सत्ता-सहचर पूँजीवाद) जोर पकड़ रहा था। जन समर्थित जनतंत्र को पूँजी-प्रायोजित जनतंत्र अवहेलित और विस्थापित करने लगा था। धर्म के बारे में महाभारतीय संशय की कोई अब गुंजाइश नहीं बची थी। यह सब अद्भुत था, अपूर्व था। इन्हीं अद्भुत, अपूर्व परिस्थितियों में रोहित अपने विकास की संभावनाओं की तलाश कर रहा था। इस तलाश में जो हासिल हो रहा था उसे पकड़ने टिकाये रखने की कोशिश में स्निग्धा का साथ छूटते जाने, बेटू के हाथ से निकलते चले जाने, यानी अगली पीढ़ी और आवाम के ईंधन में बदलते जाने की आशंकाओं का अ-दृश्य घटाटोप आकार पा रहा था।

धम्म औरधर्म के अंतर पर फिर कभी बात की जा सकती है, लेकिन कबीर! कबीर के पास जाना जरूरी है। कबीर जब धर्म की बात करते थे, तब क्या कहते थे, स्वयं प्रकाश के इस उपन्यास को जानने की दृष्टि से कदाचित प्रासंगिक है, कि क्यों आवाम ईंधन में बदल रहा था। कुछेक विद्वान लोगों ने कबीर साहित्य  में धर्म शब्द के इस्तेमाल की गिनती भी की और वे निराश हुए। उन्हें कहीं भी कबीर के साहित्य में धर्म शब्द का सीधा उल्लेख नहीं मिला। सच तो यह है कि भक्ति धर्म का विस्तार नहीं विकल्प बनकर उपस्थित हुई थी। यहाँ यह ध्यान दिलाना जरूरी है कि भक्ति के बोध में सूफी तत्व समाहित है। बहरहाल, कबीर के साहित्य में धर्म शब्द को तलाशना और उसकी व्याख्या करना अपने आप में बौद्धिक धोखे की ओर बढ़ना है। साहित्य में धर्म की खोज करना शरीर में उसके आत्मा की खोज करने जैसा हो सकता है। हाँ, देखना यह जरूरी होगा कि किसी साहित्य में स्वतः समाविष्ट धर्म का स्वरूप और चरित किस तरह लोक-हितैषी, या फिर लोक-विरोधी है। साहित्य में स्वतः समाविष्ट धर्म की अवधारणा में किसी मतिभ्रम की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। साहित्य में सच और सपना नीर-क्षीर के मिश्रण की तरह होता है। सपना माने झूठ? नहीं। वैसे, यशपाल को याद करें तो झूठ साहित्य में सच का विशेषण बनकर आता है, याद है न झूठा सच! सपना में जो होता है उसका सपना के बाहर में कोई तार्किक अस्तित्व नहीं होता है। पुरुषोत्तम अग्रवाल  ने प्रेम की अकथ कहानी के प्रसंग में कबीर से भारतीय आधुनिकता की शुरुआत को ठीक ही लक्षित किया है। भारत में आधुनिकता की शुरुआत को कबीर से जोड़ा जा सकता है। मैंने कई जगह भारतीय पुनर्जागरण का आरंभ विद्यापति से माने जाने का प्रस्ताव किया है। आधुनिकता पीठिका के रूप में पुनर्जागरण का होना, ऐतिहासिक समझ और तार्किक संगति से समर्थित माना जाना चाहिए। बहरहाल, भारतीय आधुनिकता और भारतीय पुनर्जागरण का रूप-तत्व ग्रामाभिमुखी था। यूरोपीय आधुनिकता और पुनर्जागरण का रूप-तत्व नगर-केंद्रित था। यूरोपीय आधुनिकता एवं पुनर्जागरण से भारतीय आधुनिकता एवं पुनर्जागरण के भिन्न होने को नैसर्गिक और सहज माना जाना चाहिए। यूरोप की आधुनिकता में ईसाई-मूल्य श्रृँखला की दार्शनिक बुनियाद, बौद्धिक विवेक का आग्रह और ज्ञानोदयी आकांक्षा प्रेरिका शक्ति के रूप में सक्रिय थी। भारतीय आधुनिकता की बुनियाद में आडंबर मुक्त भक्ति-तत्व की आध्यात्मिक आकांक्षा, निर्विशिष्ट सामाजिक-समता का आग्रह, निर्वैर जीवन-व्यवहार और सबसे ऊपर मानुस के होने का बोध सक्रिय था। यूरोपीय आधुनिकता और भारतीय आधुनिकता अर्थात आधुनिकता के इन दोनो संस्करणों के अपने क्रम और विक्रम हैं। इन्हें एक दूसरे की कसौटी के आधार पर कमतर या बेहतर मानने में अतुल्यों के बीच तुल्य-दोष है। यूरोपीय आधुनिकता और भारतीय आधुनिकता अर्थात आधुनिकता के इन दोनो संस्करणों का आकाश तो लगभग एक ही था, लेकिन जमीन बहुत ही भिन्न थी। भारतीय आधुनिकता की जमीन प्रत्यक्षतः दो कारणों से कठिन थी। एक कारण की ज़ड तो भारत के बहुलात्मक गठन की पारंपरिकता में थी और दूसरे की जड़ औपनिवेशिक विडंबनाओं में थी। यहाँ संकेत करना प्रासंगिक है कि वैकल्पिक आधुनिकताओं पर हुए अध्ययनों एवं निष्कर्षों को अलग से देखा जाना जरूरी हो सकता है।

भारत के स्वाधीनता आंदोलन की बुनियादी बातों को याद कर लेना अप्रासंगिक न होगा। भारत के स्वाधीनता आंदोलन को अन-उपनिवेशन, ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश से बाहर निकलने की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। आर्थिक, राजनीतिक, वैधानिक अन-उपनिवेशन का आग्रह तो प्रबल था ही, सांस्कृतिक और बौद्धिक अन-उपनिवेशन का आग्रह भी कम प्रबल नहीं था। सांस्कृतिक और बौद्धिक अन-उपनिवेशन की प्रक्रिया में भारतीय आधुनिकताबोध और यूरोपीय आधुनिकताबोध का अंतर्विरोध था। स्वाधीनता आंदोलन में तीव्रता के साथ ही आर्थिक, राजनीतिक, वैधानिक अन-उपनिवेशन का आग्रह मुखर और प्रबल होता गया जबकि सांस्कृतिक और बौद्धिक अन-उपनिवेशन का आग्रह निःशब्द और कमजोर पड़ता गया। स्वाधीनता आंदोलन की तीव्रता के दौर में भी सपनों में लुकझुक करती आदर्श राज्य-व्यवस्था के रूप में ब्रिटेन ही था, विडंबना ही है कि उपनिवेशित के अन-उपनिवेशन की आकांक्षा में उपनिवेशक ही आदर्श था। महात्मा गाँधी के ग्राम-स्वराज्य/ ग्राम-स्वराज के अनुसरण से अधिक आकर्षण ब्रिटिश-राज्य/ ब्रिटिश-राज के अनुकरण में था। इसका एक बड़ा कारण अन-उपनिवेशन की प्रेरणा का गुणसूत्र उपनिवेशक से जुड़ा था। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वाम-प्रगतिशीलता के वर्चस्व के कारण भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक अन-उपनिवेशन की प्रक्रिया उपनिवेशक की सांस्कृतिक और बौद्धिक परियोजना की अधीनस्थ बनकर रह गई। भारत में आंतरिक उपनिवेश भी कोई कम भयावह नहीं था। इस उपनिवेश की बेड़ियों को उतार फेकने की आकांक्षा भक्ति काल की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना में थी। बाबा साहब आंतरिक उपनिवेश की कड़ियों को बाह्य-उपनिवेशक की राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक परियोजना के बल पर उतार फेकने के प्रति आश्वस्त थे। साफ-साफ कहना जरूरी है कि भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक अन-उपनिवेशन की प्रक्रिया में उपनिवेशक की सांस्कृतिक और बौद्धिक परियोजना की अधीनस्थता से बाहर निकलने की कोशिशें न सिर्फ जारी रही बल्कि निरंतर तीव्र एवं विकृत होती गई। इस तीव्रता में संस्कृति को धर्म ने विस्थापित कर दिया।

आधुनिकता के भारतीय और यूरोपीय संस्करणों के संघर्ष में धर्म के जुड़ने से राजनीतिक प्रक्रियाओं का अगला दौर सामने आया। कई कारणों से इसके  सकारात्मक और अग्रगामी कारक छूटते चले गये और कतिपय नकारात्मक और पश्चगामी कारक प्रभावशाली होते चले गये। इसका कारण यह भी है कि धर्म पीछे से अपना प्रमाण प्राप्त करता है, सभ्यता आगे से अपनी प्राण-                                                                                                                                          शक्ति प्राप्त करती है। कहना ही होगा कि कम-से-कम भारत के संदर्भ में उत्तर आधुनिकता या तो इतर आधुनिकता या फिर आधुनिकता पूर्व के रूप में प्रकट होकर राजनीति के लिए ईंधन जुटाने में अपनी भूमिका अदा करने लगी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने उपन्यास अनामदास का पोथा में अंगुलि-निर्देश की चर्चा की है। कोई अंगुलि-निर्देश करे तो उस दिशा के नफा-नुकसान को समझते हुए आगे बढ़ना सयानो का काम होता है, न कि अंगुली पकड़कर कर लटक जाना। साहित्य तो अंगुलि-निर्देश ही कर सकता है। स्वयं प्रकाश के इस उपन्यास को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। समझा जा सकता है, लेकिन साहित्य का पाठक प्राथमिक तौर पर साहिय के पास समझ या ज्ञान के लिए नहीं, रस और आनंद के लिए आता है, पात्रों से जुड़कर खुद को निर्विशिष्ट रूप में खोने-पाने के लिए आता है, इसके लिए रोहित तथा स्निग्धा के जीवन-प्रसंग में जाना होगा।

रोहित और स्निग्धा की जीवन शैली में काफी अंतर है। इस अंतर को ध्यान से देखें तो इस में आदमी और आदमी का अंतर दिखता है। स्निग्धा जहां पूरी तरह से आधुनिकता की जीवन शैली यानी कि यूरोपीय जीवन पद्धति पर यकीन करती थी, यूरोपीय जीवन पद्धति ही उसे आकृष्ट करती थी। वहीं रोहित इस बात को बिल्कुल ही सही नहीं मानता था। रोहित भारतीय शैली में अपनी जीवन पद्धति को सुगठित करना चाहता था। रोहित और स्निग्धा के मामले में यह गौर करने लायक बात है कि इन मुद्दों पर उन में पारस्परिक भिन्नता थी और यह भिन्नता उनके मन को मथती रहती थी। अचानक बने संबंध के बावजूद दोनों की जीवन गति बिल्कुल भिन्न में दिशाओं में जा रही थी। भिन्न-भिन्न दिशाओं में कुछ दूर जाकर भी दोनों अपनी संबंध भूमि पर लौट आते थे। रोहित कहता कि अंगुलियों से, हाथ से खाने में क्या बुराई है! अपना हाथ खाना खाने से पहले हम तीन बार साबुन से धो सकते हैं, जबकि काँटा जाने किस किस के मुंह में घुसकर आया होता है। काँटा कभी अंगुलियों जितना साफ हो ही नहीं सकता। अंगुलियाँ भोजन को छूते ही उसके तापमान की सूचना आपको दे देती है। देखना कल को पश्चिम के लोग भी हाथ से खाना खाने के महत्व को समझेंगे। रोहित भिन्न धरातल पर जिंदगी जी रहा था। रोहित को लगता था कि उसे सभ्य बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। पालतू बनाया जा रहा है। भद्र समाज के अनुकूल ढालने की कोशिश की जा रही है। सफलता की गगनचुंबी दिशा में प्रक्षेपित किया जा रहा है। रोहित और स्निग्धा में सफलता की कामना के औचित्य पर कोई विवाद नहीं था। जीवन लक्ष्य के बारे में और जीने के अर्थ के बारे में कोई संदेह नहीं था। सब कुछ स्पष्ट था। रोहित की आत्मा रहन-सहन के वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त तरीके को एक मात्र सही तरीका मानने को तैयार नहीं थी। इस मसले पर बहस करता था। शांति से और विस्तार से अपने विचार व्यक्त कर सकता था, लेकिन उसका विचार सुनता कौन? बहस तो व्यक्ति से की जा सकती है! बहस ऑब्जेक्ट्स से नहीं की जा सकती। एक ऐसा माहौल बन गया था कि हर कोई, दूसरे के लिए ऑब्जेक्ट्स बनता जा रहा था। विडंबना यह कि संवाद साधनों की बढ़ती प्रचूरता के साथ ही संवादहीनता का माहौल अधिक गहराता जा रहा था। लोग अपनी-अपनी वास्विक कंटीली जीवन स्थिति से पलायन करके अपने-अपने सपनीले एवं सुकुमार आभासी धरातल पर मनसा संचरण के नये उलझावों में फँसते जा रहे थे। ऐसे में संवाद! संवाद की संभावनाएँ तिरोहित होती जा राही थी। तिरोहित संभावाओं के बावजूद रोहित इन तमाम मसलों पर स्निग्धा से बात करना चाहता था, लेकिन दोनों के धरातल पर अलग-अलग तरह के मसले थे। दोनों का जीवन एक धरातल पर आ ही नहीं पा रहा था। यहां तक कि उनके सोने के लिए भी एक समान धरातल नहीं था। न सोने का धरातल एक था, न सपनों का धरातल एक था। माहौल ऐसा कि सपना में कोई अपना शामिल नहीं हो पा रहा था।

स्निग्धा को धीरे-धीरे रोहित से चीढ़ सी होने लगी थी। उसके काम करने के तरीके से, यहां तक कि उसके खर्राटे से। उसके हर प्रकार की, पूरी की पूरी जीवन शैली से स्निग्धा को चिंता हो रही थी। स्निग्धा अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रही थी। रोहित के टेस्ट को लेकर भी उसके मन में काफी दिक्कत थी। कोई गरीब है इसमें उसका कोई कसूर नहीं हो सकता है, लेकिन गरीबी को ग्लोरीफाई क्यों किया जाए! गरीबी है तो एक अभिशाप उससे नफरत की जानी चाहिए। उसे मिटाने के लिए परिश्रम किया जाना चाहिए। रोहित को लगता है कि जिंदगी एक संघर्ष है। असल में रोहित जिस जिंदगी को जीना चाहता था वह जिंदगी एक भिन्न प्रकार की जिंदगी थी, जो अपने चरित में पारंपरिक भारतीय ग्रामीण जिंदगी थी। स्निग्धा की समस्या थी कि शादी के काफी दिनों बाद तक उसे यह पता नहीं था कि रोहित को कितनी तनखा मिलती है। कैश मिलती है या बैंक में चली जाती है! उसका खाता किस बैंक में है? क्या नंबर है? अकेले का खाता है जॉइंट अकाउंट है? नॉमिनी की जगह उसने किसी का नाम लिखवाया भी है या नहीं? यदि हां तो किसका? रोहित उसे नहीं बताता था। इसके दो ही कारण हो सकते थे या तो उसकी तनख्वाह इतनी कम थी कि उसे बताने में भी शर्म आती थी या उसके अनुमान से इतनी ज्यादा कि सोचता होगा बता देगा तो सारा पैसा खर्च कर देगी। इन सब बातों पर स्निग्धा का मन लटका रहता था। वह हमेशा नए जमाने की बात करती थी।

स्निग्धा अपने जीवन में पहली नौकरी पर जब जाती है तो उसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। स्कूल की स्थिति यह रहती है कि उसमें न तो कोई ढंग का बाथरूम होता है और ना किसी प्रकार का वास्तविक वातावरण होता है। स्कूल का पूरा इकोसिस्टोम जैसे डिस्टर्ब रहता है। हद तो तब होती है जब तनख्वाह की बारी आती है। ढाई हजार पर साइन कराए जाते हैं, एक हजार दिए जाते हैं। अड़ जाने पर ढाई हजार देकर नौकरी समाप्त कर दी जाती है। स्निग्धा के मन में जो सवाल उठता है, ईमानदारी से एक सामान्य जीवन जीने के लिए हम कहां जाएं! यह इस सभ्यता का सबसे बड़ा सवाल है कि ईमानदारी से एक सामान्य जीवन के लिए कोई कहां जाए?

 रोहित और स्निग्धा में मंदिर भगवान देवी देवताओं को लेकर भी बहस होती है। रोहित के पास अपने धर्म होते हैं। स्निग्धा के पास अपने। रोहित इस बात को ऐसे लगता है कि कॉमन सेंस रखने के लिए धर्म का होना जरूरी थोड़े ही है! हजारों लोग हैं जो देवी देवताओं को नहीं मानते मंदिर नहीं जाते।

 स्निग्धा के पापा सोचते हैं, आदमी के पास पैसा नहीं होता है, तो वह पैसे के पीछे पड़ जाता है। पैसा कमाने के पीछे सब कुछ भूल जाता है बीवी बच्चे घर परिवार को, हँसना खेलना सब, यहां तक कि खुद को भी। जब इस तरह सब कुछ खोकर खूब पैसा कमा लिया जाता है तो समझ में ही नहीं आता इस पैसे का और अधिक पैसा बनाने के अलावा क्या उपयोग किया जा सकता है!

रोहित को पूरी तरह बदल दिया, कायाकल्प कर दिया मुंबई ने। रोहित को वह सपना देखना सिखा दिया मुंबई ने जिसे वह अब तक नीची नजर से देखता था। छ महीने के अंदर ही मुंबई के जीवन में ऐसे रंग गया जैसे पानी में मछली, खासकर महिलाओं के बारे में तो उसकी सोच ही बदल गई। रोहित अपने को परंपरा पोषित परिस्थिति पुत्र भी मानता था। अर्थात, आदमी कमा कर लाता है और औरत उड़ाती है। आदमी खटता है और औरत खिलाती है। आदमी जुटाता है और औरत बनाती है। आदमी पाता है औरत पालती है। आदमी चलाता है औरत चलती है। इसी तरह की होती है दुनिया। रोहित ने महिला के साथ काम नहीं किया था। कामकाजी स्त्रियाँ डॉक्टर, नर्स, अध्यापिकाएँ, धोबन, मेहतरानी, मालन आदि पहले भी देखी थी। लेकिन, पहली बार एक संपूर्ण-सहज-स्वाभाविक मानवीय ईकाई के रूप में अब देखी। जिन से बात-चीत, हँसी-मजाक किया जा सकता था लेकिन जो हर समय उसकी चेतना पर लदी नहीं रहती। जैसे और वैसे वे भी। मुंबई के गरीब भी रोहित के शहर के गरीबों की तुलना में अमीर नहीं तो काफी कम गरीब व्यक्ति थे। रोहित को लगता था मुंबई में अर्थशास्त्र अपने सबसे मुखर रूप में गतिशील था। उसकी हर परत, उसका हर खेल, उसका हर जलवा मुंबई में सरे आम नुमाया था। मुंबई में ऐसे लोग भी थे जो एक वक्त में हजार रुपया का खाना खाते थे, बीस हजार की पोशाक पहनते थे, पचास हजार की घड़ी बाँधते थे, पाँच लाख की कार में बैठते थे, करोड़ों का धंधा करके अरबों का ख्वाब देखते थे। तो ऐसे भी थे जो नौ हजार में गुजर-बसर करते थे – जैसे कि खुद रोहित। लेकिन मुंबई ने उसे सपना देखना सिखला दिया। 

एक महत्वपूर्ण संदर्भ स्निग्धा के गर्भवती होने से जुड़ा हुआ है। इस बच्चे का क्या किया जाए? स्निग्धा इस समय में बच्चा नहीं चाहती थी। और इसके लिए वह न तो अपने पति से सलाह कर सकती थी और न पिता से। इन परिस्थितियों में, धीरे-धीरे तुषार को उसने अपना राजदार बनाना शुरू कर दिया। तुषार जो रिश्तों की गहराई में लगभग मौन था, लेकिन वह स्निग्धा के पिता का भी राजदार था और स्निग्धा का भी। बेटू से भी उसका रिश्ता बहुत करीबी था, उसके गर्भ में आने से लेकर उसके भस्म हो जाने के बाद तक। स्निग्धा, उसके पापा और बेटू के बीच तुषार उनके रिश्तों का चौथा आयाम था। बेटू के गर्भ में आने से बहुत ही दुविधा में थी स्निग्धा। गर्भावस्था का तीसरा महीना था जब रोहित आया। रोहित बदला नहीं था, लेकिन रोहित के प्रति लोगों का व्यवहार जरूर बदल गया था। यह बदलाव उसने पापा के व्यवहार में भी देखी। रोहित नया अनुभव कमा कर आया था। दुनिया में कुछ भी हो सकता है। जब एक टाइपिस्ट एक दिन मंत्री बन सकता है। कार्यालय में झाड़ू लगाने वाला और चाय पिलाने वाला एक दिन पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है। सिनेमा के पोस्टर बनाने वाला एक दिन क्या-से-क्या बन सकता है। कुछ भी हो सकता है। विडंबना यह कि गर्भ में उपस्थित बेटू उसके अनुभव का हिस्सा नहीं बन पा रहा था।

रोहित तो इस बात सेआश्वस्त था कि धीरे-धीरे बेटू समझ गया कि बाप खेलने की या टाइमपास करने की चीज नहीं होता है। वह हर समय माँ से चिपका रहने लगा। जब उधर से भी झिड़कियाँ मिलने लगी। तो चार साल का होते-होते अकेले-अकेले हंसने, अकेले रोने, अकेले होने, अकेले अपने-आप से बातें करने अकेले सोने की आदत उस के अंदर विकसित हो गई। स्निग्धा और रोहित को लगा  था कि बेटू आत्मनिर्भर हो रहा है, और बच्चों को आत्मनिर्भर तो होना ही चाहिए। धीरेधीरे स्निग्धा भी समझ गई कि पति गपशप करने की चीज या दिल की बात बताने की, पछूने की, या साथ हंसने-रोने की, घमूने फिरने की, साथ-साथ सपने देखने की, सोचने और योजना बनाने की या अपना सब कुछ बांटने की चीज नहीं होता है। उसके शहर के पति होते होंगे! क्या महानगर का पति! महानगर के पति का कुछ और चरित्र है, कुछ और अपेक्षाएँ, कुछ और कर्तव्य, यह सब समझने और स्वीकार करने में स्निग्धा को बहुत समय लगा।

रोहित को भी महससू हने लगा कि रोमांस उनके घर को, उनकी जिंदगियों को छोड़कर न जाने कहाँ चला गया था! यहां हर चीज समय पर रूटीन के साथ बंधी थी। जिस समय आप रोमांटिक मूड में हों, उस समय साथ हों और प्यार करने लगें यह सभंव नहीं था। जब समय हो, साथ हो तभी फटाफट मूड बनाकर रोमांटिक हो जाना, यही अब सभंव था। अपनी भावनाओं को, मन को मानसिकता को, मूड को इस तरह बिजली के झटके की तरह चालू बदं करना आसान नहीं था। लेकिन, दूसरा कोई उपाय भी नहीं था। महानगर के लाखों पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका यही कर रहे थे। इन तमाम परिस्थितियों का असर यह हुआ कि उनके संबंध बदलने लगे। अब पति -पत्नी की जगह सहयात्री की तरह हो गए थे। इसी तरह जिंदगी चल रही थी।

देश की बदलती उठती गिरती अर्थव्यवस्था के बीच राजनीतिक विकास की स्थिति इस तरह हो गई थी कि एक मध्यवर्ग सामने आ गया था। कदरोलकर की नजर जितनी पैनी थी उसकी नजर वह उतना ही धूर्त्त भी था। उसकी पैनी नजर में उच्च मध्यवर्ग के चरित्र में उपभोक्तावाद, शानदार जीवन की लालसा विदेश यात्रा का प्रलोभन और श्रम से छुटकारा पाने की प्यास का असर था। कदरोलकर की धूर्त्त नजर में में इस देश के लिए सांप्रदायिकता से ज्यादा बड़ा कैंसर हो गया था नौकरशाही का दखल। लेकिन नौकरशाही के खिलाफ कोई नहीं बोलता। कदरोलकर की नजर में सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलना फैशन में है। शायद इसलिए भी आपको लगता है कि  आप उसेफाइट कर सकते हैं। लेकिन नौकरशाही! उसका ख्याल आते ही आपको लगता है कि उसके बगैर देश कैसे चल सकता है! वह कहता है रोहित अगर हम कुछ नहीं बनेंगे तो भी इसकी बदौलत, कुछ भी होंगे तो इसी नौकरशाही की बदौलत। कदरोलकर सांप्रदायिकता के खतरे को कम आँकता है और क्रोनी कैपटलिज्म पर अधिक भरोसा जताता है।

वही बेटू जिसे आत्मनिर्भर बनता हुआ देखकर रोहित के मन में संतोष जन्मा था अब जवान हो रहा था। उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्मित हो गया था। उसने अपने व्यवहार से बता दिया था कि मन, प्राण, बुद्धि और चेतना से वह एक सपूंर्ण इकाई है। वह अपने मां-बाप का अपेंडिक्स नहीं है। अब स्निग्धा और रोहित को किस हद तक अपने मामलों में शरीक करना है इसका फैसला भी बिटूटू खुद ही करेगा। दुर्भाग्य से आरामदायक आर्थिक स्थिति ने इसे और जल्दी सभंव बना दिया। आरामदायक आर्थिक स्थिति का दुर्भाग्य से जुड़ना बेटू और बेटू की पीढ़ी की त्रासद विडंबना के रूप में प्रकट हो रही थी। असल में बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों के भीतर बेटू का विकास हो रहा था। सांप्रदायिकता के या धार्मिक स्थल के सवाल का वह कायल होता जा रहा था। इस प्रकार बेटू का विकास एक भिन्न प्रकार से हो रहा था। आधनिुनिकता की किसी भी परियोजना के बिल्कुल विपरीत उसका विकास हो रहा था।

बेटू अपने कई विषयों में फेल हो गया। फेल होने के पीछे उसने उन कारकों को रेखांकित किया, जो तर्क गढ़ा वे भी उन्हीं परिस्थितियों की मानसिक ऊपज थी। उसका विकास एक नए राष्ट्र के निर्माण की तरफ कदम बढ़ाने का संकेत दे रहा था। यही वह पीढ़ी थी, जिसका बड़ा हिस्सा, भारत को एक बदले हुए मिजाज में ले जाने पर आमादा राजनीतिक अग्निकुंड की समिधा बन रही थी। समिधा! समिधा नहीं, ईंधन। एक नए राष्ट्र का विकास ! विकास हमारे सामने है, और उस विकास को हम देख भी रहे हैं। जिन परिस्थितियों में बेटू का देहांत हुआ वह बहुत ही भयानक तो है ही, उन परिस्थितियों को बनाने में उसकी भी भूमिका गौर करने लायक है। प्रतीक में देखें तो बेटू अपनी पीढ़ी का प्रतीक लगता है। ऐसा लगता है कि बदलती हुई स्थिति में समाज ने अपने बेटू को सही व्यक्तित्व नहीं दिया। उनका व्यक्तित्व उस इस तरह से निर्मित हुआ कि वे उन परिस्थितियों में ईंधन बनते चले गए। ईंधन, किसी को जलाने के पहले खुद जल जाना जिसकी दुर्निवार नियति और परिणति होती है। इसके लिए दोषी कौन, कितना कम, कितना ज्यादा, वक्त हिसाब करेगा।

वक्त जब हिसाब करेगा तब करेगा, फिलहाल रोहित सोचता है, पापा तो मन-ही-मन उसे ही दोष दे रहे होंगे। वह तो यही समझ रहे होंगे कि मैं ने इन हथियारों से अपने और स्निग्धा के बेटे की हत्या की है। पापा कभी नहीं समझ पाएंगे कि हमारी दुनिया एक विशाल दैत्याकार धमन भट्ठी बन चुकी है और हम तीनों अपने जैसे हजारों-लाखों लोगों की तरह उसमें ईंधन की तरह झोंक दिये गये हैं। बेटू छोटा था भस्म हो गया। हमारे पूरी तरह भस्म होने में अभी कुछ और समय लगेगा। रोहित का ऐसा सोचना कितना सही है, कितना विलाप इसे पाठक को तय करने दिया जाए। गुजारिश इतनी-सी कि तय करने के पहले एक बार समाज में जिंदा प्रेत की तरह उलटे-पाँव चलते-फिरते, हँसते-रोते रोहितों, स्निग्धाओं और बेटुओं को पुरनजर देख लिया जाए।

नोटः पाठकों से विशेष अनुरोध

1.  इसे विडबंना को भी समझा जाना चाहिए की जिस एम-क्लास टीचर को बेटू घृणा की दृष्टि से देखता था उसी एम-क्लास का सदस्य उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा था और खुद जलकर जख्मी हो गया और अब अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा था। अस्पताल के अर्थ का अनुमान पाठक खुद लगा सकते हैं।

2.  नयी आर्थिक नीति उनिभू के साथ 1990-91 में शुरू हुई। इस उपन्यास का प्रकाशन 2004 में हुआ, लगभग तेरह साल बाद। तेरह बरह की उम्र में बेटू ईंधन की तरह इस्तेमाल हो गया। पाठक इसका अर्थ अपने स्तर पर हासिल करें।

3.  बेटू 6 दिसंबर को भस्म हुआ। भारत के इतिहास में 6 दिसंबर के महत्त्व को ध्यान में रख कर पाठक बेटू के उस दिन भस्म होने की घटना का निहितार्थ खोजें।

4.  एक दिन जब बेटू उठकर खड़ा हुआ। रोने लगा। रोहित से चीखकर बोला आप उनका पक्ष लेंगे ही। आप तो उन्हें अच्छा कहेंगे ही। आप मीट खाते हैं। आप मंदिर नहीं जाते। मैं जानता हूँ आप कम्युनिस्ट हैं। आइ हेट यू! आइ हेट यू! रोहित उस घटना को कैसे भूल गया, उसे तत्काल कुछ करना चाहिए था कुछ किया क्यों नहीं? पाठक इस चूक का पलितार्थ स्थिर करें।

5.  स्निग्धा जिस स्कूल में पढ़ाने गई थी उसका इकोसिस्टम डिस्टर्ब था, जिसे सुधारने की उसने कोशिश की थी। लेकिन यह पता चलने पर कि बेटू के स्कूल में बड़ी कक्षाओं के कुछ लड़के बच्चों को भड़का रहे हैं; बड़े लड़कों को स्कूल के ही एक-दो अध्यापक और उनका दल भड़का रहा है, पाठक बतायें रोहित को क्या करना चाहिए था जो उसने नहीं किया।

6.  किन परिस्थितियों में आदमी जितना कमाता है, उससे अधिक गँवा देता है? पाठक उन परिस्थितियों का एक सुंदर-सा नाम दें


उपन्यासः ईंधन

उपन्यासकार : स्वयं प्रकाशप्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 200

कीमत : तीन सौ पच्चीस

वंश युद्ध

वंश युद्ध
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पिता का आखिरी दौर! 
शुरू होती है पुत्रों के बीच खींचतान 
पिता की खाली जगह भरने की होड़। 
पिता की जगह जब सिकुड़ने लगती है
पुत्र उस जगह को भरने के लिए बेताब होता है! 
इस तरह शुरू होता है वंश युद्ध! 
प्रकट होते हैं शकुनि कृष्ण और भी सारे
होती है चर्चा नीति न्याय की और भी बहुत कुछ 
मगर वंश युद्ध होता ही है, 
विनाश के पहले रुकता नहीं है वंश युद्ध 
ऐसे ही हुआ था महाभारत
उदाहरण इतिहास के भी पन्नों पर हैं!

पिता अंधत्व का शिकार होता है 
होता ही है अंधत्व का शिकार 
होता ही है वंश युद्ध! 
छोटा-बड़ा जैसा भी हो
मगर होता है अनवरत वंश युद्ध! 

तब पिता जीवित थे

तब पिता जीवित थे
वे नादानी के दिन थे
हिंसक पशु के दांतों की चमक से डर नहीं लगता था
लगता था ये डराने के दांत हैं, काटने के नहीं 
भवितव्य का डर नहीं था
जाने किस बिंदु पर पहुंच कर 
नादानी कम होने लगी
समझदारी बढ़ने लगी
परिस्थिति बदलने लगी
जब अपने हिस्से में भविष्य कम बचा है
भावित का डर बढ़ रहा है 
घर बचा सकता है डर से 
मकानों के बीच अगर 
बचा सके हम घर
बची रहे पृथ्वी बचा रहे घर
अब प्रार्थना में हो यह एक स्वर
एक अनुस्वर

मदद लो, मदद दो

मदद लो, मदद दो


अब मैं अपनी जिंदगी में क्षमता के आखिरी पड़ाव के करीब हूँ। जिंदगी कैसे जीया, क्या जीया, किन रास्तों से गुजरा, लेखक बनने की हसरत में किन मुकामों पर पहुँचने के लिए ठाम-कुठाम की यात्रा की, यह एक लंबी कहानी है। फिलहाल उस में उलझने और उलझाने का यह अवसर नहीं है, न दिलचस्पी है। मेरी जिंदगी में एक महत्वपूर्ण शब्द सदा सक्रिय रहा है और वह शब्द है मदद। मदद लो, मदद दो। बिना मदद के जिंदगी नहीं चलती है किसी की भी। कोई-न-कोई हमारी मदद के लिए हाथ बढ़ता है और किसी-न-किसी की मदद के लिए हम हाथ बढ़ाते हैं। महत्वपूर्ण यह कि किसी से मदद लो तो उस पर एक दम से लद न जाओ, बोझ न बन जाओ, इसी तरह किसी की मदद करो तो उसे अपने पर बोझ न बनाओ, न बनने दो, न उसे अपने ऊपर लादो और न लदने दो। राह दिखाया, तो आगे चल एक प्रसिद्ध मुहावरा है। लद जाना या लाद लेना सहज मानवीय प्रवृत्ति है। हर सहज मानवीय प्रवृत्ति की तरह इस प्रवृत्ति में सायास संतुलन की जरूरत होती है, इस संतुलन को बनाये रखने के लिए हमेशा सावधान और अंतःसक्रिय रहने की जरूरत होती है। मैं कितना संतुलन साध पाया कहना मुश्किल है, सच कहूँ तो साध नहीं पाया, बस लड़खड़ाते पार किया।
पश्चिम बंगाल में, खास कर कोलकाता में समारोहपूर्वक रक्तदान का सामाजिक प्रचलन रहा है। कोलकाता में रहते हुए नियमित रक्तदान को मौका मिलता था। एक समय आया जब रक्तचाप और थॉयराइड की समस्या उभर कर स्वास्थ्य का साथी बन गई। डाक्टरों ने रक्तदान के अयोग्य घोषित कर दिया। मन बहुत दुखी हुआ। सीख मिली, सिर्फ चाहकर ही किसी की मदद नहीं की जा सकती है। मदद करने के लिए चाहत होने के साथ सक्षम होना भी जरूरी है।
नौकरी से आमदनी का स्रोत कुछ-न-कुछ तो आर्थिक क्षमता प्रदान करता ही था। अब रिटायर होने में एक महीना का समय भी भी नहीं है। हाँ, आखिरी वेतन मिलना बचा है। रिटायरमेंट के बाद जो मिलता है उसके बिलाते बहुत देर नहीं लगती है। ऊपर से बढ़ती हुई महगाई, घटती हुई क्रय-क्षमता, कठोर होती आर्थिक नीतियाँ, संवेदना-शून्यता का बढ़ता दायरा अपनी जगह। डर है कि जिंदगी कहीं बोझ न बन जाये! भरोसा है, ऐसा नहीं होगा। भरोसा वस्तुनिष्ठ परिप्रेक्ष्य में एक आत्म-निष्ठ बोध या एहसास होता है। बस इस एहसास से डर लगता है।
किसी के सीखने-समझने के लिए इस में कुछ नहीं है, बस समझा जाये कि कह रहा हूँ। शेष फिर कभी। और लक्ष्य! जी हाँ, लक्ष्य तो है! बस लक्ष्य के सदस्यों के लिेए यह शायद ही किसी काम का हो।

विवेक

ज्ञान और बोध में अंतर है। विवेक ज्ञान को लोकहितकारी परिप्रेक्ष्य में संतुलित और सक्रिय करता है।इस संतुलित और  सक्रिय मति में बोध का जन्म होता है। इसलिए विद्यापति ने कहा था सहज सुमति वर दिअ हे गोसाउनि। ज्ञान को संचालित करनेवाले और भी तत्त्व हैं, उन पर फिर कभी। अभी तो इतना ही विवेकहीन ज्ञान विध्वंस की पटकथा बुनता रहता है। बुद्ध को बोध प्राप्त हुआ था, इसलिए उस जगह को बोध गया कहा जाता है, ज्ञान गया नहीं। पहले विवेक। 

तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा

बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।

विवेक का जन्म सत्संग से होता है। विवेक से मोह और भ्रम दूर होता है, मोह (अपने पराये की प्रतीति) और भ्रम (राम के नहीं बल्कि खुद के कर्त्ता होने की प्रतीति)। मोह और भ्रम के दूर होने से विवेक प्नराणवंत होता है - 
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।
हमारे जैसे लोग सदा अपराध बोध से संपीडि रहते हैं। अपराधबोध सुमति के संतुलन को क्षरित करता है। विवेक विहीन ज्ञान विध्वंस की ओर लपकता है। 
साधु की संगति अपराधबोध को कम कर देती है- 

एक घड़ी आधी घड़, आधी की पुनि आध, तुलसी संगत साधु की छमहिं कोटि अपराध।

अपराधबोध के कम होने से शुद्ध बोध का जन्म होता है। जिस व्यवस्था में अपराधबोध को कम करने की गुंजाइश कम या नहीं होती है वह व्यवस्था अपना मानवीय व्यवहार खोने लगता है। अभी इतना ही, शेष फिर कभी... 

ज्ञान की आँधी

जब ज्ञान की आँधी चलती है। प्रेम निकृष्टतम अर्थ में संकुचित हो जाता है। निकृष्ट स्वार्थ शक्ति को अपने व्यवहार के लिए अधीनस्थ कर लेता है। राम की शक्तिपूजा में महाप्राण निराला कहते हैं - है जिधर अन्याय, है उधर शक्ति! पश्चिमी सभ्यता में शक्ति का संबंध ज्ञान से जोड़ा गया कॉनेलज इज पावर। इच्छित परिणाम के हासिल होने का संबंध शक्ति से जोड़ा गया। कॉनेलज पावर और रिजल्ट के चमत्कार से चौंधियाने की तरफ बढ़ता रहा है। प्रसंगतः, आज यूक्रेन में ज्ञान की आँधी चल रही है। 
भारत में मूल्य स्थिति भिन्न रही है! इस भिन्न स्थिति पर फिर कभी। 

उधो, माधो

न उधो का लेना, न माधो का देना प्रसिद्ध लोकोक्ति है। इस लोकोक्ति का प्रयोग लोग तटस्थता और बेलाग (बाय स्टेंडर एक सिंड्रोम ) स्थिति के लिए करते हैं। इसके मूल संदर्भ को देखने पर प्रसंग का संकेत कुछ अन्य है।
प्रसंग पर गौर किया जाये। माधव यानी कृष्ण के बहुत गहरे मित्र थे उद्धव। उद्धव ज्ञानमार्गी थे। कृष्ण प्रेममार्गी। अक्सर कृष्ण कहा करते थे कि सर्व स्वर्ण की बनी द्वारिका, गोकुल की छवि नाहीं। उद्धव इसे कृष्ण का प्रलाप मानकर ज्ञान देते थे और गोकुल के छूट जाने की आँच को कम करने की कोशिश करते थे। एक दिन कृष्ण ने उद्धव से कहा जाइये और गोपियों को समझाइये। जब उद्धव गोपियों को ज्ञान देने के लिए गोपियों से मिले तो गोपियाँ असमंजस में पड़कर एक दूसरे को सावधान करने लगी कि न उधो का लेना, न माधो का देना! अर्थात प्रेम ज्ञान से विस्थपनीय नहीं है। जब भी ज्ञान प्रैम को विस्थापित करता है, क्षमा, दया, तप त्याग मनोबल आदि को मनोरम बनानेवाली मूल्य शृंखला को तहनहस कर देता है।
कबीरदास ने भिन्न प्रसंग में सावधान किया, साधो चली ज्ञान की आँधी! ज्ञान की आँधी पर फिर कभी। 

सोने पर सोहाग

मेरे मन में जिज्ञासा रही है। थे ढेर सारे धनवान। सुदामा गये सिर्फ कृष्ण के पास! क्या इसलिए कि छात्र जीवन के मित्र थे! यह पर्याप्त नहीं लगता। इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखना चाहिए। बाकी सभी धनवान उन्हें सोना तो दे सकते होंगे। सौभाग्य सिर्फ कृष्ण दे सकते हैं। कृष्ण से सोना और सौभाग्य दोनों मिला। सौभाग्य ही सोहाग या सोहागा के रूप में लोक प्रचलित हुआ। सोने पर सोहागा लोकोक्ति यहीं से निकली और आज तक प्रचलित है। बिना सौभाग्य के सोना शुभ नहीं। सोना मिलने के कई स्रोत हो सकते हैं, सौभाग्य का स्रोत एक ही होता है और वह स्रोत ईश्वर होता है। ध्यान में रखना जरूरी है कि ईश्वर के कई रूप होते हैं। इसी कारण हिंदू लोकमानस सदैव बहुदेववादी रहा है। कथाऔर भी है किंतु अभी इतना ही। शेष फिर कभी।
आप का दिन शुभ हो। 
सादर 

पूर्वग्रह संचालित समाज:क्या हम एक असंभव दौर से गुजर रहे हैं!

पूर्वग्रह संचालित समाज:
क्या हम एक असंभव दौर से गुजर रहे हैं! 
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल जिसे जनता की चित्तवृत्ति कहते हैं वह असल में पूर्वग्रहों के समुच्चय या setसे बनती है। पूर्वग्रह धारणाओं (या perceptions) को बद्धमूल बनाती है और फिर धारणाएं भी पूर्वग्रह बनाती हैं, इनमें प्रतिक्रमिक (या vice-versa) कार्य-कारण (या causative) सापेक्षता संबंध (या relative connectivity) होता है। इसी तरह से प्रतिबद्धताओं और जड़ीभूत संवेदनाओं का के समुच्चय भी बनते-बदलते रहते हैं। तात्पर्य यह कि हर युग के अपने पूर्वग्रह, अपनी पूर्वमान्यताएँ (या postulates) विभिन्न अवसरों पर सक्रिय होती रहती हैं। ये सारी प्रक्रियाएँ और परिस्थितियाँ हमारे युग की भी है। ये सारी प्रक्रियाएँ प्राकृतिक क्रम में विकसित होती रहती हैं और समुदायों एवं समाजों पर वर्चस्व की आकांक्षाओं से संपीड़ित समूह भी इसमें सायास और बलपूर्वक शामिल होता है। इस प्राकृतिक-प्रक्रिया को दुष्चक्र से बाहर निकलने, संतुलित करने और सामाजिक सामंजस्य-समरसता बनाये रखने के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप की बौद्धिक जरूरत होती है। इस पूरे चक्र को समझना अपने समय को समझना है तथा इस ब्यूह में अपनी भूमिका को समझना खुद को समझना है। अपने को और अपने समय को समझना हमेशा बड़ी चुनौती होती है। इस चुनौती का मुकाबला पूर्ण सकारात्मकता के साथ करना कठिन तो होता है परंतु, असंभव नहीं। आज खुद से सवाल है, क्या हम एक असंभव दौर से गुजर रहे हैं!

गुजर जाने के बाद

गुजर जाने के बाद

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गुजर जाने के बाद

अपने बचपन को याद करता हूँ,

जो अब सिर्फ यादों में बचा है थोड़ा-थोड़ा

और जो अब लौटकर फिर नहीं आनेवाला

पिता कभी-कभार बुदबुदाते हुए याद आते हैं,

साँप गुजर गया और हम लकीर पीटते रहे

साँप भी नहीं लौटता अपनी छोड़ी हुई लकीर पर

कटोरा समाने लहराते हुए किसी फिल्म का गीत याद आता है

गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा, गजब की कशिश

कशिश मुहब्बत की भी, यौवन की भी

एक पल, एक दिन में कोई नहीं गुजरता है, कुछ भी नहीं गुजरता है!

पता ही कहाँ चलता है कि कैसे पल-पल हम सभी गुजर रहे होते हैं

गुजर रहे होते हैं, न लौटने, कभी न लौटने की स्थिति सामने है और

हमें खबर ही नहीं कि गुजर रहे होते हम पल-प्रति-पल!

गुजर जाने के बाद सिर्फ गुजरे हुए की याद लौटती है बार-बार लौटती है

गुजरा हुआ कभी किसी रूप में नहीं लौटता है, न उसके इशारे लौटते हैं

वक्त! वक्त  ताकतवर होता है, ताकतवर तो कठोर होता ही है

फिर भी वक्त पर कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता

माँ! माँ तो बहुत ममतामय होती है, ममता तो होती ही है बहुत कोमल

गुजर जाने के बाद,

माँ की भी सिर्फ याद आती है, माँ का कोई इशारा भी कहाँ आता है!   

कोई इशारा नहीं आता माँ का!   

गुजर जाने के बाद

अपने बचपन को याद करता हूँ।

 

और भी मनोरथ हैं, सुंदर सुखद जाल के इतर

 
और भी मनोरथ हैं, सुंदर सुखद जाल के इतर: मतलब हाँ भी ना और ना भी हाँ! 
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कल शाम तक सब कुछ ठीक था। चिड़ियों में बहस बहुत तीखी थी, स्वाभाविक से थोड़ी-सी अधिक तीखी। मुक्ति के मुहानों की तलाश पर बहस हो रही थी। 
मुझे क्या करना था! मैं तो मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण आदि की गूँजों-अनुगूँजों से भरी सभ्यता-संस्कृति की इस धरा-धाम पर इन सबसे निरपेक्ष रहने में अपने भले की राह तलाश चुका हूँ और लगभग संतुष्ट हूँ। लगभग इसलिए कि पूर्ण कुछ नहीं सब लगभग है। यह लगभगाई दौर है। 
मंत्र पुराना है, अर्थात मध्य-वर्ग : मज्झम निकाय! मतलब हाँ भी ना और ना भी हाँ।
सुबह का नजारा काफी उत्तेजनापूर्ण था। शाम को जो बहस जाल और जंजाल से मुक्ति के मुहानों की तलाश पर थी, सुबह तक वह जाल के कलात्मक सौंदर्य के बखान तक पहुँच चुकी है। एक-से-बढ़कर एक बखान! बखान कि कौन-सा जाल कितना मनोरम है और कौन-सा जाल किसके मनोरथ का हिस्सा है। 
निष्कर्ष तक पहुँचने में अभी देर लगेगी। स्वीकार करूँ कि निष्कर्ष में मेरी दिचस्पी बढ़ती जा रही है। दिलचस्पी अपनी जगह, जरूरतें अपनी जगह। वैसे, और भी मनोरथ हैं, सुंदर सुखद जाल के चयन के इतर।


सृजन के संगी

सृजन के संगी

परिवार में शिक्षा की नैसर्गिक आकांक्षा तो थी, लेकिन सायास सचेतनता नहीं थी। पैदल पहुंच में स्कूल (राजेंद्र उच्च विद्यालय, जारंगडीह) कॉलेज (कृष्णवल्श्वलभ महाविद्यालय, बेरमो) थे, सो लोकलाज के अदृश्य दबाव से बीए तक की शिक्षा कोलियरी के बातावरण में बीए तक की शिक्षा मिल गयी। असली चुनौती पीजी पार करने की थी। निजी और पारिवारिक कारणों से तत्काल रोजगार पहली जरूरत थी। राँची विश्वविद्यालय का छात्र था। अपने-अपने अध्ययन अहंग कैलास पर अवस्थित अध्यापकों के नाम याद हैं। लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी। निजी जरूरत और अकादमिक अनाकर्षण ने रोजगार की ओर अधिक तेजी से उन्मुख कर दिया। रोजगार मिल गया। अकादमिक दुनिया को अलविदा कहने का मौका मिल गया। अध्यापक बनने का मौका, मोह तो था ही नहीं, छोड़ना अच्छा नहीं रहा। अध्यापक को जीवन में हजारों युवा का साहचर्य मिलता है। अध्ययन उनके लिए धर्म भी होता है और कर्म भी। तात्पर्य पढ़ने पढ़ाने, उसी से रोजगार पाने के लाभ का अवसर मिलता है। सृजनशील अध्यापकों को सृजन के संगी और साक्षी दोनों मिल जाते हैं। अकारण नहीं है कि कम-से-कम हिंदी साहित्य की सृजन भूमि के अधिकांश पर अकादमिक लोगों की दमक और धमक है। 

सृजन और शिक्षण में गहरा संबंध होता है। सृजन करते हुए मनुष्य सीखता है। सीखते हुए मनुष्य सृजन करता चलता है। सृजन और शिक्षण कभी अकेले नहीं होता है। उत्कृष्ट सृजन उत्कृष्ट शिक्षण का और उत्कृष्ट शिक्षण उत्कृष्ट सृजन का अवसर पैदा करता है। रूपक में कहें तो अच्छे छात्रों के बीच शिक्षक की उत्कृष्टता बनती रहती है और अच्छे शिक्षक से शिक्षा पा कर छात्र उत्कृष्ट होते चलते हैं। सह-सृजन और सह-शिक्षण में कार्य-कारण श्रृँखल संबंध होता है। सृजन और शिक्षण  सह-संभवा सामाजिक प्रक्रिया है। यहाँ, समाज और भीड़ के एक अंतर को याद रखना जरूरी है। समाज में व्यक्ति का, या कह लें एक का अनेक से, अभिन्न स्तरों पर दीर्घकालिक और बहुआयामी सचेत संपृक्ति या जुड़ाव होता है। भीड़ में एक का अनेक से एकल स्तर पर अल्पकालिक एक आयामी और अचेत जुड़ाव होता है। समाज से सृजन और भीड़ से संहार का अभिन्न संबंध होता है। समाज-तत्त्व घटता गया तो सृजन की संभावनाएँ भी घटती गई, भीड़-तत्त्व बढ़ता गया तो संहार की आशंकाएँ भी बढ़ती गई। समाज के भीड़ में बदलते जाने की चुष्चक्रीय-प्रक्रिया को सृजन ही थाम सकता है।

एक का किसी दूसरे के संपर्क में आने पर समाज बन जाता है, इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि समाज-तत्त्व ही एक का दूसरे से अभिन्न स्तरों पर दीर्घकालिक और बहुआयामी सचेत जुड़ाव का समवायी या सहकारी अवसर बनाता है। शिक्षण कर्म की ही तरह, साहित्य सृजन भी सह-संभवा सामाजिक प्रक्रिया है। अन्य सृजन की तरह ही, साहित्य भी अकेले-अकेले नहीं सिरजा जा सकता है। सृजन के लिए सर्जक को सक्रिय (Active नहीं, Cre-active) या निष्क्रिय (Inactive नहीं, Passive), गोचर या अगोचर सह-सृजक (Co-creator) जरूरी होता है। सह-सृजक आलोचनात्मक संवाद और संवेद संपन्न दोस्त या प्रेमी-प्रेमिका हो सकता है। बस रूपक के तौर पर, अभिसार में जैसी भूमिका दूती की होती है सृजन में वैसी ही भूमिका सह-सृजक की होती है। संगी न हो तो सृजन कहाँ संभव! वे धन्य थे जिन्हें सृजन-संगी मिले और उनके माध्यम से बेहतर साहित्य संभव हो सका। अब ऐसा धन्य-भाग कहाँ!  

नमस्ते जीवन!

प्राकृतिक संयोग की दास्तान और
जीवन की रूढ़ पारिस्थितिकी
साथ-साथ चलती रहती है! 
कभी-कभी इस कदर भी कि
शक्ति के मातृरूप में संस्थित होने का दिन 
मातृभूमि पर मातृहीन होने का दिन बन जाए! 

होता है कुछ इस कदर भी कि 
संवेदनशील होने की आकांक्षा का 
समापन संवेदन शून्यता में जाता है! 

मन समझे तो अच्छा! 
मन सम्हले तो अच्छा! 
जीवन में सृजन भी अच्छा! 
जीवन में विसर्जन भी अच्छा! 
रही बात दिन की
सभी दिन समान होते हैं! 
बात दीगर कि 
सब दिन होत न एक समान! 

अब! 
आगे की सुधि लेना ही जीवन है! 
नमस्ते जीवन! 

बिसर गया

उसने कहा बिसर जाइए
सब कुछ बिसर गया

चोटिलताओं के साथ चलता रहा
ऑटो मिला पैदल चलने को बिसर गया 

रेल मिली, शायिका मिली
जागरण बिसर गया

हवाई जहाज ने सब कुछ बिसरा दिया
अपनी जमीन भी बिसर गयी

हजार रूप होते हैं जंगल के
एक जंगल कटता गया
एक जंगल पसरता गया
इस तरह सब बिसरता गया 
याद बस इतना रहा
किसी काम का नहीं 
किसी के काम का नहीं!
क्या यही है जिंदगी! 
क्या यही होती है जिंदगी
बिसरों का याद रखना! 

जाने क्यों

जाने क्यों मन मचलता है
जाने क्यों दिल नहीं लगता है 
कैसी बही बयार
मन का पाल नहीं खुलता है 
रेत-ही-रेत नदी में जाने क्यों
अब इधर से पानी नहीं बहता है 
सूरज तो वैसे ही
उठता है, ढलता है 
अंधेरा आराम से टहलता है!
वक्त कभी इस तरह भी बदलता है! 

सिर और मुकुट

धीरे-धीरे सिर छोटा होता जाता है। 
धीरे-धीरे मुकुट बड़ा होता जाता है। 
फिर मुकुट चेहरे पर उतर आता है।
मुकुट मुखौटा बनकर रह जाता है। 
मुकुट मुखौटा कवच न बन पाता है।
वक्त न तो मुकुट देखता है न मुखौटा

रैपर

रैपर चमकीला है
आक्रामक रूप से आकर्षक
 खरीदे जाने के लिए प्रस्तुत 

रैपर जैसा भी हो
कनटेंट की चाहत
रैपर के फटने की कथा लिखती है

रैपर तो अंततः फटता ही भद्रे

और तेरा मन! तेरा मन

और तेरा मन! तेरा मन!
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धरती कसमसा उठती है
नदियों का मुँह खुल जाता है 
पर्वत सिहर उठते हैं
डालियों में लचक लौटती है खनक के साथ 
दूब भीतर से हरियर होने लगती है
जब कभी उमड़ता है बादल

समुद्र तो बहुत बड़ा है
पता नहीं वहां क्या होता है 
जब कभी उमड़ता है बादल 

पर्यावरण सरस निर्मल 
अपने नितांत में कुहक उठता है मन
चिड़ै-चुनमुन की फुदक! आह क्या बात है!
अदहन गरम होने लगता है
और तेरा मन! तेरा मन। 
जब कभी उमड़ता है बादल। 

सपना में भगवान

सपना में भगवान

गजब हो गया। गजब कि सपना में आये। जी सपना में आये भगवान। पहले तो यकीन नहीं हुआ। फिर हुआ कुछ ऐसा कि यकीन तो करना पड़ा। यकीन इसलिए करना पड़ा कि मेरी कुछ बातों की खबर उन्हें थी, ऐसा उन्होंने इशारा-इशारा में जाहिर कर दिया। पहले तो मुझे लगा कि यह डाटा चोरी या साफ कहें तो निजता में सेंध का मामला हो सकता है। मन विचलित हो गया। भगवान के अलावा अन्य कोई किसी की निजता को इतने अविकल रूप में कोई जान ही नहीं सकता! प्रभु के अलावा कोई दूसरा अंतर्यामी तो हो नहीं सकता। सोचा तो इस तरह भी जा सकता है कि की प्रभु बनाई निजता की किलेबंदी को प्रभु के अतिरिक्त इतनी सफाई से कोई अन्य भेद ही नहीं सकता है। इस तरह सोचते हुए मुझे लगने लगा कि हो न हो यह ईश्वर का ही कोई-न-कोई संस्करण ही हो सकता है। पुराने संस्करण के भगवान के प्रति नास्तिकाना नजरिया रखना अलग बात है लेकिन इस नव अंतर्यामी भगवान को नकारा नहीं जा सकता है। मैं सोच ही रहा था कि भगवान ने मुस्कुराकर कहा कि नास्तिकता पर सोच रहे हो? इस पर इतना मत सोचो बालक! पता है कि तुम नास्तिक हो। तुम्हारी नास्तिकता के खंडित होने की बात किसी को न कानो-कान खबर होगी, न आँखों-आँख जाहिर होगी। मेरी बात सुनो। बहस में मत पड़ो जो माँगना हो जल्दी से माँग लो अपने लिए, जमात की बात करो।

- माँग लो, मौका है।

- सोचा नहीं प्रभु।

- सोचने-समझने में वक्त मत जाया करो। सोचना-समझना गये जमाने की लत है। जल्दी माँगो ... क्या दूँ!

-  मैं ने कहा प्रभु! नत मस्तक हूँ। आपके पास देने को बहुत है जो चाहे दे दें। बस अपना अहंकार न देना।

- दुष्ट मेरे अहंकार की बात करता है!

मैं माफी माँगने के लिए झुका तो झुकता ही चला गया। इतना झुका कि सपना टूट गया। हे प्रभु, इस टूटे सपना को कहाँ रखूँ!  

अनुभव और स्मृति

जीवन बहुत विचत्र है। अतीत की घटनाओं के साथ कई मधुर, तो कई कटु और दुखदाई अनुभव भी जुड़े रहते हैं। जो अनुभव कटु और दुख भरे होते हैं वे भी स्मृति में मधुर बनकर ही सुरक्षित रहते हैं और बार बार दिमाग पर दस्तक देते हैं। हमें भी चाहिए कि अतीत के कटु और दुख भरे अनुभव को उनके स्मृतिजन्य मिठास ग्रहण करने की कोशिश करें। कटु और दुख भरे अनुभवों के स्मृतिजन्य मिठास में जीवन का आनंद छिपा रहता है। इस आनंद को हासिल करना एक कला है। 

न थी

भाषा बेजुबान और आंख इतनी बेआवाज़ तो पहले न थी
हालात जैसे भी थे चेहरे पर मुस्कान इतनी नाकाम न थी
सड़क पर इंतजाम, इतना कुछ उसकी जिंदगी में भी न था
फलसफा बेआबरू कि जंग में शामिल मेरा गांव क्यों न था! 



बेखबर नदियाँ रहती हैं, शायद

बेखबर नदियाँ रहती हैं, शायद!
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समुद्र ठहरा दिखता है
मगर आंतरिक गतिमयताओं और हलचलों
को तो वही जानता है न! 
किस नदी की किस धारा के इंतजार में
ज्वार भाटा के आलिंगन में
पछाड़ खाता है
समुद्र जानता है
और जानता है थोड़ा थोड़ा चाँद भी!

समुद्र में न निर्माल्य विसर्जित होता है
न अस्थिकलश न राग न द्वेष
समुद्र में सिर्फ़ नदियों को
विसर्जित होने की अनुमति होती है।

ताकि नदियाँ बादल बनें
चाँद से खेलें मुक्त मनोभाव 
और टूटकर बरस जायें धरती पर
धरती के नवसृजन
नव शृंगार का संदेश बनकर
धरती की पर्वतमाला पर
मेखला का वैभव बनकर! 

यह कैसे होता है!
समुद्र को पता है।
पता चाँद को भी है। 
बेखबर नदियाँ रहती हैं, शायद! 
गति और गीत के नाद में!

खोई और मचलती हुई!
सृष्टि ऐसे ही चलती है
मेरी जान, ऐसे ही।

पुनर्परिभाषा का दौर

करोना का कहर हमारी समझ के कई महत्वपूर्ण संदर्भों की पुनर्परिभाषा के लिए हमें उकसा रहा है। इनमें एक महत्वपूर्ण संदर्भ है आजादी। आज आजादी को भी पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। आजादी की यूटोपिया को समझने और निरस्त करने का दौर ये हो सकता है। गांधी जी ने अंतिम आदमी की सामग्रिक स्थिति से जोड़कर देखा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आजादी के सपने को इस तरह समझा कि जहाँ चित्त भय शून्य हो, माथा ऊँचा हो, ज्ञान मुक्त हो। 
नागार्जुन. मुक्तिबोध. रघुवीर सहाय आदि ने आजादी के यथार्थ को भिन्न तरह से देखा। 
अंग्रेजी में एक शब्द है independence जिसे हम सामान्यतः आजादी कहते हैं, हालांकि आत्मनिर्भरता अधिक करीब है। अंग्रेजी में एक शब्द है liberation जिसे हम सामान्यतः मुक्ति कहते हैं, हालांकि उदारता अधिक करीब है। 
आजादी, आत्मनिर्भरता, मुक्ति के और उदारता सभी सापेक्षिक अवधारणाएं हैं। 
गुलामी क्या है! कुछ संकेत तो ज्योतिबा फूले की किताब गुलामीगिरी से मिल जायेंगे। बाहरी आजादी या external independence इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह आंतरिक मुक्ति internal liberation को सुनिश्चित करती है।
internal liberation या आंतरिक मुक्ति का अभाव external independence को प्रश्नांकित करती है, चुनौती देती है। यह चुनौती खतरनाक हद तक पहुंचे, इसके पहले समय रहते, इन्हें यथार्थ के आइने में पुनर्परिभाषित कर नये सपनों के आकाश में इंद्रधनुष रचने की जरूरत को समझना होगा। 



वक्त बदलने का मतलब

कल 'पर बरहमन झूठा है : कोलकाता में कोलख्यान' की सोलहवीं कड़ी पर फेसबुक रूबरु (लाइव) पर Hitendra Patel भी हमारे साथ रहे। उन्होंने वक्त बदल रहा है को थोड़ा और साफ करने की जरूरत की ओर इशारा किया। इस सक्रिय भागीदारी के लिए मैं उनका आभार मानता हूँ। इस प्रसंग पर भी आज शाम रूबरु में शाम 07.00 बजे संभव हुआ तो चर्चा की जायेगी।
फिलहाल, तो यह कि
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जिस क्रम में वस्तु का निवास होता है उसे स्थान कहते हैं।जितनी देर में धरती सूर्य की परिक्रमा पूरी करती है, उसे हम 24 घंटा में बाँटकर एकत्र 
करते हैं, यह प्राकृतिक
समय है।
जितनी देर में हम किसी काम को कर लेते हैं वह हमारा व्यक्तिगत वक्त होता है। अब दो व्यक्ति एक काम को संपन्न करने में अलग-अलग समय लगा सकते हैं। इससे उनके 
वक्त में अंतर को समझा जा सकता है। काम का संपन्न होना सामूहिकता 
 पर निर्भर होता है। व्यक्तिगत
वक्त समूह के अधीन होता
है। कई बार इसे वर्क इनवायारामेंट और वर्क
कल्चर के रूप में हम समझते हैं। काम और उपभोग के अवसर और आधिकारिकता
(इंटाइटेलमेंट, संदर्भ अमर्त्य 
कुमार सेन) की स्थिति पर
वक्त का अच्छा या बुरा होना
निर्भर करता है। जिसके पास
यह अवसर और आधिकारिकता जितना अधिक होती है, उसका
वक्त उतना अच्छा होता है। काम के अवसर और आधिकारिकता का सामान्य रूप से व्यापक अभाव, सामान्य और व्यापक रूप से समय का खराब होना है। वक्त के बदलने का मतलब
क्रिया की संपन्नता में बदलाव
की प्रक्रियाओं में बदलने से
होता है। इसमें वर्क कल्चर
को जोड़कर विचार करें तो
काम के अवसर और उपभोग
के अवसर की जटिलताओं में
होनेवाले बदलाव से भी समझा
जा सकता है। इस तरह से हम अपने वक्त में बदलाव को समझ सकते हैं। औकात असल में वक्त का बहुवचन है। और वक्त!
वक्त काम और उपभोग के 
अवसर से जुड़ा है। काम और उपभोग के अवसर और आधिकारिकता का बदलना, औकात का बदलना है। काम और उपभोग के अवसर में असामंजस्य और असंतुलन वक्त को खराब बना देता है। 
हमारा वक्त कैसा है!
फैसला आप कर सकते हैं। वक्त के बदलने का मतलब
क्रिया की संपन्नता में बदलाव
की प्रक्रियाओं में बदलाव से
होता है। इसमें वर्क कल्चर
को जोड़कर विचार करें तो
काम के अवसर और उपभोग
के अवसर की जटिलताओं में
होनेवाले बदलाव से भी समझा
जा सकता है।

करोना की सीख और सलाह

करोना का कहर जारी है। पूरी दुनिया इससे अपने-अपने तरीके से बचाव में लगी हुई है। हमारी सरकारें भी यथासंभव सूझबूझ से निपट रही है। एक बात जो साफ-साफ नजर आ रही है वह यह कि नजरिया हमारा चाहे जो हो, कुछ मामलों में, खासकर असंगठित आबादी और दिहाड़ी मजदूरों के बारे में, स्पष्ट नीति निरुपण की तत्काल जरूरत है। 
करोना की सीख हमारे राज्यों की आंतरिक सीमाएं इतनी निष्प्रभावी नहीं हैं, जितनी वे अपनी सुप्तावस्था में अब तक लगती रही हैं। 
निवासीयता के साथ ही रिहाइशीयता का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। निवासीयता पर रिहाइशीयता भारी है। निवासीयता भले भारतीय हो, रिहाइशीयता अपने-अपने राज्यों, जिलों और पंचायतों की है। 
रोजी-रोटी की तलाश में अपने राज्य, जिला और पंचायत से बाहर जानेवालों का संबंधित ब्यौरा, यथाप्रसंग, राज्य, जिला, पंचायत के पास प्रामाणिक तौर पर रखा जाना जरूरी किया जाना चाहिए। राज्य से बाहर अपने मानव संसाधन के नियोजन से मुनाफा की एक निश्चित राशि को राज्यों के खजाने में जमा किया जाना चाहिए। इस राशि का इस्तेमाल राज्य से बाहर नियोजित मानव संसाधन की सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए किये जाने का प्रावधान किया जाना चाहिए। 
दिहाड़ी मजदूर को हम निकृष्टतम अर्थ में प्रवासी या बाहरी मान चुके हैं तो उसकी रिहाइशीयता के संदर्भ को अधिक जीवंत और प्रभावी बनाया जाना जरूरी है। संबंधित श्रम कानूनों को श्रमिक अधिकार, मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए। 
विपत्ति कभी भी और किसी भी रूप नाम से आ सकती है, हमें अपने संदर्भों को समय रहते पुनर्गठित करने के लिए तत्पर होना चाहिए। एक नागरिक की यह सहज चिंता है और इसका सिर्फ सामाजिक परिप्रेक्ष्य है। 

प्रेमचंद की कहानी - नशा

हो सके तो, ऐसे साहित्यकारों की अदृश्य होती स्थिति और लुप्त होती निर्मिति में अपनी अदृश्य भूमिका को पहचानने और समझने की कोशिश कीजिए। 

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प्रेमचंद की एक कहानी है नशा। नशा का नैरेटर समतामूलक विचार और समाज का पैरोकार है। जमींदार परिवार से आये अपने सहपाठी के सामंती व्यवहार के लिए उसे कोसता रहता है। एक बार वह सहपाठी जमींदार के साथ उसके गांव जाता है। इस शर्त के साथ कि उसे वहां कुछ दिन के लिए जमींदारी परिवेश के अनुरूप आचरण करना होगा। इस शर्त का पालन करने के क्रम में वह सत्ता के नशे में जीने लगता है। लौटते समय रेल सफर में एक हादसा होता है। वह एक ग्रामीण यात्री के साथ अमानवीय आचरण कर बैठता है। उसके बाद, एक सहयात्री ग्रामीण बोला- "दफ्तरन माँ घुसन तो पावत नहीं, उस पर इत्ता मिजाज!

ईश्वरी ने अंग्रेजी मे कहा- What an idiot you are, Bir! (बीर, तुम कितने मूर्ख हो !) और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।" इस

नशा कहानी की याद आ गई तो मैं ने सिर्फ याद दिलायी है, कहानी के साथ सफर कोई अकेले करे तो बेहतर। 

नवाबराय के नाम से लिखने वाले व्यक्ति धनपतराय श्रीवास्तव ने अकेले प्रेमचंद नामक लेखक का उपार्जन किया था! नहीं इसके पीछे दयानारायण निगम की भूमिका थी। प्रेमचंद और दयानारायण निगम बहुत गहरे मित्र थे। नवाबराय के नाम से लिखनेवाले धनपतराय श्रीवास्तव को प्रेमचंद नाम दयानारायण निगम ने ही सुझाया। 

दयानारायण निगम कानपुर से निकलनेवाली जमाना नाम की उर्दू पत्रिका के संपादक थे। प्रेमचंद की पहली कहानी 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन' पहली बार इसी जमाना में छपी थी। जमाना में ही पहली बार इक़बाल की रचना, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा, भी छपी थी। दयाराम निगम के साथ प्रेमचंद का सघन और गहन पत्राचार भी होता था, जिसका अधिकांश अब प्रकाशित है। 

दयानारायण निगम के पीछे भी कोई व्यक्ति, कोई प्रेरणा रही होगी। मूल बात यह कि कोई दयानारायण निगम न हो तो किसी धनपतराय श्रीवास्तव का प्रेमचंद में कल्पातंरण कैसे हो! यों ही नहीं लेखक बनता है। लेखकों की बनक के पीछे झांकिए तो पता चलता है कि इतिहास के गत्तों में गुम हो जाने की शर्त पर भी समाज को गुमराह करनेवाली शक्तियों से बचाने के लिए दयानारायणों की कैसी अदृश्य भूमिका सक्रिय रहती है। अब तो प्रेमचंद की भूमिका भी अदृश्य होती दिख रही है। अचंभा होता है कि जिस हिंदी समाज के पास प्रेमचंद और उन जैसे कई साहित्यकार हैं वह समाज इतना भाव विपन्न कैसे हो सकता है! हो सके तो, ऐसे साहित्यकारों की अदृश्य होती स्थिति और लुप्त होती निर्मिति में अपनी अदृश्य भूमिका को पहचानने और समझने की कोशिश कीजिए। 

फिलहाल, कहीं प्रेमचंद की कहानी नशा पढ़ने की कोशिश कीजिए और मुझे भी बताइए। 


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यों दान तो देता है दिल खोलकर बहुत

यों तो अलग रहने के कायदे थे बहुत

ये आलमी जंग तो उनमें शुमार न था

यों पहले बीमारियाँ थी जहां में बहुत

हां तुम्हारा नाम तो उनमें शुमार न था

यों तो जुर्म थे पहले दर्ज खाते में बहुत उन में तेरी करतूत का तो शुमार न था

यों परिंदों पर तो पाबंदी नहीं थी बहुत जमीन पर कोई इंसानी किरदार न था


रोजी रोटी में कोताही थी पहले ही बहुत 

सांसों और ख्वाहिशों का पहरेदार न था


जिंदगी में खुशी और गम के रंग थे बहुत 

हालांकि मरने से तो कभी इन्कार न था

यों तो कशिश थी तेरी अदाओं में बहुत नाक के नीचे अगरचे कोई इसरार न था

पिछले चुनावों में फूल तो बिके थे बहुत हालांकि दिल अवाम का गुलज़ार न था

यों दान तो देता है दिल खोलकर बहुत कह रहा कोई वह शख्स देनदार न था







करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था

करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था

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करोना का प्रकोप दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। अधिकृत सरकारी और प्रशासनिक निर्देशों का पालन कड़ाई से करना जरूरी है। इस समय बहुत ही डरावनी स्थिति है। अलग रहना ही सब के साथ होना है। 

सभ्यता का इतिहास जब लिखा जायेगा तब पिछले चालीस साल का एक अलग अध्याय होगा। 1980 से 2020 के बीच दुनिया का चक्का बहुत तेजी से घूमा, इतनी तेजी से घूमा कि इसकी धूरी ही दरक गई। करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था के बदलाव की कथा इतिहास की सिसकियों के साथ लिखी जायेगी। जाने मेरा मन क्यों ऐसा संकेत दे रहा है! मन यानी 6ठी इंद्रिय। 6ठी इंद्रिय के पास संकेत तो होते हैं, सबूत नहीं होते हैं। 6ठी इंद्रिय पर बात करने के पहले कुछ और शब्दों पर बात कर लेते हैं, जरूरी है। साहित्य तो सभ्यता की अंतर्ध्वनि को शब्दों से ही पकड़ता है, इसलिए शब्द। 

इन दिनों चाणक्य की चर्चा आम जुबान पर रहती है, सूत्र यहीं से सुलझाते हैं। साम, दाम, भय, भेद, दंड, माया, उपेक्षा, इंद्रजाल।। साम यानी प्रशंसा, पुरस्कार। दाम यानी पैसा, वस्तु भी। भय यानी असुरक्षा की आशंका। भेद यानी रहस्य। दंड यानी शक्ति का कोप। माया जो है ही नहीं या जो है उस पर जो नहीं है उसकी प्रतीति। उपेक्षा यानी जो है उसका होना न होने जैसा कर दिया जाये। ये सभी अलग-अलग सूत्र हैं जो अस्ल में नाभिनालबद्ध होकर भीतर से एक ही होते हैं। जब साम, दाम, भय, भेद, दंड, उपेक्षा और माया का इस्तेमाल कर लिया जाता है तब बारी आती है इंद्रजाल की। इंद्रजाल यानी जादू, धोखा का शक्ति का जाल। इंद्र देवताओं के राजा रहे हैं। महा शासक। अब इंद्र से इंद्रजाल का क्या रिश्ता हो सकता है! इस रिश्ते को मिलकर समझना और खोजना होगा। बहर हाल यह कि इंद्रजाल के प्रभाव में आई आबादी की इंद्रियों में दिमाग को सही सूचना देने में शक्ति नहीं रह जाती है। इसलिए ईश्वर को भी इंद्रियातीत, यानी बियांड इंद्रिय, अर्थात इंद्रियों के प्रभाव से पार जाकर ही समझा जा सकता है। ईश्वर यानी सत्य। सत्य जो न होकर भी नहीं होता है और होकर तो होता ही है। इसकी सूचना दिमाग को जिस से मिलती है उसी का नाम 6ठी इंद्रिय है। जी, 6ठी इंद्रिय! 6ठी इंद्रिय, जो न होकर भी होती है और होकर तो होती है। उसी 6ठी इंद्रिय का संकेत मानें तो यही लगता है कि करोना के पहले और करोना के बाद विश्व व्यवस्था के बदलाव की कथा इतिहास की सिसकियों के साथ लिखी जायेगी।

विज्ञान और धर्म

विज्ञान और धर्म 

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करोना से बचाव के लिए अपनाई गई एहतियाती सामाजिक दूरी के हवाले से कुछ लोग विज्ञान और धर्म की उपयोगिता से जोड़ कर टिप्पणी करते हुए कह रहे हैं कि संकट की इस घड़ी में विज्ञान ड्यूटी पर है और धर्म छुट्टी पर! उनका इशारा अस्पतालों को खुले रखने और उपासना स्थलों को बंद रखने की स्थिति की तरफ है। इस इशारे में थोड़ा तंज भी है। यह तुलना समीचीन नहीं है। 

व्यक्तिगत आस्था जो भी हो, धर्म के पुरोहितवादी रुझान को बाद देकर देखा जाये तो धर्म मनुष्य की भिन्न जरूरतों को पूरा करता है और विज्ञान भिन्न जरूरतों को पूरा करता है। विज्ञान से भी जीवन में कम विसंगतियां नहीं पैदा हुई है। जानता हूँ कि यह बहुत बड़ा, यह बहुआयामी और संवेदनशील विषय है। कई तरह से बात की जा सकती है। इस प्रसंग पर अभी अधिक कुछ नहीं कहते हुए भी इतना कहना जरूरी है कि इस समय इस मुद्दे पर समग्र रूप से तंज करना न सिर्फ़ अनावश्यक है, बल्कि हानिकारक भी है। 

युद्ध और अकाल

युद्ध और अकाल
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युद्ध और अकाल बहुत नजदीकी रिश्तेदार हैं, साथ-साथ चलते हैं। इसलिए यह बहस फिलहाल बहुत जरूरी नहीं है। मनुष्य दोनों का मुकाबला करता आया है। अभी पूरी दुनिया में युद्ध जैसी स्थिति है। अकाल की स्थिति भी बहुत दूर नहीं है। अमर्त्य सेन ने यह साबित किया है कि अकाल वस्तु की उपलब्धता के अभाव से नहीं, बल्कि आधिकारिकता, इंटाइटेलमेंट, क्रय शक्ति में आई कमी से पैदा होता है। हमारी बहुत बहुत बड़ी आबादी क्रय शक्ति में होनेवाली कमी के सामने है। क्रय शक्ति में कमी का संबंध रोजगार के अभाव और उच्च महगाई दर से होता है।
हम करोना से युद्ध के साथ ही क्रय शक्ति के अभाव में अकाल के सामने हैं। इस समय धूमिल की कविता याद आ रही है। पूरी कविता के बजाय यहां उसकी एक उक्ति की याद आ रही है, दया अकाल की और एकता युद्ध की पूजी है। हमें इस युद्ध को जीतना ही होगा और अकाल के पहाड़ के पार भी जाना होगा। उस पार जहां मुक्तिबोध के शब्दों में सुनील जल में कांपता रहता है रक्त कमल।

करोना का कोहराम

करोना का कोहराम
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इस समय करोना का कोहराम मचा हुआ है। राज्य सरकारें अपनी सीमाओं को बंद कर रही है। एक तरह से यह जरूरी है। हर किसी को इसमें हर प्रकार से सहयोग करना चाहिए, मानसिक, संवेदनात्मक स्तर पर भी। यह विपत्ति का समय है। विपत्ति बीत जाने के बाद भी अपने कुछ सक्रिय निशान छोड़ जाती है।
नागरिक और निवासी का फर्क अधिक तीखा हो रहा है। नागरिक हम भारत के ह हैं और निवासी किसी न किसी राज्य के। नागरिकता स्थाई है लेकिन नैवासिकता स्थाई और अस्थ अस्थाई दोनों हो सकती है। बल्कि, बहुत बड़ी आवादी स्थाई नागरिकता के साथ अस्थाई ननैवासिकता में रह रही है। इस संबंध में उत्पन्न नई स्थिति पर भी नजर रखने की जरूरत है। बहरहाल ये संकेत भर है, इस समय तो सामाजिक दूरी के लिए सहयोग में ही संक्रमण से सुरक्षा की संभावना है। 

घर के बर्तन को आपस में टकराने से बचाना प्रमुख घरेलू काम है, प्रभु।

घर के बर्तन को आपस में टकराने से बचाना प्रमुख घरेलू काम है, प्रभु।

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सामाजिक दूरी में सुरक्षा की संभावना तलाशते हुए हमें इस बात के प्रति भी सचेत रहना होगा कि यह मानसिक दूरी में न बदलने लगे। सामाजिक दूरी में सुरक्षा की संभावना बहुत संवेदनशील मामला है। परिवार में इस समय संवाद और संवेदनशील आचरण की जरूरत है। पीढ़ियों के बीच के बीच के अंतराल को पाटते हुए संवाद की जरूरत है। जेंडर सेंसेटिव, अर्थात स्त्री पुरुष के बीच संवेदनशील व्यवहार की जरूरत है। घरेलू काम को जेंडर निरपेक्ष होकर किये जाने की जरूरत है। घरेलू काम में घर की साफ सफाई से लेकर धोने मांजने और बच्चों की जिज्ञासाओं को बिना खीझे पूरा किया जाना भी शामिल है। एक दूसरे को अवसाद से दूर रखने और विवाद के किसी भी प्रकरण को विनोद में बदलने के कौशल का उपयोग भी घरेलू काम में शामिल है। 

घर के बर्तन को आपस में टकराने से बचाना प्रमुख घरेलू काम है, प्रभु। 

विरोध और समर्थन

विरोध और समर्थन लोकतंत्र में लोकव्यवहार का आवश्यक उपकरण है। किसी भी मुद्दे पर सभी लोग एकमत या सहमत हों यह जरूरी नहीं होता है। लोकतंत्र सर्वसम्मत से नहीं बहुमत से चलता है। बहुमत तभी तक लोकतंत्र की सेवा करता है जब तक उसमें सब का सहयोग हासिल करने और अल्पमत के मूल्यवान तत्व के संयोजित करने की कोशिश का हौसला बचा रहता है। कोशिश में नाकामी की कशिश बची रहती है। भारतीय वृहदाख्यान (मेगा टेक्स्ट) में आंख और कान की प्रतिबंधकता से उत्पन्न संकटों के संदर्भ में हिंदी आलोचक विनोद शाही ने अपनी किताब में विस्तार से लिखा है, श्रवण कुम्हार और धृतराष्ट्र का संदर्भ याद किया है, समझा है समझाने की कोशिश की है। अंधत्व या अंधापन आंख की प्रतिबंधकता से उतना नहीं जुड़ा है, जितना पूर्वग्रहों को प्रतिबद्धता मानकर अभिमत बनाने और उसके सामाजिक प्रसार से जुड़ा है। अंध समर्थन बुरा है, बहुत बुरा है। अंथ विरोध भी बुरा है और बहुत बुरा है। अस्ल में अंधत्व बुरा है। अंध समर्थन और अंध विरोध के इस घनीभूत समय में कभी इसके और कभी उसके उचित के साथ होनेवाले को दोनों तरफ की ओर से बेपेंदी का कहकर मजाक उड़ाया जाता है। अंध समर्थन से समर्थन की सार्थकता और धार खत्म होती है। अंध विरोध से विरोध की भी सार्थकता, स्वीकार्यता और धार खत्म ही होती है। लोकतंत्र को अंधलोकवाद से बचाने के लिए अंध समर्थन और अंध विरोध के ब्यूह से बाहर निकलना ही होगा, बेपेंदी का मान लिए जाने का जोखिम चाहे जितना हो। 

प्रियता की परवाह किये बिना किया जानलेवा यह साहस आसान नहीं है। आखिर कृष्ण को भी अर्जुन तभी तक प्रिय थे जब तक उनकी दी हुई दृष्टि से जगत को देखते रहे। अपने समय के कई अच्छे लोगों को अंध समर्थन और अंध विरोध के ब्यूह में पड़ा देखकर बहुत पीड़ा होती है। इस ब्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है? रास्ता का अंत कभी नहीं होता! कोई-न-कोई रास्ता तो होना ही चाहिए। 

ऊँचा कद, ऊँचा पद


ऊँचा कद, ऊँचा पद

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ऐसा अवसर देखने में कम ही आता है जब इतिहास में किसी व्यक्ति का कद भी ऊँचा हो और पद भी ऊँचा हो। आज भौतिक विकास का जो ढाँचा हमारे समय प्रचलन में है, उसमें क्षैतिजीय विकास पर नहीं बल्कि लंबवत विकास पर ही जोर है। ऐसे में ऊँचाई का अपना महत्व है। इस ऊँचाई के हासिल में होने में कद और पद दोनों की बड़ी भूमिका होती है। अधिकतर मामलों में व्यक्ति अपने पद के आधार पर ऊँचाई को हासिल करते हैं। पद की ऊँचाई कद की ऊँचाई के अभाव में व्यक्ति को गरूर के ऐसे भँवर में डाल देती है कि उससे उसका व्यक्तित्व का वास्तविक सम्मान भयानक छीजन का शिकार हो कर इतिहास के कचरा घर में खो जाता है। इतिहास बहुत क्रूर होता है, निर्मम भी। संवेदनशील लोग, उनकी विचारधारा कुछ भी हो, अपने एकांत में इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं। चलिए, आप को अटल बिहारी वाजपेयी की कविताई के एक अंश की याद दिलाता हूँ।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कलि न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

हे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले लगा न सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
(अटल बिहारी वाजपेयी की कविता का एक अंश, साभार)

बुद्धि भ्रंश Intellect Deficit


बुद्धि भ्रंश
Intellect Deficit

यह मान लेने में गुरेज करने की कोई वजह नहीं है कि हम बुद्धि भ्रंश के भयानक दौर से गुजर रहे हैं। नहीं क्या? इस बुद्धि भ्रंश या इंटिलेक्ट डेफिसीट को गंभीरता से समझने की कोशिश करनी चाहिए। बुद्धि या इंटलेक्ट क्या होती है, पहले तो यही समझना होगा। intellect deficit और intellect disability के अंतर को भी ध्यान में रखना होगा। डिसएबिलीटी या विकलांगता सामान्यतः, व्यक्तिगत और स्थाई किस्म की होती है जब कि प्रभावी डेफिसीट सामूहिक और अस्थाई किस्म की होती है। मोटे तौर पर डिसएबिलीटी व्यक्ति के अपने आंतरिक असामंजस्य या संकट से उत्पन्न होती है तथा उससे अधिकतर मामलों में प्राथमिक स्तर पर केवल व्यक्ति ही दुष्प्रभावित होता है जब कि डेफिसीट समाज के अपने आंतरिक असामंजस्य या संकट से उत्पन्न होती है और प्राथमिक स्तर पर व्यापक समााज दुष्पप्रभावित होता है। समाज के इस संकट में फँस जाने के कारण समाज सर्वनाश के मुहाने पर पहुँच जाता है। इतना इशारा काफी है।
इंटिलेक्ट वह क्षमता है जिससे विचारों और तरकीबों को विश्लेषित किया जाता है, निष्कर्ष निकाले जाते हैं और उसे माना जाता है, निष्कर्ष की स्वीकृति का मानसिक माहौल बना रहता है। इसे कैसे समझा जाये! हिंदी साहित्य से कुछ उदाहरण ले सकते हैं। हिंदी के कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता हमें बताती है, जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। इस विवेक पर ध्यान देना जरूरी है। एक इशारा और करना जरूरी लग रहा है। यूरोपीय नवजागरण जिसे ज्ञानोदय का युग  या the age of enlightenment  कहा जाता है। इस इनलाइटमेंट के पीछे विवेक सक्रिय था बुद्धिवाद के तर्क की जगह इसे विवेकवाद के संदर्भ से समझा जा सकता है और इसमें दार्शनिक कांट (Immanuel Kant 1724–1804) आदि हमारी मदद कर सकते हैं। लेकिन हमें रामचरितमानस लिखनेवाले तुलसीदास की याद आ रही है, उनकी कविता में उल्लेख है कि बिन सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिन सुलभ न सोई । यानी विवेक गहरा संबंध सत्संग से होता है। राम कृपा को हम पक्षपात रहित या पक्ष निरपेक्ष बुद्धिवाद के समाज-मानसिक उत्पाद के तौर पर देख सकते हैं। बहरहाल, सवाल यह है कि क्या हम  बुद्धि भ्रंश या intellect deficit के भयानक दौर से गुजर रहे हैं। हम यह समझने मानने को तैयार ही नहीं हैं कि लंबे समय में हमारे हित में क्या है, अहित में क्या है। बुद्धि भ्रंश या intellect deficit के चलते हमारा विवेक मर नहीं भी गया हो तो निकृष्टतम सामाजिक निष्क्रियता का शिकार हो गया है। इस पर सोचने की जरूरत है कि लंबे समय में बनी इस इस फाँस से कैसे बाहर निकला जा सकता है।